महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2614, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंभरतश्रेष्ठ! उस समय गान्धारराज शकुनिके पास विशाल प्रास लेकर युद्ध करनेवाले घुड़सवारोंकी दस हजार सेना मौजूद थी। उसीको साथ लेकर वह उस जन-संहारकारी युद्धमें पाण्डव-सेनाके पिछले भागकी ओर गया और वे सब मिलकर पैने बाणोंसे उस सेनापर चोट करने लगे ॥ ३१-३२ ॥ तदभ्रमिव वातेन क्षिप्यमाणं समन्ततः । अभज्यत महाराज पाण्डूनां सुमहद् बलम् ॥ ३३ ॥ महाराज! जैसे वायुके वेगसे मेघोंका दल सब ओरसे छिन्न-भिन्न हो जाता है, उसी प्रकार इस आक्रमणसे पाण्डवोंकी विशाल सेनाका व्यूह भंग हो गया ॥ ३३ ॥ ततो युधिष्ठिरः प्रेक्ष्य भग्नं स्वबलमन्तिकात् । अभ्यनादयद्व्यग्रः सहदेवं महाबलम् ॥ ३४ ॥ तब युधिष्ठिरने पास ही अपनी सेनामें भगदड़ मची देख शान्तभावसे महाबली सहदेवको पुकारा ॥ ३४ ॥ असौ सुबलपुत्रो नो जघनं पीड्य दंशितः । सैन्यानि सूदयत्येष पश्य पाण्डव दुर्मतिम् ॥ ३५ ॥ और कहा—‘पाण्डुनन्दन! कवच धारण करके आया हुआ वह सुबलपुत्र शकुनि हमारी सेनाके पिछले भागको पीड़ा देकर सारे सैनिकोंका संहार कर रहा है; इस दुर्बुद्धिको देखो तो सही ॥ ३५ ॥ गच्छ त्वं द्रौपदेयैश्च शकुनिं सौबलं जहि । रथानीकमहं धक्ष्ये पाञ्चालसहितोऽनघ ॥ ३६ ॥ ‘निष्पाप वीर! तुम द्रौपदीके पुत्रोंको साथ लेकर जाओ और सुबलपुत्र शकुनिको मार डालो। मैं पांचाल योद्धाओंके साथ यहीं रहकर शत्रु की इस रथसेनाको भस्म कर डालूँगा ॥ ३६ ॥ गच्छन्तु कुञ्जराः सर्वे वाजिनश्च सह त्वया । पादाताश्च त्रिसाहस्राः शकुनिं तैर्वृतो जहि ॥ ३७ ॥ ‘तुम्हारे साथ सभी हाथीसवार, घुड़सवार और तीन हजार पैदल सैनिक भी जायँ तथा उन सबसे घिरे रहकर तुम शकुनिका नाश करो' ॥ ३७ ॥ ततो गजाः सप्तशताश्चापपाणिभिरास्थिताः । पञ्च चाश्वसहस्राणि सहदेवश्च वीर्यवान् ॥ ३८ ॥ पादाताश्च त्रिसाहस्रा द्रौपदेयाश्च सर्वशः । रणे ह्यभ्यद्रवंस्ते तु शकुनिं युद्धदुर्मदम् ॥ ३९ ॥ तदनन्तर धर्मराजकी आज्ञाके अनुसार हाथमें धनुष लिये बैठे हुए सवारोंसे युक्त सात सौ हाथी, पाँच हजार घुड़सवार, पराक्रमी सहदेव, तीन हजार पैदल योद्धा और द्रौपदीके सभी पुत्र—इन सबने रणभूमिमें युद्ध-दुर्मद शकुनिपर धावा किया ॥ ३८-३९ ॥