भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2513

उस समय शल्यने युधिष्ठिरपर विषैले सर्पके समान एक भयंकर बाणका प्रहार किया। वह बाण बड़े वेगसे महात्मा युधिष्ठिरको घायल करके पृथ्वीपर गिर पड़ा॥
ततो वृकोदरः क्रुद्धः शल्यं विव्याध सप्तभिः ॥ ३२ ॥
पञ्चभिः सहदेवस्तु नकुलो दशभिः शरैः ।
द्रौपदेयाश्च शत्रुघ्नं शूरमार्तायनिं शरैः ॥ ३३ ॥
यह देख भीमसेन कुपित हो उठे। उन्होंने सात बाणोंसे शल्यको बींध डाला। फिर सहदेवने पाँच, नकुलने दस और द्रौपदीके पुत्रोंने अनेक बाणोंसे शत्रुसूदन शूरवीर शल्यको घायल कर दिया ॥ ३२-३३ ॥
अभ्यवर्षन् महाराज मेघा इव महीधरम् ।
ततो दृष्ट्वा वार्यमाणं शल्यं पार्थैः समन्ततः ॥ ३४ ॥
कृतवर्मा कृपश्चैव संक्रुद्धावभ्यधावताम् ।
उलूकश्च महावीर्यः शकुनिश्चापि सौबलः ॥ ३५ ॥
समागम्याथ शनकैरश्वत्थामा महाबलः ।
तव पुत्राश्च कार्त्स्न्येन जुगुपुः शल्यमाहवे ॥ ३६ ॥
महाराज! जैसे मेघ पर्वतपर पानी बरसाते हैं, उसी प्रकार वे शल्यपर बाणोंकी वर्षा कर रहे थे। शल्यको कुन्तीके पुत्रोंद्वारा सब ओरसे अवरुद्ध हुआ देख कृतवर्मा और कृपाचार्य क्रोधमें भरकर उनकी ओर दौड़े आये। साथ ही महापराक्रमी उलूक, सुबलपुत्र शकुनि, महाबली अश्वत्थामा तथा आपके सम्पूर्ण पुत्र भी धीरे-धीरे वहाँ आकर रणभूमिमें शल्यकी रक्षा करने लगे ॥ ३४—३६ ॥
भीमसेनं त्रिभिर्विद्ध्वा कृतवर्मा शिलीमुखैः ।
बाणवर्षेण महता क्रुद्धरूपमवारयत् ॥ ३७ ॥
कृतवर्माने क्रोधमें भरे हुए भीमसेनको तीन बाणोंसे घायल करके भारी बाण-वर्षाके द्वारा आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ३७ ॥
धृष्टद्युम्नं कृपः क्रुद्धो बाणवर्षैरपीडयत् ।
द्रौपदेयांश्च शकुनिर्ययौ च द्रौणिरभ्ययात् ॥ ३८ ॥
तत्पश्चात् कुपित हुए कृपाचार्यने धृष्टद्युम्नको अपनी बाण-वर्षाद्वारा पीड़ित कर दिया। शकुनिने द्रौपदीके पुत्रोंपर और अश्वत्थामाने नकुल-सहदेवपर धावा किया ॥ ३८ ॥
दुर्योधनो युधां श्रेष्ठ आहवे केशवार्जुनौ ।
समभ्ययादुग्रतेजाः शरैश्चाप्यहनद् बली ॥ ३९ ॥
योद्धाओंमें श्रेष्ठ, भयंकर तेजस्वी और बलवान् दुर्योधनने समरांगणमें श्रीकृष्ण और अर्जुनपर चढ़ाई की तथा बाणोंद्वारा उन्हें गहरी चोट पहुँचायी ॥ ३९ ॥
एवं द्वन्द्वशतान्यासंस्त्वदीयानां परैः सह ।
घोररूपाणि चित्राणि तत्र तत्र विशाम्पते ॥ ४० ॥