भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2461

कृतवर्मा कहाँ चले गये थे और भाइयोंसहित तुम्हारा भ्राता दुःशासन भी कहाँ था? ॥ ३०-३१ ॥ सम्बन्धिनस्ते भ्रातूंश्च सहायान् मातुलांस्तथा । सर्वान् विक्रम्य मिषतो लोकमाक्रम्य मूर्धनि ॥ ३२ ॥ जयद्रथो हतो राजन् किं नु शेषमुपास्महे । को हीह स पुमानस्ति यो विजेष्यति पाण्डवम् ॥ ३३ ॥ ‘राजन्! तुम्हारे सम्बन्धी, भाई, सहायक और मामा सब-के-सब देख रहे थे तो भी अर्जुनने उन सबको अपने पराक्रमद्वारा परास्त करके सब लोगोंके मस्तकपर पैर रखकर जयद्रथको मार डाला। अब और कौन बचा है जिसका हम भरोसा करें? यहाँ कौन ऐसा पुरुष है जो पाण्डुपुत्र अर्जुनपर विजय पायेगा? ॥ ३२-३३ ॥ तस्य चास्त्राणि दिव्यानि विविधानि महात्मनः । गाण्डीवस्य च निर्घोषो धैर्याणि हरते हि नः ॥ ३४ ॥ ‘महात्मा अर्जुनके पास नाना प्रकारके दिव्यास्त्र हैं। उनके गाण्डीव धनुषका गम्भीर घोष हमारा धैर्य छीन लेता है ॥ ३४ ॥ नष्टचन्द्रा यथा रात्रिः सेनेयं हतनायका । नागभग्नद्रुमा शुष्का नदीवाकुलतां गता ॥ ३५ ॥ ‘जैसे चन्द्रमाके उदित न होनेपर रात्रि अन्धकारमयी दिखायी देती है, उसी प्रकार हमारी यह सेना सेनापतिके मारे जानेसे श्रीहीन हो रही है। हाथीने जिसके किनारेके वृक्षोंको तोड़ डाला हो, उस सूखी नदीके समान यह व्याकुल हो उठी है ॥ ३५ ॥ ध्वजिन्यां हतनेत्रायां यथेष्टं श्वेतवाहनः । चरिष्यति महाबाहुः कक्षेष्वाग्निरिव ज्वलन् ॥ ३६ ॥ ‘हमारी इस विशाल वाहिनीका नेता नष्ट हो गया है। ऐसी दशामें घास-फूसके ढेरमें प्रज्वलित होनेवाली आगके समान श्वेत घोड़ोंवाले महाबाहु अर्जुन इस सेनाके भीतर इच्छानुसार विचरेंगे ॥ ३६ ॥ सात्यकेश्चैव यो वेगो भीमसेनस्य चोभयोः । दारयेच्च गिरीन् सर्वान् शोषयेच्चैव सागरान् ॥ ३७ ॥ ‘उधर सात्यकि और भीमसेन दोनों वीरोंका जो वेग है, वह सारे पर्वतोंको विदीर्ण कर सकता है। समुद्रोंको भी सुखा सकता है ॥ ३७ ॥ उवाच वाक्यं यद् भीमः सभामध्ये विशाम्पते । कृतं तत् सफलं तेन भूयश्चैव करिष्यति ॥ ३८ ॥ ‘प्रजानाथ! द्यूतसभामें भीमसेनने जो बात कही थी, उसे उन्होंने सत्य कर दिखाया और जो शेष है, उसे भी वे अवश्य ही पूर्ण करेंगे ॥ ३८ ॥ प्रमुखस्थे तदा कर्णे बलं पाण्डवरक्षितम् ।