महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस वध्यमानः समरे पदातिगणसंवृतः ।। ४५ ।। न चचाल ततः स्थानान्मैनाक इव पर्वतः । उन्होंने रणभूमिमें भीमसेनको चारों ओरसे घेरकर उनपर प्रहार आरम्भ कर दिया। समरांगणमें पैदल सैनिकोंसे घिरे हुए भीमसेन उनके अस्त्र-शस्त्रोंकी चोट सहते हुए भी मैनाक पर्वतके समान अपने स्थानसे विचलित नहीं हुए ।। ४५ १/२ ।।
ते तु क्रुद्धा महाराज पाण्डवस्य महारथम् ।। ४६ ।। निग्रहीतुं प्रवृत्ता हि योधांश्चान्यानवारयन् । महाराज! वे सभी सैनिक कुपित हो पाण्डव महारथी भीमसेनको पकड़नेकी चेष्टामें संलग्न हो गये और दूसरे योद्धाओंको भी आगे बढ़नेसे रोकने लगे ।।
अक्रुध्यत रणे भीमस्तैस्तदा पर्यवस्थितैः ।। ४७ ।। सोऽवतीर्य रथात् तूर्णं पदातिः समवस्थितः । जातरूपप्रतिच्छन्नां प्रगृह्य महतीं गदाम् ।। ४८ ।। अवधीत् तावकान् योधान् दण्डपाणिरिवान्तकः । उनके इस प्रकार सब ओर खड़े होनेपर उस समय रणभूमिमें भीमसेनको बड़ा क्रोध हुआ। वे तुरंत अपने रथसे उतरकर पैदल खड़े हो गये और सोनेसे जड़ी हुई विशाल गदा हाथमें लेकर दण्डधारी यमराजके समान आपके उन योद्धाओंका संहार करने लगे ।। ४७-४८ १/२ ।।
विप्रहीणरथाश्वांस्तानवधीत् पुरुषर्षभः ।। ४९ ।। एकविंशतिसाहस्रान् पदातीन् समपोथयत् । रथ और घोड़ोंसे रहित उन इक्कीसों हजार पैदल सैनिकोंको पुरुषप्रवर भीमने गदासे मारकर धराशायी कर दिया ।। ४९ १/२ ।।
हत्वा तत् पुरुषानीकं भीमः सत्यपराक्रमः ।। ५० ।। धृष्टद्युम्नं पुरस्कृत्य नचिरात् प्रत्यदृश्यत । सत्यपराक्रमी भीमसेन उस पैदल सेनाका संहार करके थोड़ी ही देरमें धृष्टद्युम्नको आगे किये दिखायी दिये ।।
पादाता निहता भूमौ शिशियरे रुधिरोक्षिताः ।। ५१ ।। सम्भग्ना इव वातेन कर्णिकाराः सुपुष्पिताः । मारे गये पैदल सैनिक खूनसे लथपथ हो पृथ्वीपर सदाके लिये सो गये, मानो हवाके उखाड़े हुए सुन्दर लाल फूलोंसे भरे कनेरके वृक्ष पड़े हों ।। ५१ १/२ ।।
नानाशस्त्रसमायुक्ता नानाकुण्डलधारिणः ।। ५२ ।। नानाजात्या हतास्तत्र नानादेशसमागताः ।