भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2468

भुक्ताश्च विविधा भोगास्त्रिवर्गः सेवितो मया । पितॄणां गतमानृण्यं क्षत्रधर्मस्य चोभयोः ॥ ३० ॥ ‘मैंने दूसरोंके राज्य जीते, अपने राष्ट्रका निरन्तर पालन किया, नाना प्रकारके भोग भोगे; धर्म, अर्थ और कामका सेवन किया और पितरों तथा क्षत्रियधर्म—दोनोंके ऋणसे उऋण हो गया ।। २९-३० ।।

न ध्रुवं सुखमस्तीति कुतो राष्ट्रं कुतो यशः । इह कीर्तिर्विधातव्या सा च युद्धेन नान्यथा ॥ ३१ ॥ ‘संसारमें कोई भी सुख सदा रहनेवाला नहीं है। फिर राष्ट्र और यश भी कैसे स्थिर रह सकते हैं? यहाँ तो कीर्तिका ही उपार्जन करना चाहिये और कीर्ति युद्धके सिवा किसी दूसरे उपायसे नहीं मिल सकती ।। ३१ ।।

गृहे यत् क्षत्रियस्यापि निधनं तद् विगर्हितम् । अधर्मः सुमहानेष यच्छय्यामरणं गृहे ॥ ३२ ॥ ‘क्षत्रियकी भी यदि घरमें मृत्यु हो जाय तो उसे निन्दित माना गया है। घरमें खाटपर सोकर मरना यह क्षत्रियके लिये महान् पाप है ।। ३२ ।।

अरण्ये यो विमुच्येत संग्रामे वा तनुं नरः । क्रतूनाहृत्य महतो महिमानं स गच्छति ॥ ३३ ॥ ‘जो बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान करके वनमें या संग्राममें शरीरका त्याग करता है, वही क्षत्रिय महत्त्वको प्राप्त होता है ।। ३३ ।।

कृपणं विलपन्नार्तो जरयाभिपरिप्लुतः । म्रियते रुदतां मध्ये ज्ञातीनां न स पूरुषः ॥ ३४ ॥ ‘जिसका शरीर बुढ़ापेसे जर्जर हो गया हो, जो रोगसे पीड़ित हो, परिवारके लोग जिसके आस-पास बैठकर रो रहे हों और उन रोते हुए स्वजनोंके बीचमें जो करुण विलाप करते-करते अपने प्राणोंका परित्याग करता है, वह पुरुष कहलानेयोग्य नहीं है ।। ३४ ।।

त्यक्त्वा तु विविधान् भोगान् प्राप्तानां परमां गतिम् । अपीदानीं सुयुद्धेन गच्छेयं यत्सलोकताम् ॥ ३५ ॥ ‘अतः जिन्होंने नाना प्रकारके भोगोंका परित्याग करके उत्तम गति प्राप्त कर ली है, इस समय युद्धके द्वारा मैं उन्हींके लोकोंमें जाऊँगा ।। ३५ ।।

शूराणामार्यवृत्तानां संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् । धीमतां सत्यसंधानां सर्वेषां क्रतुयाजिनाम् ॥ ३६ ॥ शस्त्रावभृथपूतानां ध्रुवं वासस्त्रिविष्टपे । ‘जिनके आचरण श्रेष्ठ हैं, जो युद्धसे कभी पीछे नहीं हटते, अपनी प्रतिज्ञाको सत्य कर दिखाते और यज्ञोंद्वारा यजन करनेवाले हैं तथा जिन्होंने शस्त्रकी धारामें अवभृथस्नान किया है, उन समस्त बुद्धिमान् पुरुषोंका निश्चय ही स्वर्गमें निवास होता है ।। ३६ १/२ ।।