महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अविध्यन्निशितैर्बाणैश्चतुर्भिंश्चतुरो हयान् ।। १५ ।।
कृतवर्माने अद्वितीय वीर सत्यपराक्रमी सात्यकिके पास पहुँचकर चार पैने बाणोंसे उनके चारों घोड़ोंको घायल कर दिया ।। १५ ।।
स दीर्घबाहुः संक्रुद्धस्तोत्रार्दित इव द्विपः ।
अष्टभिः कृतवर्माणमविध्यत् परमेषुभिः ।। १६ ।।
तब महाबाहु सात्यकिने अंकुशोंकी चोट खाये हुए गजराजके समान अत्यन्त क्रोधमें भरकर आठ उत्तम बाणोंद्वारा कृतवर्माको घायल कर दिया ।। १६ ।।
ततः पूर्णायतोत्सृष्टैः कृतवर्मा शिलाशितैः ।
सात्यकिं त्रिभिराहत्य धनुरेकेन चिच्छिदे ।। १७ ।।
यह देख कृतवर्माने धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये और शिलापर तेज किये हुए तीन बाणोंसे सात्यकिको घायल करके एकसे उनके धनुषको काट डाला ।। १७ ।।
निकृत्तं तद् धनुः श्रेष्ठमपास्य शिनिपुङ्गवः ।
अन्यदादत्त वेगेन शैनेयः सशरं धनुः ।। १८ ।।
उस कटे हुए श्रेष्ठ धनुषको फेंककर शिनिप्रवर सात्यकिने बाणसहित दूसरे धनुषको वेगपूर्वक हाथमें ले लिया ।। १८ ।।
तदादाय धनुः श्रेष्ठं वरिष्ठः सर्वधन्विनाम् ।
आरोप्य च धनुः शीघ्रं महावीर्यो महाबलः ।। १९ ।।
अमृष्यमाणो धनुषश्छेदनं कृतवर्मणा ।
कुपितोऽतिरथः शीघ्रं कृतवर्माणमभ्ययात् ।। २० ।।
सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ महाबली एवं महापराक्रमी युयुधानने उस उत्तम धनुषको लेकर शीघ्र ही उसपर बाण चढ़ाया और कृतवर्माके द्वारा अपने धनुषका काटा जाना सहन न करके उन अतिरथी वीरने कुपित हो शीघ्रतापूर्वक उसपर आक्रमण किया ।। १९-२० ।।
ततः सुनिशितैर्बाणैर्दशभिः शिनिपुङ्गवः ।
जघान सूतं चाश्वांश्च ध्वजं च कृतवर्मणः ।। २१ ।।
तत्पश्चात् शिनिप्रवर सात्यकिने अत्यन्त तीखे दस बाणोंके द्वारा कृतवर्माके ध्वज, सारथि और घोड़ोंको नष्ट कर दिया ।। २१ ।।
ततो राजन् महेष्वासः कृतवर्मा महारथः ।
हताश्वसूतं सम्प्रेक्ष्य रथं हेमपरिष्कृतम् ।। २२ ।।
रोषेण महताऽऽविष्टः शूलमुद्यम्य मारिष ।
चिक्षेप भुजवेगेन जिघांसुः शिनिपुङ्गवम् ।। २३ ।।
राजन्! महाधनुर्धर महारथी कृतवर्मा अपने सुवर्ण-भूषित रथको घोड़े और सारथिसे रहित देख महान् रोषसे भर गया। मान्यवर! फिर उसने शिनिप्रवर सात्यकिको मार
डालनेकी इच्छासे एक शूल उठाकर उसे अपनी भुजाओंके सम्पूर्ण वेगसे चला दिया ॥ २२-२३ ॥ तच्छूलं सात्वतो ह्याजाै निर्भिद्य निशितैः शरैः । चूर्णितं पातयामास मोहयन्निव माधवम् ॥ २४ ॥ परंतु सात्यकिने युद्धस्थलमें अपने पैने बाणोंद्वारा उस शूलको काटकर चकनाचूर कर दिया और कृतवर्माको मोहमें डालते हुए-से उस चूर-चूर हुए शूलको पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ २४ ॥ ततोऽपरेण भल्लेन हृद्येनं समताडयत् । स युद्धे युयुधानेन हताश्वो हतसारथिः ॥ २५ ॥ कृतवर्मा कृतस्तेन धरणीमन्वपद्यत । इसके बाद उन्होंने कृतवर्माकी छातीमें एक भल्लद्वारा गहरी चोट पहुँचायी। तब वह युयुधानद्वारा घोड़ों और सारथिसे रहित किया हुआ कृतवर्मा रथ छोड़कर युद्धस्थलमें पृथ्वीपर खड़ा हो गया ॥ २५ १/२ ॥ तस्मिन् सात्यकिना वीरे द्वैरथे विरथीकृते ॥ २६ ॥ समपद्यत सर्वेषां सैन्यानां सुमहद् भयम् । उस द्वैरथ युद्धमें सात्यकिद्वारा वीर कृतवर्माके रथहीन हो जानेपर आपके सारे सैनिकोंके मनमें महान् भय समा गया ॥ २६ १/२ ॥ पुत्रस्य तव चात्यर्थं विषादः समजायत ॥ २७ ॥ हतसूते हताश्वे तु विरथे कृतवर्मणि । जब कृतवर्माके घोड़े और सारथि मारे गये तथा वह रथहीन हो गया, तब आपके पुत्र दुर्योधनके मनमें बड़ा खेद हुआ ॥ २७ १/२ ॥ हताश्वं च समालक्ष्य हतसूतमरिंदम ॥ २८ ॥ अभ्यधावत् कृपो राजन् जिघांसुः शिनिपुङ्गवम् । शत्रुदमन नरेश! कृतवर्माके घोड़ों और सारथिको मारा गया देख कृपाचार्य सात्यकिको मार डालनेकी इच्छासे वहाँ दौड़े हुए आये ॥ २८ १/२ ॥ तमारोप्य रथोपस्थे मिषतां सर्वधन्विनाम् ॥ २९ ॥ अपोवाह महाबाहुं तूर्णमायोधनादपि । फिर सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते-देखते महाबाहु कृतवर्माको अपने रथपर बिठाकर वे उसे तुरंत ही युद्धस्थलसे दूर हटा ले गये ॥ २९ १/२ ॥ शैनेयेऽधिष्ठिते राजन् विरथे कृतवर्मणि ॥ ३० ॥ दुर्योधनबलं सर्वं पुनरासीत् पराङ्मुखम् ।
राजन्! जब सात्यकि युद्धके लिये डटे रहे और कृतवर्मा रथहीन होकर भाग गया, तब दुर्योधनकी सारी सेना पुनः युद्धसे विमुख हो वहाँसे पलायन करने लगी ।। ३० १/२ ।। तत् परे नान्वाबुध्यन्त सैन्येन रजसा वृताः ।। ३१ ।। तावकाः प्रद्रुता राजन् दुर्योधनमृते नृपम् । परंतु सेनाद्वारा उड़ायी हुई धूलसे आच्छादित होनेके कारण शत्रुओंके सैनिक कौरव-सेनाके भागनेकी बात न जान सके। राजन्! राजा दुर्योधनके सिवा, आपके सभी योद्धा वहाँसे भाग गये ।। ३१ १/२ ।। दुर्योधनस्तु सम्प्रेक्ष्य भग्नं स्वबलमन्तिकात् ।। ३२ ।। जवेनाभ्यपतत् तूर्णं सर्वांश्चैको न्यवारयत् । दुर्योधन अपनी सेनाको निकटसे भागती देख बड़े वेगसे शत्रुओंपर टूट पड़ा और उन सबको अकेले ही शीघ्रतापूर्वक रोकने लगा ।। ३२ १/२ ।। पाण्डूंश्च सर्वान् संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नं च पार्षतम् ।। ३३ ।। शिखण्डिनं द्रौपदेयान् पञ्चालानां च ये गणाः । केकयान् सोमकांश्चैव सृञ्जयांश्चैव मारिष ।। ३४ ।। असम्भ्रमं दुराधर्षः शितैर्बाणैरवाकिरत् । अतिष्ठदाहवे यत्तः पुत्रस्तव महाबलः ।। ३५ ।। माननीय नरेश! उस समय क्रोधमें भरा हुआ आपका महाबली पुत्र दुर्धर्ष दुर्योधन सावधान हो बिना किसी घबराहटके समस्त पाण्डवों, द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, द्रौपदीके पाँचों पुत्रों, पांचालों, केकयों, सोमकों और सृंजयोंपर पैने बाणोंकी वर्षा करने लगा तथा निर्भय होकर युद्धभूमिमें डटा रहा ।। ३३—३५ ।। यथा यज्ञे महानग्निर्मन्त्रपूतः प्रकाशवान् । तथा दुर्योधनो राजा संग्रामे सर्वतोऽभवत् ।। ३६ ।। जैसे यज्ञमें मन्त्रोंद्वारा पवित्र हुए महान् अग्निदेव प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार संग्राममें राजा दुर्योधन सब ओरसे देदीप्यमान हो रहा था ।। ३६ ।। तं परे नाभ्यवर्तन्त मर्त्या मृत्युमिवाहवे । अथान्यं रथमास्थाय हार्दिक्यः समपद्यत ।। ३७ ।। जैसे मरणधर्मा मनुष्य अपनी मृत्युका उल्लंघन नहीं कर सकते, उसी प्रकार युद्धभूमिमें शत्रुसैनिक राजा दुर्योधनका सामना न कर सके। इतनेहीमें कृतवर्मा दूसरे रथपर आरूढ़ होकर वहाँ आ पहुँचा ।। ३७ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि सात्यकिकृतवर्मयुद्धे एकविंशोऽध्यायः ।। २१ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें सात्यकि और कृतवर्माका युद्धविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। २१ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2603)
द्वाविंशोऽध्यायः
दुर्योधनका पराक्रम और उभयपक्षकी सेनाओंका घोर संग्राम
संजय उवाच
पुत्रस्तु ते महाराज रथस्थो रथिनां वरः ।
दुरुत्सहो बभौ युद्धे यथा रुद्रः प्रतापवान् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! रथपर बैठा हुआ रथियोंमें श्रेष्ठ आपका प्रतापी पुत्र दुर्योधन रुद्रदेवके समान युद्धमें शत्रुओंके लिये दुःसह प्रतीत होने लगा ॥ १ ॥
तस्य बाणसहस्रैस्तु प्रच्छन्ना ह्यभवन्मही ।
परांश्च सिषिचे बाणैर्धाराभिरिव पर्वतान् ॥ २ ॥
उसके सहस्रों बाणोंसे वहाँकी सारी पृथ्वी आच्छादित हो गयी। जैसे मेघ जलकी धाराओंसे पर्वतको सींचते हैं, उसी प्रकार वह शत्रुओंको अपनी बाणधारासे नहलाने लगा ॥ २ ॥
न च सोऽस्ति पुमान् कश्चित् पाण्डवानां बलार्णवे ।
हयो गजो रथो वापि यः स्याद् बाणैरविक्षतः ॥ ३ ॥
पाण्डवोंके सैन्यसागरमें कोई भी ऐसा मनुष्य, घोड़ा, हाथी अथवा रथ नहीं था, जो दुर्योधनके बाणोंसे क्षत-विक्षत न हुआ हो ॥ ३ ॥
यं यं हि समरे योधं प्रपश्यामि विशाम्पते ।
स स बाणैश्चितोऽभूद् वै पुत्रेण तव भारत ॥ ४ ॥
प्रजानाथ! भरतनन्दन! मैं समरांगणमें जिस-जिस योद्धाको देखता था, वही-वही आपके पुत्रके बाणोंसे व्याप्त हुआ दिखायी देता था ॥ ४ ॥
यथा सैन्येन रजसा समुद्धूतेन वाहिनी ।
प्रत्यदृश्यत संछन्ना तथा बाणैर्महात्मनः ॥ ५ ॥
जैसे सैनिकोंद्वारा उड़ायी हुई धूलसे सारी सेना आच्छादित हो गयी थी, उसी प्रकार वह महामनस्वी दुर्योधनके बाणोंसे ढकी दिखायी देती थी ॥ ५ ॥
बाणभूतामपश्याम पृथिवीं पृथिवीपते ।
दुर्योधनेन प्रकृतां क्षिप्रहस्तेन धन्विना ॥ ६ ॥
पृथिवीपते! हमने देखा कि शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले धनुर्धर वीर दुर्योधनने सारी रणभूमिको बाणमयी कर दिया है ॥ ६ ॥
तेषु योधसहस्रेषु तावकेषु परेषु च ।
एको दुर्योधनो ह्यासीत् पुमानिति मतिर्मम ॥ ७ ॥ आपके या शत्रुपक्षके सहस्रों योद्धाओंमें मुझे एकमात्र दुर्योधन ही वीर पुरुष जान पड़ता था ॥ ७ ॥
तत्राद्भुतमपश्याम तव पुत्रस्य विक्रमम् । यदेकं सहिताः पार्था नाभ्यवर्तन्त भारत ॥ ८ ॥ भारत! हमने वहाँ आपके पुत्रका यह अद्भुत पराक्रम देखा कि समस्त पाण्डव एक साथ मिलकर भी उस एकाकी वीरका सामना नहीं कर सके ॥ ८ ॥
युधिष्ठिरं शतेनाजौ विव्याध भरतर्षभ । भीमसेनं च सप्तत्या सहदेवं च पञ्चभिः ॥ ९ ॥ नकुलं च चतुःषष्ट्या धृष्टद्युम्नं च पञ्चभिः । सप्तभिर्द्रौपदेयांश्च त्रिभिर्विव्याध सात्यकिम् ॥ १० ॥ धनुश्चिच्छेद भल्लेन सहदेवस्य मारिष । भरतश्रेष्ठ! उसने युद्धस्थलमें युधिष्ठिरको सौ, भीमसेनको सत्तर, सहदेवको पाँच, नकुलको चौंसठ, धृष्टद्युम्नको पाँच, द्रौपदीके पुत्रोंको सात तथा सात्यकिको तीन बाणोंसे घायल कर दिया। मान्यवर! साथ ही उसने एक भल्ल मारकर सहदेवका धनुष भी काट डाला ॥
तदपास्य धनुश्छिन्नं माद्रीपुत्रः प्रतापवान् ॥ ११ ॥ अभ्यद्रवत राजानं प्रगृह्यान्यन्महद् धनुः । ततो दुर्योधनं संख्ये विव्याध दशभिः शरैः ॥ १२ ॥ प्रतापी माद्रीपुत्र सहदेवने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा विशाल धनुष हाथमें ले राजा दुर्योधनपर धावा किया और युद्धस्थलमें दस बाणोंसे उसे घायल कर दिया ॥
नकुलस्तु ततो वीरो राजानं नवभिः शरैः । घोररूपैर्महेष्वासो विव्याध च ननाद च ॥ १३ ॥ इसके बाद महाधनुर्धर वीर नकुलने नौ भयंकर बाणोंद्वारा राजा दुर्योधनको बींध डाला और उच्चस्वरसे गर्जना की ॥ १३ ॥
सात्यकिश्चैव राजानं शरेणानतपर्वणा । द्रौपदेयास्त्रिसप्तत्या धर्मराजश्च पञ्चभिः ॥ १४ ॥ अशीत्या भीमसेनश्च शरै राजानमर्पयन् । फिर सात्यकिने भी झुकी हुई गाँठवाले एक बाणसे राजाको घायल कर दिया। तदनन्तर द्रौपदीके पुत्रोंने राजा दुर्योधनको तिहत्तर, धर्मराजने पाँच और भीमसेनने अस्सी बाण मारे ॥ १४ १/२ ॥
समन्तात् कीर्यमाणस्तु बाणसंघैर्महात्मभिः ॥ १५ ॥ न चचाल महाराज सर्वसैन्यस्य पश्यतः ।
महाराज! वे महामनस्वी वीर सारी सेनाके देखते-देखते दुर्योधनपर चारों ओरसे बाणसमूहोंकी वर्षा कर रहे थे तो भी वह विचलित नहीं हुआ ॥ १५ १/२ ॥ लाघवं सौष्ठवं चापि वीर्यं चापि महात्मनः ॥ १६ ॥ अति सर्वाणि भूतानि ददृशुः सर्वमानवाः । उस महामनस्वी वीरकी फुर्ती, अस्त्र-संचालनका सुन्दर ढंग तथा पराक्रम—इन सबको सब लोगोंने सम्पूर्ण प्राणियोंसे बढ़-चढ़कर देखा ॥ १६ १/२ ॥ धार्तराष्ट्रा हि राजेन्द्र योधास्तु स्वल्पमन्तरम् ॥ १७ ॥ अपश्यमाना राजानं पर्यवर्तन्त दंशिताः । राजेन्द्र! आपके योद्धा थोड़ा-सा भी अन्तर न देखकर कवच आदिसे सुसज्जित हो राजा दुर्योधनको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ १७ १/२ ॥ तेषामापततां घोरस्तुमुलः समपद्यत ॥ १८ ॥ क्षुब्धस्य हि समुद्रस्य प्रावृट्काले यथा स्वनः । जैसे वर्षाकालमें विक्षुब्ध हुए समुद्रकी भीषण गर्जना सुनायी देती है, उसी प्रकार उन आक्रमणकारी कौरवोंका घोर एवं भयंकर कोलाहल प्रकट होने लगा ॥ समासाद्य रणे ते तु राजानमपराजितम् ॥ १९ ॥ प्रत्युद्ययुर्महेष्वासाः पाण्डवानातातयिनः । वे महाधनुर्धर कौरवयोद्धा रणभूमिमें अपराजित राजा दुर्योधनके पास पहुँचकर आततायी पाण्डवोंपर जा चढ़े ॥ १९ १/२ ॥ भीमसेनं रणे क्रुद्धो द्रोणपुत्रो न्यवारयत् ॥ २० ॥ नानाबाणैर्महाराज प्रमुक्तैः सर्वतोदिशम् । नाज्ञायन्त रणे वीरा न दिशः प्रदिशः कुतः ॥ २१ ॥ महाराज! रणक्षेत्रमें कुपित हुए द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने सम्पूर्ण दिशाओंमें छोड़े गये अनेक प्रकारके बाणोंद्वारा भीमसेनको आगे बढ़नेसे रोक दिया। उस समय संग्राममें न तो वीरोंकी पहचान होती थी और न दिशाओंकी, फिर अवान्तर-दिशाओं (कोणों)-की तो बात ही क्या है? ॥ २०-२१ ॥ तावुभौ क्रूरकर्माणवुभौ भारत दुःसहौ । घोररूपमयुध्येतां कृतप्रतिकृतैषिणौ ॥ २२ ॥ भारत! वे दोनों वीर क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले और शत्रुओंके लिये दुःसह थे। अतः एक-दूसरेके प्रहारका भरपूर जवाब देनेकी इच्छा रखकर वे घोर युद्ध करने लगे ॥ २२ ॥ त्रासयन्तौ दिशः सर्वा ज्याक्षेपकठिनत्वचौ । शकुनिस्तु रणे वीरो युधिष्ठिरमपीडयत् ॥ २३ ॥ प्रत्यंचा खींचनेसे उनके हाथोंकी त्वचा बहुत कठोर हो गयी थी और वे सम्पूर्ण दिशाओंको आतंकित कर रहे थे। दूसरी ओर वीर शकुनि रणभूमिमें युधिष्ठिरको पीड़ा देने
लगा ।। २३ ।।
तस्याश्वांश्चतुरो हत्वा सुबलस्य सुतो विभो ।
नादं चकार बलवत् सर्वसैन्यानि कोपयन् ।। २४ ।।
प्रभो! सुबलके उस पुत्रने युधिष्ठिरके चारों घोड़ोंको मारकर सम्पूर्ण सेनाओंका क्रोध बढ़ाते हुए बड़े जोरसे सिंहनाद किया ।। २४ ।।
एतस्मिन्नन्तरे वीरं राजानमपराजितम् ।
अपोवाह रथेनाजौ सहदेवः प्रतापवान् ।। २५ ।।
इसी बीचमें प्रतापी सहदेव युद्धमें किसीसे परास्त न होनेवाले वीर राजा युधिष्ठिरको अपने रथपर बिठाकर दूर हटा ले गये ।। २५ ।।
अथान्यं रथमास्थाय धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
शकुनिं नवभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः ।। २६ ।।
तदनन्तर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने दूसरे रथपर आरूढ़ हो पुनः धावा किया और शकुनिको पहले नौ बाणोंसे घायल करके फिर पाँच बाणोंसे बींध डाला ।। २६ ।।
ननाद च महानादं प्रवरः सर्वधन्विनाम् ।
तद् युद्धमभवच्चित्रं घोररूपं च मारिष ।। २७ ।।
प्रेक्षतां प्रीतिजननं सिद्धचारणसेवितम् ।
इसके बाद सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने बड़े जोरसे सिंहनाद किया। मान्यवर! उनका वह युद्ध विचित्र, भयंकर, सिद्धों और चारणोंद्वारा सेवित तथा दर्शकोंका हर्ष बढ़ानेवाला था ।। २७ १/२ ।।
उलूकस्तु महेष्वासं नकुलं युद्धदुर्मदम् ।। २८ ।।
अभ्यद्रवदमेयात्मा शरवर्षैः समन्ततः ।
दूसरी ओर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न उलूकने महाधनुर्धर रणदुर्मद नकुलपर चारों ओरसे बाणोंकी वर्षा करते हुए धावा किया ।। २८ १/२ ।।
तथैव नकुलः शूरः सौबलस्य सुतं रणे ।। २९ ।।
शरवर्षेण महता समन्तात् पर्यवारयत् ।
इसी प्रकार शूरवीर नकुलने रणभूमिमें शकुनिके पुत्रको बड़ी भारी बाणवर्षाके द्वारा सब ओरसे अवरुद्ध कर दिया ।। २९ १/२ ।।
तौ तत्र समरे वीरौ कुलपुत्रौ महारथौ ।। ३० ।।
योधयन्तावपश्येतां कृतप्रतिकृतैषिणौ ।
वे दोनों वीर महारथी उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए थे! अतः समरांगणमें एक-दूसरेके प्रहारका प्रतीकार करनेकी इच्छा रखकर जूझते दिखायी देते थे ।। ३० १/२ ।।
तथैव कृतवर्माणं शैनेयः शत्रुतापनः ।। ३१ ।।
योधयन् शुशुभे राजन् बलिं शक्र इवाहवे ।
राजन्! इसी तरह शत्रुसंतापी सात्यकि कृतवर्माके साथ युद्ध करते हुए युद्धस्थलमें उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे इन्द्र बलिके साथ ।। ३१ १/२ ।।
दुर्योधनो धनुश्छित्त्वा धृष्टद्युम्नस्य संयुगे ।। ३२ ।।
अथैनं छिन्नधन्वानं विव्याध निशितैः शरैः ।
दुर्योधनने युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नका धनुष काट दिया और धनुष कट जानेपर उन्हें पैने बाणोंसे बींध डाला ।।
धृष्टद्युम्नोऽपि समरे प्रगृह्य परमायुधम् ।। ३३ ।।
राजानं योधयामास पश्यतां सर्वधन्विनाम् ।
तब धृष्टद्युम्न भी दूसरा उत्तम धनुष लेकर समरभूमिमें सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते-देखते राजा दुर्योधनके साथ युद्ध करने लगे ।। ३३ १/२ ।।
तयोर्युद्धं महच्चासीत् संग्रामे भरतर्षभ ।। ३४ ।।
प्रभिन्नयोर्यथा सक्तं मत्तयोर्वरहस्तिनोः ।
भरतश्रेष्ठ! रणभूमिमें उन दोनोंका महान् युद्ध ऐसा जान पड़ता था, मानो मदकी धारा बहानेवाले दो उत्तम मतवाले हाथी आपसमें जूझ रहे हों ।। ३४ १/२ ।।
गौतमस्तु रणे क्रुद्धो द्रौपदेयान् महाबलान् ।। ३५ ।।
विव्याध बहुभिः शूरः शरैः संनतपर्वभिः ।
दूसरी ओर शूरवीर कृपाचार्यने रणभूमिमें कुपित हो महाबली द्रौपदीपुत्रोंको झुकी हुई गाँठवाले बहुत-से बाणोंद्वारा घायल कर दिया ।। ३५ १/२ ।।
तस्य तैरभवद् युद्धमिन्द्रियैरिव देहिनः ।। ३६ ।।
घोररूपमसंवार्यं निर्मर्यादमवर्तत ।
जैसे देहधारी जीवात्माका पाँचों इन्द्रियोंके साथ युद्ध हो रहा हो, उसी प्रकार उन पाँचों भाइयोंके साथ कृपाचार्यका युद्ध हो रहा था। धीरे-धीरे वह युद्ध अत्यन्त घोर, अनिवार्य और अमर्यादित हो गया ।। ३६ १/२ ।।
ते च सम्पीड़यामासुरिन्द्रियाणीव बालिशम् ।। ३७ ।।
स च तान् प्रति संरब्धः प्रत्ययोधयदाहवे ।
जैसे इन्द्रियाँ मूढ़ मनुष्यको पीड़ा देती हैं, उसी प्रकार वे पाँचों भाई कृपाचार्यको पीड़ित करने लगे। कृपाचार्य भी अत्यन्त रोषमें भरकर रणक्षेत्रमें उन सबके साथ युद्ध कर रहे थे ।। ३७ १/२ ।।
एवं चित्रमभूद् युद्धं तस्य तैः सह भारत ।। ३८ ।।
उत्थायोत्थाय हि यथा देहिनामिन्द्रियैर्विभो ।
भारत! उनका उन द्रौपदीपुत्रोंके साथ ऐसा विचित्र युद्ध होने लगा, जैसे बारंबार उठ-उठकर विषयोंकी ओर प्रवृत्त होनेवाली इन्द्रियोंके साथ देहधारियोंका युद्ध होता रहता है॥ ३८ ½ ॥
नराश्चैव नरैः सार्धं दन्तिनो दन्तिभिस्तथा ॥ ३९ ॥
हया हयैः समासक्ता रथिनो रथिभिः सह ।
संकुलं चाभवद् भूयो घोररूपं विशाम्पते ॥ ४० ॥
प्रजानाथ! उस समय मनुष्य मनुष्योंसे, हाथी हाथियोंसे, घोड़े घोड़ोंसे और रथी रथियोंसे भिड़ गये थे। फिर उनमें अत्यन्त घोर घमासान युद्ध होने लगा ॥ ४० ॥
इदं चित्रमिदं घोरमिदं रौद्रमिति प्रभो ।
युद्धान्यासन् महाराज घोराणि च बहूनि च ॥ ४१ ॥
प्रभो! महाराज! यह विचित्र, यह घोर, यह रौद्र युद्ध—इस प्रकार बहुत-से भीषण युद्ध चलने लगे ॥ ४१ ॥
ते समासाद्य समरे परस्परमरिंदमाः ।
व्यनदंश्चैव जघ्नुश्च समासाद्य महाहवे ॥ ४२ ॥
शत्रुओंका दमन करनेवाले वे समस्त योद्धा समरांगणमें एक-दूसरेसे भिड़कर उस महायुद्धमें परस्पर टक्कर लेते हुए प्रहार और सिंहनाद करने लगे ॥ ४२ ॥
तेषां पत्रसमुद्भूतं रजस्तीव्रमदृश्यत ।
वातेन चोद्धतं राजन् धावद्भिश्वाश्वसादिभिः ॥ ४३ ॥
राजन्! उनके वाहनोंसे, हवासे और दौड़ते हुए घुड़सवारोंसे उड़ायी गयी भयंकर धूल सब ओर व्याप्त दिखायी देती थी ॥ ४३ ॥
रथनेमिसमुद्भूतं निःश्वासैश्चापि दन्तिनाम् ।
रजः संध्याभ्रकलिलं दिवाकरपथं ययौ ॥ ४४ ॥
रथके पहियों और हाथियोंके उच्छ्वासोंसे ऊपर उठायी हुई धूल संध्याकालके मेघोंके समान सूर्यके मार्गमें छा गयी थी ॥ ४४ ॥
रजसा तेन सम्पृक्तो भास्करो निष्प्रभः कृतः ।
संछादिताभवद् भूमिस्ते च शूरा महारथाः ॥ ४५ ॥
उस धूलके सम्पर्कमें आकर सूर्य प्रभाहीन हो गये थे तथा पृथ्वी और वे महारथी शूरवीर भी ढक गये थे ॥ ४५ ॥
मुहूर्तादिव संवृत्तं नीरजस्कं समन्ततः ।
वीरशोणितसिक्तायां भूमौ भरतसत्तम ॥ ४६ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर दो ही घड़ीमें वीरोंके रक्तसे धरती सिंच उठी और सब ओरकी धूल बैठ जानेके कारण रणक्षेत्र निर्मल हो गया ॥ ४६ ॥
उपाशाम्यत् ततस्तीव्रं तद् रजो घोरदर्शनम् ।
ततोऽपश्यमहं भूयो द्वन्द्वयुद्धानि भारत ॥ ४७ ॥ यथाप्राणं यथाश्रेष्ठं मध्याह्ने वै सुदारुणे । वर्मणां तत्र राजेन्द्र व्यदृश्यन्तोज्ज्वलाः प्रभाः ॥ ४८ ॥ वह भयंकर दिखायी देनेवाली तीव्र धूलि सर्वथा शान्त हो गयी। भारत! राजेन्द्र! तब मैं फिर उस दारुण मध्याह्नकालमें अपने बल और श्रेष्ठताके अनुसार अनेक द्वन्द्वयुद्ध देखने लगा। योद्धाओंके कवचोंकी प्रभा वहाँ अत्यन्त उज्ज्वल दिखायी देती थी ॥ ४७-४८ ॥ शब्दश्च तुमुलः संख्ये शराणां पततामभूत् । महावेणुवनस्येव दह्यमानस्य पर्वते ॥ ४९ ॥ जैसे पर्वतपर जलते हुए विशाल बाँसोंके वनसे प्रकट होनेवाला चटचट शब्द सुनायी देता है, उसी प्रकार युद्धस्थलमें बाणोंके गिरनेका भयंकर शब्द वहाँ गूँज रहा था ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे द्वाविंशोऽध्यायः ॥ २२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २२ ॥
अध्याय (पृष्ठ 2610)
त्रयोविंशोऽध्यायः
कौरवपक्षके सात सौ रथियोंका वध, उभयपक्षकी सेनाओंका मर्यादाशून्य घोर संग्राम तथा शकुनिका कूट युद्ध और उसकी पराजय
संजय उवाच
वर्तमाने तदा युद्धे घोररूपे भयानके ।
अभज्यत बलं तत्र तव पुत्रस्य पाण्डवैः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! जब वह भयानक घोर युद्ध होने लगा, उस समय पाण्डवोंने आपके पुत्रकी सेनाके पाँव उखाड़ दिये ॥ १ ॥
तांस्तु यत्नेन महता संनिवार्य महारथान् ।
पुत्रस्ते योधयामास पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ २ ॥
उन भागते हुए महारथियोंको महान् प्रयत्नसे रोककर आपका पुत्र पाण्डवोंकी सेनाके साथ युद्ध करने लगा ॥ २ ॥
निवृत्ताः सहसा योधास्तव पुत्रजयैषिणः ।
संनिवृत्तेषु तेष्वेवं युद्धमासीत् सुदारुणम् ॥ ३ ॥
यह देख आपके पुत्रकी विजय चाहनेवाले योद्धा सहसा लौट पड़े। इस प्रकार उनके लौटनेपर उन सबमें अत्यन्त भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ३ ॥
तावकानां परेषां च देवासुररणोपमम् ।
परेषां तव सैन्ये वा नासीत् कश्चित् पराङ्मुखः ॥ ४ ॥
आपके और शत्रुओंके योद्धाओंका वह युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर था। उस समय शत्रुओंकी अथवा आपकी सेनामें भी कोई युद्धसे विमुख नहीं होता था ॥
अनुमानेन युध्यन्ते संज्ञाभिश्च परस्परम् ।
तेषां क्षयो महानासीद् युध्यतामितरेतरम् ॥ ५ ॥
सब लोग अनुमानसे और नाम बतानेसे शत्रु तथा मित्रकी पहचान करके परस्पर युद्ध करते थे। परस्पर जूझते हुए उन वीरोंका वहाँ बड़ा भारी विनाश हो रहा था ॥
ततो युधिष्ठिरो राजा क्रोधेन महता युतः ।
जिगीषमाणः संग्रामे धार्तराष्ट्रान् सराजकान् ॥ ६ ॥
उस समय राजा युधिष्ठिर महान् क्रोधसे युक्त हो संग्राममें राजा दुर्योधनसहित आपके पुत्रोंको जीतना चाहते थे ॥ ६ ॥
त्रिभिः शारद्वतं विद्ध्वा रुक्मपुङ्खैः शिलाशितैः ।
चतुर्भिर्निजघानाश्वान् नाराचैः कृतवर्मणः ॥ ७ ॥ उन्होंने शिलापर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखवाले तीन बाणोंसे कृपाचार्यको घायल करके चार नाराचोंसे कृतवर्माके घोड़ोंको मार डाला ॥ ७ ॥ अश्वत्थामा तु हार्दिक्यमपोवाह यशस्विनम् । अथ शारद्वतोऽष्टाभिः प्रत्यविध्यद् युधिष्ठिरम् ॥ ८ ॥ तब अश्वत्थामा यशस्वी कृतवर्माको अपने रथपर बिठाकर अन्यत्र हटा ले गया। तदनन्तर कृपाचार्यने आठ बाणोंसे राजा युधिष्ठिरको बींध डाला ॥ ८ ॥ ततो दुर्योधनो राजा रथान् सप्तशतान् रणे । प्रैषयद् यत्र राजासौ धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ ९ ॥ इसके बाद राजा दुर्योधनने रणभूमिमें सात सौ रथियोंको वहाँ भेजा, जहाँ धर्मपुत्र युधिष्ठिर खड़े थे ॥ ९ ॥ ते रथा रथिभिर्युक्ता मनोमारुतरंहसः । अभ्यद्रवन्त संग्रामे कौन्तेयस्य रथं प्रति ॥ १० ॥ रथियोंसे युक्त और मन तथा वायुके समान वेगशाली वे रथ रणभूमिमें कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरके रथकी ओर दौड़े ॥ १० ॥ ते समन्तान्महाराज परिवार्य युधिष्ठिरम् । अदृश्यं सायकैश्चक्रुर्मेघा इव दिवाकरम् ॥ ११ ॥ महाराज! जैसे बादल सूर्यको ढक देते हैं, उसी प्रकार उन रथियोंने युधिष्ठिरको चारों ओरसे घेरकर अपने बाणोंद्वारा उन्हें अदृश्य कर दिया ॥ ११ ॥ ते दृष्ट्वा धर्मराजानं कौरवैस्तथा कृतम् । नामृष्यन्त सुसंरब्धाः शिखण्डिप्रमुखा रथाः ॥ १२ ॥ धर्मराज युधिष्ठिरको कौरवोंद्वारा वैसी दशामें पहुँचाया गया देख अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए शिखण्डी आदि रथी सहन न कर सके ॥ १२ ॥ रथैरश्ववरैर्युक्तैः किङ्किणीजालसंवृतैः । आजग्मुरथ रक्षन्तः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ॥ १३ ॥ वे छोटी-छोटी घंटियोंकी जालीसे ढके और श्रेष्ठ अश्वोंसे जुते हुए रथोंद्वारा कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरकी रक्षाके लिये वहाँ आ पहुँचे ॥ १३ ॥ ततः प्रवृत्तो रौद्रः संग्रामः शोणितोदकः । पाण्डवानां कुरूणां च यमराष्ट्रविवर्धनः ॥ १४ ॥ तदनन्तर कौरवों और पाण्डवोंका अत्यन्त भयंकर संग्राम आरम्भ हो गया, जिसमें पानीकी तरह खून बहाया जाता था। वह युद्ध यमराजके राज्यकी वृद्धि करनेवाला था ॥ १४ ॥ रथान् सप्तशतान् हत्वा कुरूणामाततायिनाम् ।
पाण्डवाः सह पाञ्चालैः पुनरेवाभ्यवारयन् ॥ १५ ॥
उस समय पांचालोंसहित पाण्डवोंने आततायी कौरवोंके उन सात सौ रथियोंको मारकर पुनः अन्य योद्धाओंको आगे बढ़नेसे रोका ॥ १५ ॥
तत्र युद्धं महच्चासीत् तव पुत्रस्य पाण्डवैः ।
न च तत् तादृशं दृष्टं नैव चापि परिश्रुतम् ॥ १६ ॥
वहाँ आपके पुत्रका पाण्डवोंके साथ बड़ा भारी युद्ध हुआ। वैसा युद्ध मैंने न तो कभी देखा था और न मेरे सुननेमें ही आया था ॥ १६ ॥
वर्तमाने तदा युद्धे निर्मर्यादे समन्ततः ।
वध्यमानेषु योधेषु तावकेष्वितरेषु च ॥ १७ ॥
विनदत्सु च योधेषु शङ्खवर्यैश्च पूरितैः ।
उत्कृष्टैः सिंहनादैश्च गर्जितैश्चैव धन्विनाम् ॥ १८ ॥
अतिप्रवृत्ते युद्धे च छिद्यमानेषु मर्मसु ।
धावमानेषु योधेषु जयगृद्धिषु मारिष ॥ १९ ॥
संहारे सर्वतो जाते पृथिव्यां शोकसंभवे ।
बह्वीनामुत्तमस्त्रीणां सीमन्तोद्धरणे तथा ॥ २० ॥
निर्मर्यादे महायुद्धे वर्तमाने सुदारुणे ।
प्रादुरासन् विनाशाय तदोत्पाताः सुदारुणाः ॥ २१ ॥
माननीय नरेश! जब सब ओरसे वह मर्यादाशून्य युद्ध होने लगा, आपके और शत्रुपक्षके योद्धा मारे जाने लगे, युद्धपरायण वीरोंकी गर्जना और श्रेष्ठ शंखोंकी ध्वनि होने लगी, धनुर्धरोंकी ललकार, सिंहनाद और गर्जनाओंके साथ जब वह युद्ध औचित्यकी सीमाको पार कर गया, योद्धाओंके मर्मस्थल विदीर्ण किये जाने लगे, विजयाभिलाषी योद्धा इधर-उधर दौड़ने लगे, रणभूमिमें सब ओर शोकजनक संहार होने लगा, बहुत-सी सुन्दरी स्त्रियोंके सीमन्तके सिन्दूर मिटाये जाने लगे तथा सारी मर्यादाओंको तोड़कर अत्यन्त भयंकर महायुद्ध चलने लगा, उस समय विनाशकी सूचना देनेवाले अति दारुण उत्पात प्रकट होने लगे ॥ १७—२१ ॥
चचाल शब्दं कुर्वाणा सपर्वतवना मही ।
सदण्डाः सोल्मुका राजन् कीर्यमाणाः समन्ततः ॥ २२ ॥
उल्का पेतुर्दिवो भूमावाहत्य रविमण्डलम् ।
राजन्! पर्वत और वनोंसहित पृथ्वी भयानक शब्द करती हुई डोलने लगी और आकाशसे दण्ड तथा चलते हुए काष्ठोंसहित बहुत-सी उल्काएँ सूर्यमण्डलसे टकराकर सम्पूर्ण दिशाओंमें बिखरी पड़ती थीं ॥ २२ ½ ॥
विश्वग्वाताः प्रादुरासन् नीचैः शर्करवर्षिणः ॥ २३ ॥
अश्रूणि मुमुचुर्नागा वेपथुं चास्पृशन् भृशम् ।
चारों ओर नीचे बालू और कंकड़ बरसानेवाली हवाएँ चलने लगीं। हाथी आँसू बहाने और थर-थर काँपने लगे ॥ २३ ½ ॥
एतान् घोराननादृत्य समुत्पातान् सुदारुणान् ॥ २४ ॥ पुनर्युद्धाय संयत्ताः क्षत्रियास्तस्थुरव्यथाः । रमणीये कुरुक्षेत्रे पुण्ये स्वर्गं यियासवः ॥ २५ ॥
इन घोर एवं दारुण उत्पातोंकी अवहेलना करके क्षत्रियवीर मनमें व्यथासे रहित हो पुनः युद्धके लिये तैयार हो गये और स्वर्गमें जानेकी अभिलाषा ले रमणीय एवं पुण्यमय कुरुक्षेत्रमें उत्साहपूर्वक डट गये ॥ २४-२५ ॥
ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरब्रवीत् । युद्ध्यध्वमग्रतो यावत् पृष्ठतो हन्मि पाण्डवान् ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् गान्धारराजके पुत्र शकुनिने कौरव-योद्धाओंसे कहा—‘वीरो! तुमलोग सामनेसे युद्ध करो और मैं पीछेसे पाण्डवोंका संहार करता हूँ’ ॥ २६ ॥
ततो नः सम्प्रयातानां मद्रयोधास्तरस्विनः । हृष्टाः किलकिलाशब्दमकुर्वन्तापरे तथा ॥ २७ ॥
इस सलाहके अनुसार जब हमलोग चले तो मद्रदेशके वेगशाली योद्धा तथा अन्य सैनिक हर्षसे उल्लसित हो किलकारियाँ भरने लगे ॥ २७ ॥
अस्मांस्तु पुनरासाद्य लब्धलक्ष्या दुरासदाः । शरासनानि धुन्वन्तः शरवर्षैरवाकिरन् ॥ २८ ॥
इतनेहीमें दुर्धर्ष पाण्डव पुनः हमारे पास आ पहुँचे और हमें अपने लक्ष्यके रूपमें पाकर धनुष हिलाते हुए हम लोगोंपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २८ ॥
ततो हतं परैस्तत्र मद्रराजबलं तदा । दुर्योधनबलं दृष्ट्वा पुनरासीत् पराङ्मुखम् ॥ २९ ॥
थोड़ी ही देरमें शत्रुओंने वहाँ मद्रराजकी सेनाका संहार कर डाला। यह देख दुर्योधनकी सेना पुनः पीठ दिखाकर भागने लगी ॥ २९ ॥
गान्धारराजस्तु पुनर्वाक्यमाह ततो बली । निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं किं सृतेन वः ॥ ३० ॥
तब बलवान् गान्धारराज शकुनिने पुनः इस प्रकार कहा—‘अपने धर्मको न जाननेवाले पापियो! इस तरह तुम्हारे भागनेसे क्या होगा? लौटो और युद्ध करो’ ॥ ३० ॥
अनीकं दशसाहस्रमश्वानां भरतर्षभ । आसीद् गान्धारराजस्य विशालप्रासयोधिनाम् ॥ ३१ ॥ बलेन तेन विक्रम्य वर्तमाने जनक्षये । पृष्ठतः पाण्डवानीकमभ्यघ्नन्निशितैः शरैः ॥ ३२ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय गान्धारराज शकुनिके पास विशाल प्रास लेकर युद्ध करनेवाले घुड़सवारोंकी दस हजार सेना मौजूद थी। उसीको साथ लेकर वह उस जन-संहारकारी युद्धमें पाण्डव-सेनाके पिछले भागकी ओर गया और वे सब मिलकर पैने बाणोंसे उस सेनापर चोट करने लगे ॥ ३१-३२ ॥ तदभ्रमिव वातेन क्षिप्यमाणं समन्ततः । अभज्यत महाराज पाण्डूनां सुमहद् बलम् ॥ ३३ ॥ महाराज! जैसे वायुके वेगसे मेघोंका दल सब ओरसे छिन्न-भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार इस आक्रमणसे पाण्डवोंकी विशाल सेनाका व्यूह भंग हो गया ॥ ३३ ॥ ततो युधिष्ठिरः प्रेक्ष्य भग्नं स्वबलमन्तिकात् । अभ्यनादयद्व्यग्रः सहदेवं महाबलम् ॥ ३४ ॥ तब युधिष्ठिरने पास ही अपनी सेनामें भगदड़ मची देख शान्तभावसे महाबली सहदेवको पुकारा ॥ ३४ ॥ असौ सुबलपुत्रो नो जघनं पीड्य दंशितः । सैन्यानि सूदयत्येष पश्य पाण्डव दुर्मतिम् ॥ ३५ ॥ और कहा—‘पाण्डुनन्दन! कवच धारण करके आया हुआ वह सुबलपुत्र शकुनि हमारी सेनाके पिछले भागको पीड़ा देकर सारे सैनिकोंका संहार कर रहा है; इस दुर्बुद्धिको देखो तो सही ॥ ३५ ॥ गच्छ त्वं द्रौपदेयैश्च शकुनिं सौबलं जहि । रथानीकमहं धक्ष्ये पाञ्चालसहितोऽनघ ॥ ३६ ॥ ‘निष्पाप वीर! तुम द्रौपदीके पुत्रोंको साथ लेकर जाओ और सुबलपुत्र शकुनिको मार डालो। मैं पांचाल योद्धाओंके साथ यहीं रहकर शत्रु की इस रथसेनाको भस्म कर डालूँगा ॥ ३६ ॥ गच्छन्तु कुञ्जराः सर्वे वाजिनश्च सह त्वया । पादाताश्च त्रिसाहस्राः शकुनिं तैर्वृतो जहि ॥ ३७ ॥ ‘तुम्हारे साथ सभी हाथीसवार, घुड़सवार और तीन हजार पैदल सैनिक भी जायँ तथा उन सबसे घिरे रहकर तुम शकुनिका नाश करो' ॥ ३७ ॥ ततो गजाः सप्तशताश्चापपाणिभिरास्थिताः । पञ्च चाश्वसहस्राणि सहदेवश्च वीर्यवान् ॥ ३८ ॥ पादाताश्च त्रिसाहस्रा द्रौपदेयाश्च सर्वशः । रणे ह्यभ्यद्रवंस्ते तु शकुनिं युद्धदुर्मदम् ॥ ३९ ॥ तदनन्तर धर्मराजकी आज्ञाके अनुसार हाथमें धनुष लिये बैठे हुए सवारोंसे युक्त सात सौ हाथी, पाँच हजार घुड़सवार, पराक्रमी सहदेव, तीन हजार पैदल योद्धा और द्रौपदीके सभी पुत्र—इन सबने रणभूमिमें युद्ध-दुर्मद शकुनिपर धावा किया ॥ ३८-३९ ॥
ततस्तु सौबलो राजन्नभ्यतिक्रम्य पाण्डवान् । जघान पृष्ठतः सेनां जयगृद्धः प्रतापवान् ॥ ४० ॥ राजन्! उधर विजयाभिलाषी प्रतापी सुबलपुत्र शकुनि पाण्डवोंका उल्लंघन करके पीछेकी ओरसे उनकी सेनाका संहार कर रहा था ॥ ४० ॥
अश्वारोहास्तु संरब्धाः पाण्डवानां तरस्विनाम् । प्राविशन् सौबलानीकमभ्यतिक्रम्य तान् रथान् ॥ ४१ ॥ वेगशाली पाण्डवोंके घुड़सवारोंने अत्यन्त कुपित होकर उन कौरव रथियोंका उल्लंघन करके सुबलपुत्रकी सेनामें प्रवेश किया ॥ ४१ ॥
ते तत्र सादिनः शूराः सौबलस्य महद् बलम् । रणमध्ये व्यतिष्ठन्त शरवर्षैरवाकिरन् ॥ ४२ ॥ वे शूरवीर घुड़सवार वहाँ जाकर रणभूमिके मध्यभागमें खड़े हो गये और शकुनिकी उस विशाल सेनापर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ४२ ॥
तदुद्यतगदाप्रासमकापुरुषसेवितम् । प्रावर्तत महद् युद्धं राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ ४३ ॥ राजन्! फिर तो आपकी कुमन्त्रणाके फलस्वरूप वह महान् युद्ध आरम्भ हो गया, जो कायरोंसे नहीं, वीर पुरुषोंसे सेवित था। उस समय सभी योद्धाओंके हाथोंमें गदा अथवा प्रास उठे रहते थे ॥ ४३ ॥
उपारमन्त ज्याशब्दाः प्रेक्षका रथिनोऽभवन् । न हि स्वेषां परेषां वा विशेषः प्रत्यदृश्यत ॥ ४४ ॥ धनुषकी प्रत्यंचाके शब्द बंद हो गये। रथी योद्धा दर्शक बनकर तमाशा देखने लगे। उस समय अपने या शत्रुपक्षके योद्धाओंमें पराक्रमकी दृष्टिसे कोई अन्तर नहीं दिखायी देता था ॥ ४४ ॥
शूरबाहुविसृष्टानां शक्तीनां भरतर्षभ । ज्योतिषामिव सम्पातमपश्यन् कुरुपाण्डवाः ॥ ४५ ॥ भरतश्रेष्ठ! शूरवीरोंकी भुजाओंसे छूटी हुई शक्तियाँ शत्रुओंपर इस प्रकार गिरती थीं, मानो आकाशसे तारे टूटकर पड़ रहे हों। कौरव-पाण्डवयोद्धाओंने इसे प्रत्यक्ष देखा था ॥
ऋष्टिभिर्विमलाभिश्च तत्र तत्र विशाम्पते । सम्पतन्तीभिराकाशमावृतं बह्वशोभत ॥ ४६ ॥ प्रजानाथ! वहाँ गिरती हुई निर्मल ऋष्टियोंसे व्याप्त हुए आकाशकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४६ ॥
प्रासानां पततां राजन् रूपमासीत् समन्ततः । शलभानामिवाकाशे तदा भरतसत्तम ॥ ४७ ॥
भरतकुलभूषण नरेश! उस समय सब ओर गिरते हुए प्रासोंका स्वरूप आकाशमें छाये हुए टिड्डीदलोंके समान जान पड़ता था ॥ ४७ ॥ रुधिरोक्षितसर्वाङ्गा विप्रविद्धैर्नियन्तृभिः । हयाः परिपतन्ति स्म शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४८ ॥ सैकड़ों और हजारों घोड़े अपने घायल सवारोंके साथ सारे अंगोंमें लहूलुहान होकर धरतीपर गिर रहे थे ॥ अन्योन्यं परिपिष्टाश्च समासाद्य परस्परम् । आविक्षताः स्म दृश्यन्ते वमन्तो रुधिरं मुखैः ॥ ४९ ॥ बहुत-से सैनिक परस्पर टकराकर एक-दूसरेसे पिस जाते और क्षत-विक्षत हो मुखोंसे रक्त वमन करते हुए दिखायी देते थे ॥ ४९ ॥ ततोऽभवत्तमो घोरं सैन्येन रजसा वृते । तानपाक्रमतोऽद्राक्षं तस्माद् देशादरिंदम ॥ ५० ॥ शत्रुदमन नरेश! तत्पश्चात् जब सेनाद्वारा उठी हुई धूलसे सब ओर घोर अन्धकार छा गया, उस समय हमने देखा कि बहुत-से योद्धा वहाँसे भागे जा रहे हैं ॥ ५० ॥ अश्वान् राजन् मनुष्यांश्च रजसा संवृते सति । भूमौ निपतितांश्चान्ये वमन्तो रुधिरं बहु ॥ ५१ ॥ राजन्! धूलसे सारा रणक्षेत्र भर जानेके कारण अँधेरेमें बहुत-से घोड़ों और मनुष्योंको भी हमने भागते देखा था। कितने ही योद्धा पृथ्वीपर गिरकर मुँहसे बहुत-सा रक्त वमन कर रहे थे ॥ ५१ ॥ केशाकेशि समालग्ना न शेकुश्चेष्टितुं नराः । अन्योन्यमश्वपृष्ठेभ्यो विकर्षन्तो महाबलाः ॥ ५२ ॥ बहुत-से मनुष्य परस्पर केश पकड़कर इतने सट गये थे कि कोई चेष्टा नहीं कर पाते थे। कितने ही महाबली योद्धा एक-दूसरेको घोड़ोंकी पीठोंसे खींच रहे थे ॥ ५२ ॥ मल्ला इव समासाद्य निजघ्नुरितरेतरम् । अश्वैश्च व्यपकृष्यन्त बहवोऽत्र गतासवः ॥ ५३ ॥ बहुत-से सैनिक पहलवानोंकी भाँति परस्पर भिड़कर एक-दूसरेपर चोट करते थे। कितने ही प्राणशून्य होकर अश्वोंद्वारा इधर-उधर घसीटे जा रहे थे ॥ ५३ ॥ भूमौ निपतितांश्चान्ये बहवो विजयैषिणः । तत्र तत्र व्यदृश्यन्त पुरुषाः शूरमानिनः ॥ ५४ ॥ बहुतेरे विजयाभिलाषी तथा अपनेको शूरवीर माननेवाले पुरुष जहाँ-तहाँ पृथ्वीपर पड़े दिखायी देते थे ॥ रक्तोक्षितैश्छिन्नभुजैरवकृष्टशिरोरुहैः । व्यदृश्यत मही कीर्णा शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ५५ ॥
कटी हुई बाँहों और खींचे गये केशोंवाले सैकड़ों और हजारों रक्तरंजित शरीरोंसे रणभूमि आच्छादित दिखायी देती थी ॥ ५५ ॥
दूरं न शक्यं तत्रासीद् गन्तुमश्वेन केनचित् ।
साश्वारोहैर्हतैरश्वैरावृते वसुधातले ॥ ५६ ॥
सवारोंसहित घोड़ोंकी लाशोंसे पटे हुए भूतलपर किसीके लिये भी घोड़ेद्वारा दूरतक जाना असम्भव हो गया था ॥ ५६ ॥
रुधिरोक्षितसन्नाहैरात्तशस्त्रैरुदायुधैः ।
नानाप्रहरणैर्घोरैः परस्परवधैषिभिः ॥ ५७ ॥
सुसंनिकृष्टैः संग्रामे हतभूयिष्ठसैनिकैः ।
योद्धाओंके कवच रक्तसे भीग गये थे। वे सब हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र लिये धनुष उठाये नाना प्रकारके भयंकर आयुधोंद्वारा एक-दूसरेके वधकी इच्छा रखते थे। उस संग्राममें सभी योद्धा अत्यन्त निकट होकर युद्ध करते थे और उनमेंसे अधिकांश सैनिक मार डाले गये थे ॥
स मुहूर्तं ततो युद्ध्वा सौबलोऽथ विशाम्पते ॥ ५८ ॥
षट्सहस्रैर्हयैः शिष्टैरपायाच्छकुनिस्ततः ।
प्रजानाथ! शकुनि वहाँ दो घड़ी युद्ध करके शेष बचे हुए छः हजार घुड़सवारोंके साथ भाग निकला ॥
तथैव पाण्डवानीकं रुधिरेण समुक्षितम् ॥ ५९ ॥
षट्सहस्रैर्हयैः शिष्टैरपायाच्छ्रान्तवाहनम् ।
इसी प्रकार खूनसे नहायी हुई पाण्डव-सेना भी शेष छः हजार घुड़सवारोंके साथ युद्धसे निवृत्त हो गयी। उसके सारे वाहन थक गये थे ॥ ५९ १/२ ॥
अश्वारोहाश्च पाण्डूनामब्रुवन् रुधिरोक्षिताः ॥ ६० ॥
सुसंनिकृष्टे संग्रामे भूयिष्ठे त्यक्तजीविताः ।
उस समय उस निकटवर्ती महायुद्धमें प्राणोंका मोह छोड़कर जूझनेवाले पाण्डवसेनाके रक्तरंजित घुड़सवार इस प्रकार बोले— ॥ ६० १/२ ॥
न हि शक्यं रथैर्योद्धुं कुत एवं महागजैः ॥ ६१ ॥
रथानेव रथा यान्तु कुञ्जराः कुञ्जरानपि ।
प्रतियातो हि शकुनिः स्वमनीकमवस्थितः ॥ ६२ ॥
न पुनः सौबलो राजा युद्धमभ्यागमिष्यति ।
‘यहाँ रथोंद्वारा भी युद्ध नहीं किया जा सकता। फिर बड़े-बड़े हाथियोंकी तो बात ही क्या है? रथ रथोंका सामना करनेके लिये जायँ और हाथी हाथियोंका। शकुनि भागकर अपनी सेनामें चला गया। अब फिर राजा शकुनि युद्धमें नहीं आयेगा’ ॥ ६१-६२ १/२ ॥
ततस्तु द्रौपदेयाश्च ते च मत्ता महाद्विपाः ॥ ६३ ॥
प्रययुर्यत्र पाञ्चाल्यो धृष्टद्युम्नो महारथः ।
उनकी यह बात सुनकर द्रौपदीके पाँचों पुत्र और वे मतवाले हाथी वहीं चले गये, जहाँ पांचालराजकुमार महारथी धृष्टद्युम्न थे ॥ ६३ १/२ ॥
सहदेवोऽपि कौरव्य रजोमेघे समुत्थिते ॥ ६४ ॥
एकाकी प्रययौ तत्र यत्र राजा युधिष्ठिरः ।
कुरुनन्दन! वहाँ धूलका बादल-सा घिर आया था। उस समय सहदेव भी अकेले ही, जहाँ राजा युधिष्ठिर थे, वहीं चले गये ॥ ६४ १/२ ॥
ततस्तेषु प्रयातेषु शकुनिः सौबलः पुनः ॥ ६५ ॥
पार्श्वतोऽभ्यहनत् क्रुद्धो धृष्टद्युम्नस्य वाहिनीम् ।
उन सबके चले जानेपर सुबलपुत्र शकुनि पुनः कुपित हो पार्श्वभागसे आकर धृष्टद्युम्नकी सेनाका संहार करने लगा ॥ ६५ १/२ ॥
तत् पुनस्तुमुलं युद्धं प्राणांस्त्यक्त्वाभ्यवर्तत ॥ ६६ ॥
तावकानां परेषां च परस्परवधैषिणाम् ।
फिर तो परस्पर वधकी इच्छावाले आपके और शत्रुपक्षके सैनिकोंमें प्राणोंका मोह छोड़कर भयंकर युद्ध होने लगा ॥ ६६ १/२ ॥
ते चान्योन्यमवैक्षन्त तस्मिन् वीरसमागमे ॥ ६७ ॥
योधाः पर्यपतन् राजन् शतशोऽथ सहस्रशः ।
राजन्! शूरवीरोंके उस संघर्षमें सब ओरसे सैकड़ों-हजारों योद्धा टूट पड़े और वे एक-दूसरेकी ओर देखने लगे ॥ ६७ १/२ ॥
असिभिश्चिद्यमानानां शिरसां लोकसंक्षये ॥ ६८ ॥
प्रादुरासीन्महान् शब्दस्तालानां पततामिव ।
उस लोकसंहारकारी संग्राममें तलवारोंसे काटे जाते हुए मस्तक जब पृथ्वीपर गिरते थे, तब उनसे ताड़के फलोंके गिरनेकी-सी धमाकेकी आवाज होती थी ॥ ६८ १/२ ॥
विमुक्तानां शरीराणां छिन्नानां पततां भुवि ॥ ६९ ॥
सायुधानां च बाहूनामूरूणां च विशाम्पते ।
आसीत् कटकटाशब्दः सुमहाँल्लोमहर्षणः ॥ ७० ॥
प्रजानाथ! छिन्न-भिन्न होकर धरतीपर गिरनेवाले कवचशून्य शरीरों, आयुधोंसहित भुजाओं और जाँघोंका अत्यन्त भयंकर एवं रोमांचकारी कट-कट शब्द सुनायी पड़ता था ॥ ६९-७० ॥
निघ्नन्तो निशितैःशस्त्रैर्भ्रातॄन् पुत्रान् सखीनपि ।
योधाः परिपतन्ति स्म यथामिषकृते खगाः ॥ ७१ ॥