महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2613, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंचारों ओर नीचे बालू और कंकड़ बरसानेवाली हवाएँ चलने लगीं। हाथी आँसू बहाने और थर-थर काँपने लगे ॥ २३ ½ ॥
एतान् घोराननादृत्य समुत्पातान् सुदारुणान् ॥ २४ ॥ पुनर्युद्धाय संयत्ताः क्षत्रियास्तस्थुरव्यथाः । रमणीये कुरुक्षेत्रे पुण्ये स्वर्गं यियासवः ॥ २५ ॥
इन घोर एवं दारुण उत्पातोंकी अवहेलना करके क्षत्रियवीर मनमें व्यथासे रहित हो पुनः युद्धके लिये तैयार हो गये और स्वर्गमें जानेकी अभिलाषा ले रमणीय एवं पुण्यमय कुरुक्षेत्रमें उत्साहपूर्वक डट गये ॥ २४-२५ ॥
ततो गान्धारराजस्य पुत्रः शकुनिरब्रवीत् । युद्ध्यध्वमग्रतो यावत् पृष्ठतो हन्मि पाण्डवान् ॥ २६ ॥
तत्पश्चात् गान्धारराजके पुत्र शकुनिने कौरव-योद्धाओंसे कहा—‘वीरो! तुमलोग सामनेसे युद्ध करो और मैं पीछेसे पाण्डवोंका संहार करता हूँ’ ॥ २६ ॥
ततो नः सम्प्रयातानां मद्रयोधास्तरस्विनः । हृष्टाः किलकिलाशब्दमकुर्वन्तापरे तथा ॥ २७ ॥
इस सलाहके अनुसार जब हमलोग चले तो मद्रदेशके वेगशाली योद्धा तथा अन्य सैनिक हर्षसे उल्लसित हो किलकारियाँ भरने लगे ॥ २७ ॥
अस्मांस्तु पुनरासाद्य लब्धलक्ष्या दुरासदाः । शरासनानि धुन्वन्तः शरवर्षैरवाकिरन् ॥ २८ ॥
इतनेहीमें दुर्धर्ष पाण्डव पुनः हमारे पास आ पहुँचे और हमें अपने लक्ष्यके रूपमें पाकर धनुष हिलाते हुए हम लोगोंपर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २८ ॥
ततो हतं परैस्तत्र मद्रराजबलं तदा । दुर्योधनबलं दृष्ट्वा पुनरासीत् पराङ्मुखम् ॥ २९ ॥
थोड़ी ही देरमें शत्रुओंने वहाँ मद्रराजकी सेनाका संहार कर डाला। यह देख दुर्योधनकी सेना पुनः पीठ दिखाकर भागने लगी ॥ २९ ॥
गान्धारराजस्तु पुनर्वाक्यमाह ततो बली । निवर्तध्वमधर्मज्ञा युध्यध्वं किं सृतेन वः ॥ ३० ॥
तब बलवान् गान्धारराज शकुनिने पुनः इस प्रकार कहा—‘अपने धर्मको न जाननेवाले पापियो! इस तरह तुम्हारे भागनेसे क्या होगा? लौटो और युद्ध करो’ ॥ ३० ॥
अनीकं दशसाहस्रमश्वानां भरतर्षभ । आसीद् गान्धारराजस्य विशालप्रासयोधिनाम् ॥ ३१ ॥ बलेन तेन विक्रम्य वर्तमाने जनक्षये । पृष्ठतः पाण्डवानीकमभ्यघ्नन्निशितैः शरैः ॥ ३२ ॥