महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2585, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके सिवा दूसरा कौन ऐसा राजा है जो रणभूमिमें भीष्म, द्रोण, कर्ण, मद्रराज शल्य तथा अन्य सैकड़ों-हजारों नरपतियोंपर विजय प्राप्त कर सके। सदा सत्य और यशके सागर भगवान् श्रीकृष्ण जिनके स्वामी एवं रक्षक हैं, उन्हींको यह सफलता प्राप्त हो सकती है’॥
इत्येवं वदमानास्ते हर्षेण महता युताः।
प्रभग्नांस्तावकान् योधान् सृञ्जयाः पृष्ठतोऽन्वयुः॥ ३०॥
इस तरहकी बातें करते हुए सृंजयवीर अत्यन्त हर्षमें भरकर आपके भागते हुए योद्धाओंका पीछा करने लगे॥ ३०॥
धनंजयो रथानीकमभ्यवर्तत वीर्यवान्।
माद्रीपुत्रौ च शकुनिं सात्यकिश्च महारथः॥ ३१॥
इसी समय पराक्रमी अर्जुनने आपकी रथसेनापर धावा किया। साथ ही नकुल-सहदेव और महारथी सात्यकिने शकुनिपर चढ़ाई की॥ ३१॥
तान् प्रेक्ष्य द्रवतः सर्वान् भीमसेनभयार्दितान्।
दुर्योधनस्तदा सूतमब्रवीद् विजयाय च॥ ३२॥
भीमसेनके भयसे पीड़ित हुए अपने उन समस्त योद्धाओंको भागते देख दुर्योधनने विजयकी इच्छासे अपने सारथिसे कहा—॥ ३२॥
मामतिक्रमते पार्थो धनुष्पाणिमवस्थितम्।
जघने सर्वसैन्यानां ममाश्वान् प्रतिपादय॥ ३३॥
‘सूत! मैं यहाँ हाथमें धनुष लिये खड़ा हूँ और अर्जुन मुझे लाँघ जानेकी चेष्टा कर रहे हैं। अतः तुम मेरे घोड़ोंको सारी सेनाके पिछले भागमें पहुँचा दो॥ ३३॥
जघने युध्यमानं हि कौन्तेयो मां समन्ततः।
नोत्सहेदभ्यतिक्रान्तुं वेलामिव महोदधिः॥ ३४॥
‘पृष्ठभागमें रहकर युद्ध करते समय मुझे अर्जुन किसी ओरसे भी लाँघनेका साहस नहीं कर सकते। ठीक वैसे ही, जैसे महासागर अपने तटप्रान्तको नहीं लाँघ पाता है॥
पश्य सैन्यं महत् सूत पाण्डवैः समभिद्रुतम्।
सैन्यरेणुं समुद्भूतं पश्यस्वैनं समन्ततः॥ ३५॥
‘सारथे! देखो, पाण्डव मेरी विशाल सेनाको खदेड़ रहे हैं और सैनिकोंके दौड़नेसे उठी हुई धूल जो सब ओर छा गयी है उसपर भी दृष्टिपात करो॥ ३५॥
सिंहनादांश्च बहुशः शृणु घोरान् भयावहान्।
तस्माद् याहि शनैः सूत जघनं परिपालय॥ ३६॥
‘सूत! वह सुनो, बारंबार भय उत्पन्न करनेवाले घोर सिंहनाद हो रहे हैं। इसलिये तुम धीरे-धीरे चलो और सेनाके पृष्ठभागकी रक्षा करो॥ ३६॥
मयि स्थिते च समरे निरुद्धेषु च पाण्डुषु।