महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2606, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंलगा ।। २३ ।।
तस्याश्वांश्चतुरो हत्वा सुबलस्य सुतो विभो ।
नादं चकार बलवत् सर्वसैन्यानि कोपयन् ।। २४ ।।
प्रभो! सुबलके उस पुत्रने युधिष्ठिरके चारों घोड़ोंको मारकर सम्पूर्ण सेनाओंका क्रोध बढ़ाते हुए बड़े जोरसे सिंहनाद किया ।। २४ ।।
एतस्मिन्नन्तरे वीरं राजानमपराजितम् ।
अपोवाह रथेनाजौ सहदेवः प्रतापवान् ।। २५ ।।
इसी बीचमें प्रतापी सहदेव युद्धमें किसीसे परास्त न होनेवाले वीर राजा युधिष्ठिरको अपने रथपर बिठाकर दूर हटा ले गये ।। २५ ।।
अथान्यं रथमास्थाय धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।
शकुनिं नवभिर्विद्ध्वा पुनर्विव्याध पञ्चभिः ।। २६ ।।
तदनन्तर धर्मपुत्र युधिष्ठिरने दूसरे रथपर आरूढ़ हो पुनः धावा किया और शकुनिको पहले नौ बाणोंसे घायल करके फिर पाँच बाणोंसे बींध डाला ।। २६ ।।
ननाद च महानादं प्रवरः सर्वधन्विनाम् ।
तद् युद्धमभवच्चित्रं घोररूपं च मारिष ।। २७ ।।
प्रेक्षतां प्रीतिजननं सिद्धचारणसेवितम् ।
इसके बाद सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ युधिष्ठिरने बड़े जोरसे सिंहनाद किया। मान्यवर! उनका वह युद्ध विचित्र, भयंकर, सिद्धों और चारणोंद्वारा सेवित तथा दर्शकोंका हर्ष बढ़ानेवाला था ।। २७ १/२ ।।
उलूकस्तु महेष्वासं नकुलं युद्धदुर्मदम् ।। २८ ।।
अभ्यद्रवदमेयात्मा शरवर्षैः समन्ततः ।
दूसरी ओर अमेय आत्मबलसे सम्पन्न उलूकने महाधनुर्धर रणदुर्मद नकुलपर चारों ओरसे बाणोंकी वर्षा करते हुए धावा किया ।। २८ १/२ ।।
तथैव नकुलः शूरः सौबलस्य सुतं रणे ।। २९ ।।
शरवर्षेण महता समन्तात् पर्यवारयत् ।
इसी प्रकार शूरवीर नकुलने रणभूमिमें शकुनिके पुत्रको बड़ी भारी बाणवर्षाके द्वारा सब ओरसे अवरुद्ध कर दिया ।। २९ १/२ ।।
तौ तत्र समरे वीरौ कुलपुत्रौ महारथौ ।। ३० ।।
योधयन्तावपश्येतां कृतप्रतिकृतैषिणौ ।
वे दोनों वीर महारथी उत्तम कुलमें उत्पन्न हुए थे! अतः समरांगणमें एक-दूसरेके प्रहारका प्रतीकार करनेकी इच्छा रखकर जूझते दिखायी देते थे ।। ३० १/२ ।।
तथैव कृतवर्माणं शैनेयः शत्रुतापनः ।। ३१ ।।
योधयन् शुशुभे राजन् बलिं शक्र इवाहवे ।