महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2649, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ें‘माधव! दुर्योधनकी सेनामें अश्वत्थामा, कृपाचार्य, त्रिगर्तराज सुशर्मा, उलूक, शकुनि और सात्वतवंशी कृतवर्मा—ये थोड़े-से ही वीर सैनिक शेष रह गये हैं ।। मोक्षो न नूनं कालात् तु विद्यते भुवि कस्यचित् ।। १८ ।। तथा विनिहते सैन्ये पश्य दुर्योधनं स्थितम् । अद्याह्ना हि महाराजो हतामित्रो भविष्यति ।। १९ ।। ‘निश्चय ही इस पृथ्वीपर किसीको भी कालसे छुटकारा नहीं मिलता, तभी तो इस प्रकार अपनी सेनाका संहार होनेपर भी दुर्योधन युद्धके लिये खड़ा है, उसे देखिये। आजके दिन महाराज युधिष्ठिर शत्रुहीन हो जायेंगे ।। न हि मे मोक्ष्यते कश्चित् परेषामिह चिन्तये । ये त्वद्य समरं कृष्ण न हास्यन्ति मदोत्कटाः ।। २० ।। तान् वै सर्वान् हनिष्यामि यद्यपि स्युर्न मानुषाः । ‘श्रीकृष्ण! मैं सोचता हूँ कि आज शत्रुदलका कोई भी योद्धा यहाँ मेरे हाथसे बचकर नहीं जा सकेगा। जो मदोन्मत्त वीर आज युद्ध छोड़कर भाग नहीं जायँगे, उन सबको, वे मनुष्य न होकर देवता या दैत्य ही क्यों न हों, मैं मार डालूँगा ।। २० १/२ ।। अद्य युद्धे सुसंक्रुद्धो दीर्घं राज्ञा प्रजागरम् ।। २१ ।। अपनेष्यामि गान्धारं घातयित्वा शितैः शरैः । ‘आज मैं अत्यन्त कुपित हो गान्धारराज शकुनिको पैने बाणोंसे मरवाकर राजा युधिष्ठिरके दीर्घकालीन जागरणरूपी रोगको दूर कर दूँगा ।। २१ १/२ ।। निकृत्या वै दुराचारो यानि रत्नानि सौबलः ।। २२ ।। सभायामहरद् द्यूते पुनस्तान्याहराम्यहम् । ‘दुराचारी सुबलपुत्र शकुनिने द्यूतसभामें छल करके जिन रत्नोंको हर लिया था, उन सबको मैं वापस ले लूँगा ।। अद्य ता अपि रोत्स्यन्ति सर्वा नागपुरे स्त्रियः ।। २३ ।। श्रुत्वा पतींश्च पुत्रांश्च पाण्डवैर्निहतान् युधि । ‘आज हस्तिनापुरकी वे सारी स्त्रियाँ भी युद्धमें पाण्डवोंके हाथसे अपने पतियों और पुत्रोंको मारा गया सुनकर फूट-फूटकर रोयेंगी ।। २३ १/२ ।। समाप्तमद्य वै कर्म सर्वं कृष्ण भविष्यति ।। २४ ।। अद्य दुर्योधनो दीप्तां श्रियं प्राणांश्च मोक्ष्यति । ‘श्रीकृष्ण! आज हमलोगोंका सारा कार्य समाप्त हो जायगा। आज दुर्योधन अपनी उज्ज्वल राजलक्ष्मी और प्राणोंको भी खो बैठेगा ।। २४ १/२ ।। नापयाति भयात् कृष्ण संग्रामाद् यदि चेन्मम ।। २५ ।। निहतं विद्धि वार्ष्णेय धार्तराष्ट्रं सुबालिशम् ।