भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2620

वृकगृध्रशृगालानां तुमुले मोदनेऽहनि । आसीद् बलक्षयो घोरस्तव पुत्रस्य पश्यतः ॥ ७९ ॥ भेड़ियों, गीधों और सियारोंका आनन्द बढ़ानेवाले उस भयंकर दिनमें आपके पुत्रकी आँखोंके सामने कौरव-सेनाका घोर संहार हुआ ॥ ७९ ॥

नराश्वकायैः संछन्ना भूमिरूासीद् विशाम्पते । रुधिरोदकचित्रा च भीरूणां भयवर्धिनी ॥ ८० ॥ प्रजानाथ! वह रणभूमि मनुष्यों और घोड़ोंकी लाशोंसे पट गयी थी तथा पानीकी तरह बहाये जाते हुए रक्तसे विचित्र शोभा धारण करके कायरोंका भय बढ़ा रही थी ॥ ८० ॥

असिभिः पट्टिशैः शूलैस्तक्षमाणाः पुनः पुनः । तावकाः पाण्डवेयाश्च न न्यवर्तन्त भारत ॥ ८१ ॥ भारत! खड्गों, पट्टिशों और शूलोंसे एक-दूसरेको बारंबार घायल करते हुए आपके और पाण्डवोंके योद्धा युद्धसे पीछे नहीं हटते थे ॥ ८१ ॥

प्रहरन्तो यथाशक्ति यावत् प्राणस्य धारणम् । योधाः परिपतन्ति स्म वमन्तो रुधिरं व्रणैः ॥ ८२ ॥ जबतक प्राण रहते, तबतक यथाशक्ति प्रहार करते हुए योद्धा अन्ततोगत्वा अपने घावोंसे रक्त बहाते हुए धराशायी हो जाते थे ॥ ८२ ॥

शिरो गृहीत्वा केशेषु कबन्धः स्म प्रदृश्यते । उद्यम्य च शितं खड्गं रुधिरेण परिप्लुतम् ॥ ८३ ॥ वहाँ कोई-कोई कबन्ध (धड़) ऐसा दिखायी दिया, जो एक हाथमें शत्रुके कटे हुए मस्तकको केशसहित पकड़े हुए और दूसरे हाथमें खूनसे रँगी हुई तीखी तलवार उठाये खड़ा था ॥ ८३ ॥

तथोत्थितेषु बहुषु कबन्धेषु नराधिप । तथा रुधिरगन्धेन योधाः कश्मलमाविशन् ॥ ८४ ॥ नरेश्वर! फिर उस तरहके बहुत-से कबन्ध उठे दिखायी देने लगे तथा रुधिरकी गन्धसे प्रायः सभी योद्धाओंपर मोह छा गया था ॥ ८४ ॥

मन्दीभूते ततः शब्दे पाण्डवानां महत् बलम् । अल्पावशिष्टैस्तुरगैरभ्यवर्तत सौबलः ॥ ८५ ॥ तत्पश्चात् जब उस युद्धका कोलाहल कुछ कम हुआ, तब सुबलपुत्र शकुनि थोड़े-से बचे हुए घुड़सवारोंके साथ पुनः पाण्डवोंकी विशाल सेनापर टूट पड़ा ॥ ८५ ॥

ततोऽभ्यधावंस्त्वरिताः पाण्डवा जयगृद्धिनः । पदातयश्च नागाश्च सादिनश्चोद्यतायुधाः ॥ ८६ ॥ कोष्ठकीकृत्य चाप्येनं परिक्षिप्य च सर्वशः । शस्त्रैर्नानाविधैर्जघ्नुर्युद्धपारं तितीर्षवः ॥ ८७ ॥

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