महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2599, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअविध्यन्निशितैर्बाणैश्चतुर्भिंश्चतुरो हयान् ।। १५ ।।
कृतवर्माने अद्वितीय वीर सत्यपराक्रमी सात्यकिके पास पहुँचकर चार पैने बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको घायल कर दिया ।। १५ ।।
स दीर्घबाहुः संक्रुद्धस्तोत्रार्दित इव द्विपः ।
अष्टभिः कृतवर्माणमविध्यत् परमेषुभिः ।। १६ ।।
तब महाबाहु सात्यकिने अंकुशोंकी चोट खाये हुए गजराजके समान अत्यन्त क्रोधमें भरकर आठ उत्तम बाणोंद्वारा कृतवर्माको घायल कर दिया ।। १६ ।।
ततः पूर्णायतोत्सृष्टैः कृतवर्मा शिलाशितैः ।
सात्यकिं त्रिभिराहत्य धनुरेकेन चिच्छिदे ।। १७ ।।
यह देख कृतवर्माने धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये और शिलापर तेज किये हुए तीन बाणोंसे सात्यकिको घायल करके एकसे उनके धनुषको काट डाला ।। १७ ।।
निकृत्तं तद् धनुः श्रेष्ठमपास्य शिनिपुङ्गवः ।
अन्यदादत्त वेगेन शैनेयः सशरं धनुः ।। १८ ।।
उस कटे हुए श्रेष्ठ धनुषको फेंककर शिनिप्रवर सात्यकिने बाणसहित दूसरे धनुषको वेगपूर्वक हाथमें ले लिया ।। १८ ।।
तदादाय धनुः श्रेष्ठं वरिष्ठः सर्वधन्विनाम् ।
आरोप्य च धनुः शीघ्रं महावीर्यो महाबलः ।। १९ ।।
अमृष्यमाणो धनुषश्छेदनं कृतवर्मणा ।
कुपितोऽतिरथः शीघ्रं कृतवर्माणमभ्ययात् ।। २० ।।
सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ महाबली एवं महापराक्रमी युयुधानने उस उत्तम धनुषको लेकर शीघ्र ही उसपर बाण चढ़ाया और कृतवर्माके द्वारा अपने धनुषका काटा जाना सहन न करके उन अतिरथी वीरने कुपित हो शीघ्रतापूर्वक उसपर आक्रमण किया ।। १९-२० ।।
ततः सुनिशितैर्बाणैर्दशभिः शिनिपुङ्गवः ।
जघान सूतं चाश्वांश्च ध्वजं च कृतवर्मणः ।। २१ ।।
तत्पश्चात् शिनिप्रवर सात्यकिने अत्यन्त तीखे दस बाणोंके द्वारा कृतवर्माके ध्वज, सारथि और घोड़ोंको नष्ट कर दिया ।। २१ ।।
ततो राजन् महेष्वासः कृतवर्मा महारथः ।
हताश्वसूतं सम्प्रेक्ष्य रथं हेमपरिष्कृतम् ।। २२ ।।
रोषेण महताऽऽविष्टः शूलमुद्यम्य मारिष ।
चिक्षेप भुजवेगेन जिघांसुः शिनिपुङ्गवम् ।। २३ ।।
राजन्! महाधनुर्धर महारथी कृतवर्मा अपने सुवर्ण-भूषित रथको घोड़े और सारथिसे रहित देख महान् रोषसे भर गया। मान्यवर! फिर उसने शिनिप्रवर सात्यकिको मार