भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2533

बलवान् मद्रराजके द्वारा शीघ्रतापूर्वक की जानेवाली उस बाण-वर्षासे पाण्डवोंके उस सैन्यसमुद्रको विचलित होते देख देवता, गन्धर्व और दानव अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गये ॥ ४५ १/२ ॥

स तु तान् सर्वतो यत्तान् शरैः संछाद्य मारिष ॥ ४६ ॥
धर्मराजमवच्छाद्य सिंहवद् व्यनदन्मुहुः ।
मान्यवर! विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले उन समस्त योद्धाओंको सब ओरसे बाणोंद्वारा आच्छादित करके शल्य धर्मराज युधिष्ठिरको भी ढककर बारंबार सिंहके समान गर्जना करने लगे ॥ ४६ १/२ ॥

ते च्छन्नाः समरे तेन पाण्डवानां महारथाः ॥ ४७ ॥
नाशक्नुवंस्तदा युद्धे प्रत्युद्यातुं महारथम् ।
समरांगणमें उनके बाणोंसे आच्छादित हुए पाण्डवोंके महारथी उस युद्धमें महारथी शल्यकी ओर आगे बढ़नेमें समर्थ न हो सके ॥ ४७ १/२ ॥

धर्मराजपुरोगास्तु भीमसेनमुखा रथाः ।
न जहुः समरे शूरं शल्यमाहवशोभिनम् ॥ ४८ ॥
तो भी धर्मराजको आगे रखकर भीमसेन आदि रथी संग्राममें शोभा पानेवाले शूरवीर शल्यको वहाँ छोड़कर पीछे न हटे ॥ ४८ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि शल्ययुद्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें शल्यका युद्धविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं।)