भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2642, कुल 3237 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 2642

इसके बाद शत्रुओंको संताप देनेवाले भीमसेनने दूसरे तीखे भल्लसे दुर्विमोचनको मारकर मृत्युके लोकमें भेज दिया ।। १६ ।।
स हतः प्रापतद् भूमौ स्वरथाद् रथिनां वरः ।
गिरेस्तु कूटजो भग्नॊ मारुतेनेव पादपः ।। १७ ।।
रथियोंमें श्रेष्ठ दुर्विमोचन उस भल्लकी चोट खाकर अपने रथसे भूमिपर गिर पड़ा, मानो पर्वतके शिखरपर उत्पन्न हुआ वृक्ष वायुके वेगसे टूटकर धराशायी हो गया हो ।। १७ ।।
दुष्प्रधर्षं ततश्चैव सुजातं च सुतं तव ।
एकैकं न्यहनत् संख्ये द्वाभ्यां द्वाभ्यां चमूमुखे ।। १८ ।।
तदनन्तर भीमसेनने आपके पुत्र दुष्प्रधर्ष और सुजातको रणक्षेत्रमें सेनाके मुहानेपर दो-दो बाणोंसे मार गिराया ।। १८ ।।
तौ शिलीमुखविद्धाङ्गौ पेततू रथसत्तमौ ।
ततः पतन्तं समरे अभिवीक्ष्य सुतं तव ।। १९ ।।
भल्लेन पातयामास भीमो दुर्विषहं रणे ।
स पपात हतो वाहात् पश्यतां सर्वधन्विनाम् ।। २० ।।
वे दोनों महारथी वीर बाणोंसे सारा शरीर बिंध जानेके कारण रणभूमिमें गिर पड़े। तत्पश्चात् आपके पुत्र दुर्विषहको संग्राममें चढ़ाई करते देख भीमसेनने एक भल्लसे मार गिराया। उस भल्लकी चोट खाकर दुर्विषह सम्पूर्ण धनुर्धरोंके देखते-देखते रथसे नीचे जा गिरा ।। १९-२० ।।
दृष्ट्वा तु निहतान् भ्रातॄन् बहूनेकेन संयुगे ।
अमर्षवशमापन्नः श्रुतर्वा भीममभ्ययात् ।। २१ ।।
युद्धस्थलमें एकमात्र भीमके द्वारा अपने बहुत-से भाइयोंको मारा गया देख श्रुतर्वा अमर्षके वशीभूत हो भीमसेनका सामना करनेके लिये आ पहुँचा ।। २१ ।।
विक्षिपन् सुमहच्चापं कार्तस्वरविभूषितम् ।
विसृजन् सायकांश्चैव विषाग्निप्रतिमान् बहून् ।। २२ ।।
वह अपने सुवर्णभूषित विशाल धनुषको खींचकर उसके द्वारा विष और अग्निके समान भयंकर बहुतेरे बाणोंकी वर्षा कर रहा था ।। २२ ।।
स तु राजन् धनुश्छित्त्वा पाण्डवस्य महामृधे ।
अथैनं छिन्नधन्वानं विंशत्या समवाकिरत् ।। २३ ।।
राजन्! उसने उस महासमरमें पाण्डुपुत्रके धनुषको काटकर कटे हुए धनुषवाले भीमसेनको बीस बाणोंसे घायल कर दिया ।। २३ ।।
ततोऽन्यद् धनुरदाय भीमसेनो महाबलः ।
अवाकिरत् तव सुतं तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।। २४ ।।