भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2577, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2577

आलोक्य पाण्डवान् युद्धे योधा राजन् समन्ततः ॥ १६ ॥ वार्यमाणा ययुर्वेगात् पुत्रेण तव भारत । राजन्! भरतनन्दन! वे योद्धा युद्धमें सब ओर फैले हुए पाण्डवोंको देखकर आपके पुत्रके मना करनेपर भी वेगपूर्वक आगे बढ़ गये ॥ १६ १/२ ॥ दुर्योधनश्च तान् वीरान् वारयामास सान्त्वयन् ॥ १७ ॥ न चास्य शासनं केचित्तत्र चक्रुर्महारथाः । दुर्योधनने उन वीरोंको सान्त्वना देते हुए बहुत मना किया, किंतु वहाँ किन्हीं महारथियोंने उसकी इस आज्ञाका पालन नहीं किया ॥ १७ १/२ ॥ ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरब्रवीत् ॥ १८ ॥ दुर्योधनं महाराज वचनं वचनक्षमः । महाराज! तब प्रवचनपटु गान्धारराजपुत्र शकुनिने दुर्योधनसे यह बात कही— ॥ १८ १/२ ॥ किं नः सम्प्रेक्षमाणानां मद्राणां हन्यते बलम् ॥ १९ ॥ न युक्तमेतत् समरे त्वयि तिष्ठति भारत । ‘भारत! हमलोगोंके देखते-देखते मद्रदेशकी यह सेना क्यों मारी जाती है? तुम्हारे रहते ऐसा कदापि नहीं होना चाहिये ॥ १९ १/२ ॥ सहितैश्चापि योद्धव्यमित्येष समयः कृतः ॥ २० ॥ अथ कस्मात् परानेव घ्नतो मर्षयसे नृप । ‘यह शपथ ली जा चुकी है कि ‘हम सब लोग एक साथ होकर लड़ें।’ नरेश्वर! ऐसी दशामें शत्रुओंको अपनी सेनाका संहार करते देखकर भी तुम क्यों सहन करते हो?’ ॥ २० १/२ ॥

दुर्योधन उवाच वार्यमाणा मया पूर्वं नैते चक्रुर्वचो मम ॥ २१ ॥ एते विनिहताः सर्वे प्रस्कन्नाः पाण्डुवाहिनीम् । दुर्योधनने कहा—मैंने पहले ही इन्हें बहुत मना किया था, परंतु इन लोगोंने मेरी बात नहीं मानी और पाण्डवसेनामें घुसकर ये प्रायः सब-के-सब मारे गये ॥

शकुनिरुवाच न भर्तुः शासनं वीरा रणे कुर्वन्त्यमर्षिताः ॥ २२ ॥ अलं क्रोद्धुमथैतेषां नायं काल उपेक्षितुम् । यामः सर्वे च सम्भूय सवाजिरथकुञ्जराः ॥ २३ ॥ परित्रातुं महेष्वासान् मद्रराजपदानुगान् । अन्योन्यं परिरक्षामो यत्नेन महता नृप ॥ २४ ॥

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