महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2607, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजन्! इसी तरह शत्रुसंतापी सात्यकि कृतवर्माके साथ युद्ध करते हुए युद्धस्थलमें उसी प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे इन्द्र बलिके साथ ।। ३१ १/२ ।।
दुर्योधनो धनुश्छित्त्वा धृष्टद्युम्नस्य संयुगे ।। ३२ ।।
अथैनं छिन्नधन्वानं विव्याध निशितैः शरैः ।
दुर्योधनने युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नका धनुष काट दिया और धनुष कट जानेपर उन्हें पैने बाणोंसे बींध डाला ।।
धृष्टद्युम्नोऽपि समरे प्रगृह्य परमायुधम् ।। ३३ ।।
राजानं योधयामास पश्यतां सर्वधन्विनाम् ।
तब धृष्टद्युम्न भी दूसरा उत्तम धनुष लेकर समरभूमिमें सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते-देखते राजा दुर्योधनके साथ युद्ध करने लगे ।। ३३ १/२ ।।
तयोर्युद्धं महच्चासीत् संग्रामे भरतर्षभ ।। ३४ ।।
प्रभिन्नयोर्यथा सक्तं मत्तयोर्वरहस्तिनोः ।
भरतश्रेष्ठ! रणभूमिमें उन दोनोंका महान् युद्ध ऐसा जान पड़ता था, मानो मदकी धारा बहानेवाले दो उत्तम मतवाले हाथी आपसमें जूझ रहे हों ।। ३४ १/२ ।।
गौतमस्तु रणे क्रुद्धो द्रौपदेयान् महाबलान् ।। ३५ ।।
विव्याध बहुभिः शूरः शरैः संनतपर्वभिः ।
दूसरी ओर शूरवीर कृपाचार्यने रणभूमिमें कुपित हो महाबली द्रौपदीपुत्रोंको झुकी हुई गाँठवाले बहुत-से बाणोंद्वारा घायल कर दिया ।। ३५ १/२ ।।
तस्य तैरभवद् युद्धमिन्द्रियैरिव देहिनः ।। ३६ ।।
घोररूपमसंवार्यं निर्मर्यादमवर्तत ।
जैसे देहधारी जीवात्माका पाँचों इन्द्रियोंके साथ युद्ध हो रहा हो, उसी प्रकार उन पाँचों भाइयोंके साथ कृपाचार्यका युद्ध हो रहा था। धीरे-धीरे वह युद्ध अत्यन्त घोर, अनिवार्य और अमर्यादित हो गया ।। ३६ १/२ ।।
ते च सम्पीड़यामासुरिन्द्रियाणीव बालिशम् ।। ३७ ।।
स च तान् प्रति संरब्धः प्रत्ययोधयदाहवे ।
जैसे इन्द्रियाँ मूढ़ मनुष्यको पीड़ा देती हैं, उसी प्रकार वे पाँचों भाई कृपाचार्यको पीड़ित करने लगे। कृपाचार्य भी अत्यन्त रोषमें भरकर रणक्षेत्रमें उन सबके साथ युद्ध कर रहे थे ।। ३७ १/२ ।।
एवं चित्रमभूद् युद्धं तस्य तैः सह भारत ।। ३८ ।।
उत्थायोत्थाय हि यथा देहिनामिन्द्रियैर्विभो ।