भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2470

'मित्रों, भाइयों और पितामहोंको मरवाकर यदि मैं अपने प्राणोंकी रक्षा करूँ तो सारा संसार निश्चय ही मेरी निन्दा करेगा ।। ४५ ।। कीदृशं च भवेद् राज्यं मम हीनस्य बन्धुभिः । सखिभिश्च विशेषेण प्रणिपत्य च पाण्डवम् ।। ४६ ।। 'बन्धु-बान्धवों और मित्रोंसे हीन हो युधिष्ठिरके पैरोंमें पड़नेपर मुझे जो राज्य मिलेगा, वह कैसा होगा? ।। ४६ ।। सोऽहमेतादृशं कृत्वा जगतोऽस्य पराभवम् । सुयुद्धेन ततः स्वर्गं प्राप्स्यामि न तदन्यथा ।। ४७ ।। 'इसलिये मैं जगत्का ऐसा विनाश करके अब उत्तम युद्धके द्वारा ही स्वर्गलोक प्राप्त करूँगा। मेरी सद्गतिके लिये दूसरा कोई उपाय नहीं है' ।। ४७ ।। एवं दुर्योधनेनोक्तं सर्वे सम्पूज्य तद्वचः । साधु साध्विति राजानं क्षत्रियाः सम्बभाषिरे ।। ४८ ।। इस प्रकार राजा दुर्योधनकी कही हुई यह बात सुनकर सब क्षत्रियोंने 'बहुत अच्छा, बहुत अच्छा' कहकर उसका आदर किया और उसे भी धन्यवाद दिया ।। ४८ ।। पराजयमशोचन्तः कृतचित्ताश्च विक्रमे । सर्वे सुनिश्चिता योद्धुमुदग्रमनसोऽभवन् ।। ४९ ।। सबने अपनी पराजयका शोक छोड़कर मन-ही-मन पराक्रम करनेका निश्चय किया। युद्ध करनेके विषयमें सबका पक्का विचार हो गया और सबके हृदयमें उत्साह भर गया ।। ४९ ।। ततो वाहान् समाश्वस्य सर्वे युद्धाभिनन्दिनः । ऊने द्वियोजने गत्वा प्रत्यतिष्ठन्त कौरवाः ।। ५० ।। तत्पश्चात् सब योद्धाओंने अपने-अपने वाहनोंको विश्राम दे युद्धका अभिनन्दन किया और आठ कोससे कुछ कम दूरीपर जाकर डेरा डाला ।। ५० ।। आकाशे विद्रुमे पुण्ये प्रस्थे हिमवतः शुभे । अरुणां सरस्वतीं प्राप्य पपुः सस्नुश्च ते जलम् ।। ५१ ।। आकाशके नीचे हिमालयके शिखरकी सुन्दर, पवित्र एवं वृक्षरहित चौरस भूमिपर अरुणसलिला सरस्वतीके निकट जाकर उन सबने स्नान और जलपान किया ।। ५१ ।। तव पुत्रकृतोत्साहाः पर्यवर्तन्त ते ततः । पर्यवस्थाप्य चात्मानमन्योन्येन पुनस्तदा । सर्वे राजन् न्यवर्तन्त क्षत्रियाः कालचोदिताः ।। ५२ ।। राजन्! वे कालप्रेरित समस्त क्षत्रिय आपके पुत्रद्वारा उत्साह देनेपर एक-दूसरेके द्वारा मनको स्थिर करके पुनः रणभूमिकी ओर लौटे ।। ५२ ।।