भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2514

प्रजानाथ! इस प्रकार जहाँ-तहाँ आपके सैनिकोंके शत्रुओंके साथ सैकड़ों भयानक एवं विचित्र द्वन्द्वयुद्ध होने लगे ॥ ४० ॥ ऋक्षवर्णाञ्जघानाश्वान् भोजो भीमस्य संयुगे । सोऽवतीर्य रथोपस्थाद्धताश्वात् पाण्डुनन्दनः ॥ ४१ ॥ कालो दण्डमिवोद्यम्य गदापाणिरयुध्यत । कृतवर्माने युद्धस्थलमें भीमसेनके रीछके समान रंगवाले घोड़ोंको मार डाला। घोड़ोंके मारे जानेपर पाण्डुनन्दन भीमसेन रथकी बैठकसे नीचे उतरकर हाथमें गदा ले युद्ध करने लगे, मानो यमराज अपना दण्ड उठाकर प्रहार कर रहे हों ॥ ४१ १/२ ॥ प्रमुखे सहदेवस्य जघानाश्वान् स मद्रराट् ॥ ४२ ॥ ततः शल्यस्य तनयं सहदेवोऽसिनावधीत् । मद्रराज शल्यने अपने सामने आये हुए सहदेवके घोड़ोंको मार डाला। तब सहदेवने भी शल्यके पुत्रको तलवारसे मार गिराया ॥ ४२ १/२ ॥ गौतमः पुनराचार्यो धृष्टद्युम्नमयोधयत् ॥ ४३ ॥ असम्भ्रान्तमसम्भ्रान्तो यत्नवान् यत्नवत्तरम् । कृपाचार्य बिना किसी घबराहटके विजयके लिये यत्नशील हो सम्भ्रमरहित और अधिक प्रयत्नशील धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध करने लगे ॥ ४३ १/२ ॥ द्रौपदेयांस्तथा वीरानेकैकं दशभिः शरैः ॥ ४४ ॥ अविद्ध्यदाचार्यसुतो नातिक्रुद्धो हसन्निव । आचार्य द्रोणके पुत्र अश्वत्थामाने अधिक क्रुद्ध न होकर हँसते हुए-से दस-दस बाणोंद्वारा द्रौपदीके वीर पुत्रोंमेंसे प्रत्येकको घायल कर दिया ॥ ४४ १/२ ॥ पुनश्च भीमसेनस्य जघानाश्वांस्तथाऽऽहवे ॥ ४५ ॥ सोऽवतीर्य रथात्तूर्णं हताश्वः पाण्डुनन्दनः । कालो दण्डमिवोद्यम्य गदां क्रुद्धो महाबलः ॥ ४६ ॥ पोथयामास तुरगान् रथं च कृतवर्मणः । कृतवर्मा त्ववप्लुत्य रथात् तस्मादपाक्रमत् ॥ ४७ ॥ (इसी बीचमें भीमसेन दूसरे रथपर आरूढ़ हो गये थे) कृतवर्माने युद्धस्थलमें पुनः भीमसेनके घोड़ोंको मार डाला। तब घोड़ोंके, मारे जानेपर महाबली पाण्डुकुमार भीमसेन शीघ्र ही रथसे उतर पड़े और कुपित हो दण्ड उठाये कालके समान गदा लेकर उन्होंने कृतवर्माके घोड़ों तथा रथको चूर-चूर कर दिया। कृतवर्मा उस रथसे कूदकर भाग गया ॥ ४५—४७ ॥ शल्योऽपि राजन् संक्रुद्धो निघ्नन् सोमकपाण्डवान् । पुनरेव शितैर्बाणैर्युधिष्ठिरमपीडयत् ॥ ४८ ॥