भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2469, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2469

मुदा नूनं प्रपश्यन्ति युद्धे ह्यप्सरसां गणाः ।। ३७ ।। पश्यन्ति नूनं पितरः पूजितान् सुरसंसदि । अप्सरोभिः परिवृतान् मोदमानांस्त्रिविष्टपे ।। ३८ ।। 'निश्चय ही युद्धमें प्राण देनेवालोंकी ओर अप्सराएँ बड़ी प्रसन्नतासे निहारा करती हैं। पितृगण उन्हें अवश्य ही देवताओं-की सभामें सम्मानित होते देखते हैं। वे स्वर्गमें अप्सराओंसे घिरकर आनन्दित होते देखे जाते हैं ।। पन्थानममरैर्यान्तं शूरैश्चानिवर्तिभिः । अपि तत्संगतं मार्ग वयमध्यारुहेमहि ।। ३९ ।। पितामहेन वृद्धेन तथाऽऽचार्येण धीमता । जयद्रथेन कर्णेन तथा दुःशासनेन च ।। ४० ।। 'देवता तथा युद्धमें पीठ न दिखानेवाले शूरवीर जिस मार्गसे जाते हैं, क्या उसी मार्गपर अब हमलोग भी वृद्ध पितामह, बुद्धिमान् आचार्य द्रोण, जयद्रथ, कर्ण तथा दुःशासनके साथ आरूढ़ होंगे? ।। ३९-४० ।। घटमाना मदर्थेऽस्मिन् हताः शूरा जनाधिपाः । शेरते लोहिताक्ताङ्गाः संग्रामे शरविक्षताः ।। ४१ ।। 'कितने ही वीर नरेश मेरी विजयके लिये यथाशक्ति चेष्टा करते हुए बाणोंसे क्षत-विक्षत हो मारे जाकर रक्तरंजित शरीरसे संग्रामभूमिमें सो रहे हैं ।। ४१ ।। उत्तमास्त्रविदः शूरा यथोक्तक्रतुयाजिनः । त्यक्त्वा प्राणान् यथान्यायमिन्द्रसद्मस्वधिष्ठिताः ।। ४२ ।। 'उत्तम अस्त्रोंके ज्ञाता और शास्त्रोक्त विधिसे यज्ञ करनेवाले अन्य शूरवीर यथोचित रीतिसे युद्धमें प्राणोंका परित्याग करके इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित हो रहे हैं ।। ४२ ।। तैः स्वयं रचितो मार्गो दुर्गमो हि पुनर्भवेत् । सम्पतद्भिर्महावेगैर्यास्यद्भिरिह सद्गतिम् ।। ४३ ।। 'उन वीरोंने स्वयं ही जिस मार्गका निर्माण किया है, वह पुनः बड़े वेगसे सद्गतिको जानेवाले बहुसंख्यक वीरोंद्वारा दुर्गम हो जाय (अर्थात् इतने अधिक वीर उस मार्गसे यात्रा करें कि भीड़के मारे उसपर चलना कठिन हो जाय) ।। ४३ ।। ये मदर्थे हताः शूरास्तेषां कृतमनुस्मरन् । ऋणं तत् प्रतियुञ्जानो न राज्ये मन आदधे ।। ४४ ।। 'जो शूरवीर मेरे लिये मारे गये हैं, उनके उस उपकारका निरन्तर स्मरण करता हुआ उस ऋणको उतारनेकी चेष्टामें संलग्न होकर मैं राज्यमें मन नहीं लगा सकता ।। ४४ ।। घातयित्वा वयस्यांश्च भ्रातृनथ पितामहान् । जीवितं यदि रक्षेयं लोको मां गर्हयेद् ध्रुवम् ।। ४५ ।।

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