भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2532

निहनिष्यति चैवाद्य मातुलॊऽस्मान् महाबलः । गोविन्दवचनं सत्यं कथं भवति किं त्विदम् ॥) ‘मैं, मेरे भाई, महारथी सात्यकि तथा पांचाल और सृंजय योद्धा सब मिलकर भी मद्रराज शल्यको पराजित करनेमें समर्थ नहीं हो रहे हैं। जान पड़ता है ये महाबली मामा आज हमलोगोंका वध कर डालेंगे। फिर भगवान् श्रीकृष्णकी यह बात (कि शल्य मेरे हाथसे मारे जायेंगे) कैसे सिद्ध होगी?’। ततः सरथनागाश्वाः पाण्डवाः पाण्डुपूर्वज । मद्रराजं समासेदुः पीडयन्तः समन्ततः ॥ ३९ ॥ पाण्डुके बड़े भाई महाराज धृतराष्ट्र! तदनन्तर रथ, हाथी और घोड़ोंसहित समस्त पाण्डवयोध्दा मद्रराज शल्यको सब ओरसे पीड़ा देते हुए उनपर चढ़ आये ।। नानाशास्त्रौघबहुलां शस्त्रवृष्टिं समुद्यताम् । व्यधमत् समरे राजा महाभ्राणीव मारुतः ॥ ४० ॥ जैसे वायु बड़े-बड़े बादलोंको उड़ा देती है, उसी प्रकार समरांगणमें राजा शल्यने अनेक प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंसे परिपूर्ण उस उमड़ी हुई शस्त्रवर्षाको छिन्न-भिन्न कर डाला ।। ततः कनकपुङ्खां तां शल्यक्षिप्तां वियद्गताम् । शरवृष्टिमपश्याम शलभानामिवार्यतिम् ॥ ४१ ॥ तत्पश्चात् शल्यके चलाये हुए सुनहरे पंखवाले बाणोंकी वर्षा आकाशमें टिड्डीदलोंके समान छा गयी, जिसे हमने अपनी आँखों देखा था ॥ ४१ ॥ ते शरा मद्रराजेन प्रेषिता रणमूर्धनि । सम्पतन्तः स्म दृश्यन्ते शलभानां व्रजा इव ॥ ४२ ॥ युद्धके मुहानेपर मद्रराजके चलाये हुए वे बाण शलभसमूहोंके समान गिरते दिखायी देते थे ॥ ४२ ॥ मद्रराजधनुर्मुक्ताः शरैः कनकभूषणैः । निरन्तरमिवाकाशं सम्बभूव जनाधिप ॥ ४३ ॥ नरेश्वर! मद्रराज शल्यके धनुषसे छूटे हुए उन सुवर्णभूषित बाणोंसे आकाश ठसाठस भर गया था ॥ ४३ ॥ न पाण्डवानां नास्माकं तत्र किञ्चिद् व्यदृश्यत । बाणान्धकारे महति कृते तत्र महाहवे ॥ ४४ ॥ उस महायुद्धमें बाणोंद्वारा महान् अन्धकार छा गया, जिससे वहाँ हमारी और पाण्डवोंकी कोई भी वस्तु दिखायी नहीं देती थी ॥ ४४ ॥ मद्रराजेन बलिना लाघवाच्छरवृष्टिभिः । चाल्यमानं तु तं दृष्ट्वा पाण्डवानां बलार्णवम् ॥ ४५ ॥ विस्मयं परमं जग्मुर्देवगन्धर्वदानवाः ।