भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2523

ततो युद्धमभूद् घोरं परस्परवधैषिणाम् ॥ ३८ ॥ अन्योन्यवधसंयुक्तमन्योन्यप्रीतिवर्धनम् । फिर तो एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले उभयपक्षके सैनिकोंमें घोर युद्ध होने लगा। सभी एक-दूसरेके संहारके लिये सचेष्ट थे और वह युद्ध उनकी पारस्परिक प्रसन्नताको बढ़ा रहा था ॥ ३८ १/२ ॥ तस्मिन् प्रवृत्ते संग्रामे राजन् वीरवरक्षये ॥ ३९ ॥ अनिलेनेरितं घोरमुत्तस्थौ पार्थिवं रजः । राजन्! बड़े-बड़े वीरोंका विनाश करनेवाले उस घोर संग्रामके आरम्भ होते ही वायुकी प्रेरणासे धरतीकी भयंकर धूल ऊपरको उठने लगी ॥ ३९ १/२ ॥ श्रवणान्नामधेयानां पाण्डवानां च कीर्तनात् ॥ ४० ॥ परस्परं विजानीमो यदयुध्यन्नभीतवत् । उस समय उस धूलके अन्धकारमें समस्त योद्धा निर्भय-से होकर युद्ध कर रहे थे। पाण्डव तथा कौरव-योद्धा जो अपना नाम लेकर परिचय देते थे, उसे ही सुनकर हमलोग एक-दूसरेको पहचान पाते थे ॥ ४० १/२ ॥ तद्रजः पुरुषव्याघ्र शोणितेन प्रशामितम् ॥ ४१ ॥ दिशश्च विमला जातास्तस्मिंस्तमसि नाशिते । पुरुषसिंह! उस समय इतना खून बहा कि उससे वहाँ छायी हुई सारी धूल बैठ गयी। उस धूलजनित अन्धकारका नाश होनेपर सम्पूर्ण दिशाएँ स्वच्छ हो गयीं ॥ तथा प्रवृत्ते संग्रामे घोररूपे भयानके ॥ ४२ ॥ तावकानां परेषां च नासीत् कश्चित् पराङ्मुखः । इस प्रकार वह घोर एवं भयानक संग्राम चलने लगा। उस समय आपके और शत्रुपक्षके योद्धाओंमेंसे कोई भी युद्धसे विमुख नहीं हुआ ॥ ४२ १/२ ॥ ब्रह्मलोकपरा भूत्वा प्रार्थयन्तो जयं युधि ॥ ४३ ॥ सुयुद्धेन पराक्रान्ता नसः स्वर्गमभीप्सवः । सबका लक्ष्य था ब्रह्मलोककी प्राप्ति। वे सभी सैनिक युद्धमें विजय चाहते और उत्तम युद्धके द्वारा पराक्रम दिखाते हुए स्वर्गलोक पानेकी अभिलाषा रखते थे ॥ भर्तृपिण्डविमोक्षार्थं भर्तृकार्यविनिश्चिताः ॥ ४४ ॥ स्वर्गसंसक्तमनसो योधा युयुधिरे तदा । सभी योद्धा स्वामीके दिये हुए अन्नके ऋणसे उऋण होनेके लिये उनके कार्यको सिद्ध करनेका दृढ़ निश्चय किये मनमें स्वर्गकी अभिलाषा रखकर उस समय उत्साहपूर्वक युद्ध कर रहे थे ॥ ४४ १/२ ॥ नानारूपाणि शस्त्राणि विसृजन्तो महारथाः ॥ ४५ ॥

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