महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2605, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! वे महामनस्वी वीर सारी सेनाके देखते-देखते दुर्योधनपर चारों ओरसे बाणसमूहोंकी वर्षा कर रहे थे तो भी वह विचलित नहीं हुआ ॥ १५ १/२ ॥ लाघवं सौष्ठवं चापि वीर्यं चापि महात्मनः ॥ १६ ॥ अति सर्वाणि भूतानि ददृशुः सर्वमानवाः । उस महामनस्वी वीरकी फुर्ती, अस्त्र-संचालनका सुन्दर ढंग तथा पराक्रम—इन सबको सब लोगोंने सम्पूर्ण प्राणियोंसे बढ़-चढ़कर देखा ॥ १६ १/२ ॥ धार्तराष्ट्रा हि राजेन्द्र योधास्तु स्वल्पमन्तरम् ॥ १७ ॥ अपश्यमाना राजानं पर्यवर्तन्त दंशिताः । राजेन्द्र! आपके योद्धा थोड़ा-सा भी अन्तर न देखकर कवच आदिसे सुसज्जित हो राजा दुर्योधनको चारों ओरसे घेरकर खड़े हो गये ॥ १७ १/२ ॥ तेषामापततां घोरस्तुमुलः समपद्यत ॥ १८ ॥ क्षुब्धस्य हि समुद्रस्य प्रावृट्काले यथा स्वनः । जैसे वर्षाकालमें विक्षुब्ध हुए समुद्रकी भीषण गर्जना सुनायी देती है, उसी प्रकार उन आक्रमणकारी कौरवोंका घोर एवं भयंकर कोलाहल प्रकट होने लगा ॥ समासाद्य रणे ते तु राजानमपराजितम् ॥ १९ ॥ प्रत्युद्ययुर्महेष्वासाः पाण्डवानातातयिनः । वे महाधनुर्धर कौरवयोद्धा रणभूमिमें अपराजित राजा दुर्योधनके पास पहुँचकर आततायी पाण्डवोंपर जा चढ़े ॥ १९ १/२ ॥ भीमसेनं रणे क्रुद्धो द्रोणपुत्रो न्यवारयत् ॥ २० ॥ नानाबाणैर्महाराज प्रमुक्तैः सर्वतोदिशम् । नाज्ञायन्त रणे वीरा न दिशः प्रदिशः कुतः ॥ २१ ॥ महाराज! रणक्षेत्रमें कुपित हुए द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने सम्पूर्ण दिशाओंमें छोड़े गये अनेक प्रकारके बाणोंद्वारा भीमसेनको आगे बढ़नेसे रोक दिया। उस समय संग्राममें न तो वीरोंकी पहचान होती थी और न दिशाओंकी, फिर अवान्तर-दिशाओं (कोणों)-की तो बात ही क्या है? ॥ २०-२१ ॥ तावुभौ क्रूरकर्माणवुभौ भारत दुःसहौ । घोररूपमयुध्येतां कृतप्रतिकृतैषिणौ ॥ २२ ॥ भारत! वे दोनों वीर क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले और शत्रुओंके लिये दुःसह थे। अतः एक-दूसरेके प्रहारका भरपूर जवाब देनेकी इच्छा रखकर वे घोर युद्ध करने लगे ॥ २२ ॥ त्रासयन्तौ दिशः सर्वा ज्याक्षेपकठिनत्वचौ । शकुनिस्तु रणे वीरो युधिष्ठिरमपीडयत् ॥ २३ ॥ प्रत्यंचा खींचनेसे उनके हाथोंकी त्वचा बहुत कठोर हो गयी थी और वे सम्पूर्ण दिशाओंको आतंकित कर रहे थे। दूसरी ओर वीर शकुनि रणभूमिमें युधिष्ठिरको पीड़ा देने