भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2586

पुनरावर्तते तूर्णं मापकं बलमोजसा ॥ ३७ ॥
‘जब मैं समरांगणमें खड़ा होऊँगा और पाण्डवोंका बढ़ाव रुक जायगा, तब मेरी सेना पुनः शीघ्र ही लौट आयेगी और सारी शक्ति लगाकर युद्ध करेगी’ ॥ ३७ ॥
तच्छ्रुत्वा तव पुत्रस्य शूरार्यसदृशं वचः ।
सारथिर्हेमसंछन्नान् शनैरश्वानचोदयत् ॥ ३८ ॥
राजन्! आपके पुत्रका यह श्रेष्ठ वीरोचित वचन सुनकर सारथिने सोनेके साज-बाजसे सजे हुए घोड़ोंको धीरे-धीरे आगे बढ़ाया ॥ ३८ ॥
गजाश्वरथिभिर्हीनास्त्यक्तात्मानः पदातयः ।
एकविंशतिसाहस्राः संयुगायावतस्थिरे ॥ ३९ ॥
उस समय वहाँ हाथीसवार, घुड़सवार तथा रथियोंसे रहित इक्कीस हजार केवल पैदल योद्धा अपने जीवनका मोह छोड़कर युद्धके लिये डट गये ॥ ३९ ॥
नानादेशसमुद्भूता नानानगरवासिनः ।
अवस्थितास्तदा योधाः प्रार्थयन्तो महद् यशः ॥ ४० ॥
वे अनेक देशोंमें उत्पन्न और अनेक नगरोंके निवासी वीर सैनिक महान् यशकी अभिलाषा रखते हुए वहाँ युद्ध करनेके लिये खड़े हुए थे ॥ ४० ॥
तेषामापततां तत्र संहृष्टानां परस्परम् ।
संमर्दः सुमहाञ् जज्ञे घोररूपो भयानकः ॥ ४१ ॥
परस्पर हर्षमें भरकर एक-दूसरेपर आक्रमण करनेवाले उभयपक्षके सैनिकोंका वह घोर एवं महान् संघर्ष बड़ा भयंकर हुआ ॥ ४१ ॥
भीमसेनस्तदा राजन् धृष्टद्युम्नश्च पार्वतः ।
बलेन चतुरङ्गेन नानादेश्यानवारयत् ॥ ४२ ॥
राजन्! उस समय भीमसेन और द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न चतुरंगिणी सेना साथ लेकर उन अनेकदेशीय सैनिकोंको रोकने लगे ॥ ४२ ॥
भीममेवाभ्यवर्तन्त रणेऽन्ये तु पदातयः ।
प्रक्ष्वेड्यास्फोट्य संहृष्टा वीरलोकं यियासवः ॥ ४३ ॥
तब रणभूमिमें अन्य पैदल योद्धा हर्ष और उत्साहमें भरकर भुजाओंपर ताल ठोंकते और सिंहनाद करते हुए वीरलोकमें जानेकी इच्छासे भीमसेनके ही सामने आ पहुँचे ॥ ४३ ॥
आसाद्य भीमसेनं तु संरब्धा युद्धदुर्मदाः ।
धार्तराष्ट्रा विनेदुर्हि नान्यामकथयन् कथाम् ॥ ४४ ॥
भीमसेनके पास पहुँचकर वे रोषभरे रणदुर्मद कौरवयोद्धा केवल गर्जना करने लगे, मुँहसे दूसरी कोई बात नहीं कहते थे ॥ ४४ ॥
परिवार्य रणे भीमं निजघ्नुस्ते समन्ततः ।