महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैसे पक्षी मांसके लिये एक-दूसरेपर झपटते हैं, उसी प्रकार वहाँ योद्धा अपने तीखे शस्त्रोंद्वारा भाइयों, मित्रों और पुत्रोंका भी संहार करते हुए एक-दूसरेपर टूटे पड़ते थे॥ ७१॥
अन्योन्यं प्रतिसंरब्धाः समासाद्य परस्परम्।
अहं पूर्वमहं पूर्वमिति न्यघ्नन् सहस्रशः॥ ७२॥
दोनों पक्षोंके योद्धा एक-दूसरेसे भिड़कर परस्पर अत्यन्त कुपित हो ‘पहले मैं, पहले मैं’ ऐसा कहते हुए सहस्रों सैनिकोंका वध करने लगे॥ ७२॥
संघातेनासनभ्रष्टैरश्वारोहैर्गतासुभिः।
हयाः परिपतन्ति स्म शतशोऽथ सहस्रशः॥ ७३॥
शत्रुओंके आघातसे प्राणशून्य होकर आसनसे भ्रष्ट हुए अश्वारोहियोंके साथ सैकड़ों और हजारों घोड़े धराशायी होने लगे॥ ७३॥
स्फुरतां प्रतिपिष्टानाम्श्वानां शीघ्रगामिनाम्।
स्तनतां च मनुष्याणां सन्नद्धानां विशाम्पते॥ ७४॥
शक्त्यृष्टिप्र्रासशब्दश्च तुमुलः समपद्यत।
भिन्दतां परमर्माणि राजन् दुर्मन्त्रिते तव॥ ७५॥
प्रजापालक नरेश! आपकी खोटी सलाहके अनुसार बहुत-से शीघ्रगामी अश्व गिरकर छटपटा रहे थे। कितने ही पिस गये थे और बहुत-से कवचधारी मनुष्य गर्जना करते हुए शत्रुओंके मर्म विदीर्ण कर रहे थे। उन सबके शक्ति, ऋष्टि और प्रासोंका भयंकर शब्द वहाँ गूँजने लगा था॥ ७४-७५॥
श्रमाभिभूताः संरब्धाः श्रान्तवाहाः पिपासवः।
विक्षताश्च शितैः शस्त्रैरभ्यवर्तन्त तावकाः॥ ७६॥
आपके सैनिक परिश्रमसे थक गये थे, क्रोधमें भरे हुए थे, उनके वाहन भी थकावटसे चूर-चूर हो रहे थे और वे सब-के-सब प्याससे पीड़ित थे। उनके सारे अंग तीक्ष्ण शस्त्रोंसे क्षत-विक्षत हो गये थे॥ ७६॥
मत्ता रुधिरगन्धेन बहवोऽत्र विचेतसः।
जघ्नुः परान् स्वकांश्चैव प्राप्तान् प्राप्ताननन्तरान्॥ ७७॥
वहाँ बहते हुए रक्तकी गन्धसे मतवाले हो बहुत-से सैनिक विवेकशक्ति खो बैठे थे और बारी-बारीसे अपने पास आये हुए शत्रुपक्षके तथा अपने पक्षके सैनिकोंका भी वध कर डालते थे॥ ७७॥
बहवश्च गतप्राणाः क्षत्रिया जयगृद्धिनः।
भूमावभ्यपतन् राजन् शरवृष्टिभिरावृताः॥ ७८॥
राजन्! बहुत-से विजयाभिलाषी क्षत्रिय बाणोंकी वर्षासे आच्छादित हो प्राणोंका परित्याग करके पृथ्वीपर पड़े थे॥ ७८॥