महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2467, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘अभिमन्युके विनाशसे जिनके हृदयमें गहरी चोट पहुँची है, उस अर्जुनके साथ मेरी सन्धि कैसे हो सकती है? जब मैं समुद्रसे घिरी हुई सारी पृथ्वीका एकच्छत्र राजाकी हैसियतसे उपभोग कर चुका हूँ, तब इस समय पाण्डवोंकी कृपाका पात्र बनकर कैसे राज्य भोगूँगा? ।। २२ १/२ ।।
उपर्युपरि राज्ञां वै ज्वलित्वा भास्करो यथा ।। २३ ।। युधिष्ठिरं कथं पश्चादनुयास्यामि दासवत् । ‘समस्त राजाओंके ऊपर सूर्यके समान प्रकाशित होकर अब दासकी भाँति युधिष्ठिरके पीछे-पीछे कैसे चलूँगा? ।।
कथं भुक्त्वा स्वयं भोगान् दत्त्वा दायांश्च पुष्कलान् ।। २४ ।। कृपणं वर्तयिष्यामि कृपणैः सह जीविकाम् । ‘स्वयं बहुत-से भोग भोगकर और प्रचुर धन दान करके अब दीन पुरुषोंके साथ दीनतापूर्ण जीविकाका आश्रय ले किस प्रकार निर्वाह कर सकूँगा? ।। २४ १/२ ।।
नाभ्यसूयामि ते वाक्यमुक्तं स्निग्धं हितं त्वया ।। २५ ।। न तु सन्धिमहं मन्ये प्राप्तकालं कथञ्चन । ‘आपने स्नेहवश हितकी ही बात कही है। आपकी इस बातमें मैं दोष नहीं निकालता और न इसकी निन्दा ही करता हूँ। मेरा कथन तो इतना ही है कि अब किसी प्रकार सन्धिका अवसर नहीं रह गया है। मेरी ऐसी ही मान्यता है ।। २५ १/२ ।।
सुनीतमनुपश्यामि सुयुद्धेन परंतप ।। २६ ।। नायं क्लीबयितुं कालः संयोद्धुं काल एव नः । ‘शत्रुओंको तपानेवाले वीर! अब मैं अच्छी तरह युद्ध करनेमें ही उत्तम नीतिका पालन समझ रहा हूँ। हमारा यह समय कायरता दिखानेका नहीं, उत्साहपूर्वक युद्ध करनेका ही है ।। २६ १/२ ।।
इष्टं मे बहुभिर्यज्ञैर्दत्ता विप्रेषु दक्षिणाः ।। २७ ।। प्राप्ताः कामाः श्रुता वेदाः शत्रूणां मूर्ध्नि च स्थितम् । भृत्या मे सुभृतास्तात दीनश्चाभ्युद्धृतो जनः ।। २८ ।। नोत्सहेऽद्य द्विजश्रेष्ठ पाण्डवान् वक्तुमीदृशम् । ‘तात! मैंने बहुत-से यज्ञोंका अनुष्ठान कर लिया। ब्राह्मणोंको पर्याप्त दक्षिणाएँ दे दीं। सारी कामनाएँ पूर्ण कर लीं। वेदोंका श्रवण कर लिया। शत्रुओंके माथेपर पैर रखा और भरण-पोषणके योग्य व्यक्तियोंके पालन-पोषणकी अच्छी व्यवस्था कर दी। इतना ही नहीं, मैंने दीनोंका उद्धारकार्य भी सम्पन्न कर दिया है। अतः द्विजश्रेष्ठ! अब मैं पाण्डवोंसे इस प्रकार सन्धिके लिये याचना नहीं कर सकता ।। २७-२८ १/२ ।।
जितानि परराष्ट्राणि स्वराष्ट्रमनुपालितम् ।। २९ ।।