महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2651, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रतिलभ्य ततः संज्ञां सहदेवो विशाम्पते ॥ ३४ ॥ दुर्योधनं शरैस्तीक्ष्णैः संक्रुद्धः समवाकिरत् । प्रजानाथ! थोड़ी देरमें सचेत होनेपर क्रोधमें भरे हुए सहदेव दुर्योधनपर पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३४ १/२ ॥
पार्थोऽपि युधि विक्रम्य कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ ३५ ॥ शूराणामश्वपृष्ठेभ्यः शिरांसि निचकर्त ह । कुन्तीपुत्र अर्जुनने भी युद्धमें पराक्रम करके घोड़ोंकी पीठोंसे शूरवीरोंके मस्तक काट गिराये ॥ ३५ १/२ ॥
तदनीकं तदा पार्थो व्यधमद् बहुभिः शरैः ॥ ३६ ॥ पातयित्वा हयान् सर्वांस्त्रिगर्तानां रथान् ययौ । पार्थने अपने बहुसंख्यक बाणोंद्वारा घुड़सवारोंकी उस सेनाको छिन्न-भिन्न कर डाला तथा समस्त घोड़ोंको धराशायी करके त्रिगर्तदेशीय रथियोंपर चढ़ाई कर दी ॥
ततस्ते सहिता भूत्वा त्रिगर्तानां महारथाः ॥ ३७ ॥ अर्जुनं वासुदेवं च शरवर्षैरवाकिरन् । तब वे त्रिगर्तदेशीय महारथी एक साथ होकर अर्जुन और श्रीकृष्णको अपने बाणोंकी वर्षासे आच्छादित करने लगे ॥
सत्यकर्माणमाक्षिप्य क्षुरप्रेण महायशाः ॥ ३८ ॥ ततोऽस्य स्यन्दनस्येषां चिच्छिदे पाण्डुनन्दनः । शिलाशितेन च विभो क्षुरप्रेण महायशाः ॥ ३९ ॥ शिरश्चिच्छेद सहसा तप्तकुण्डलभूषणम् । प्रभो! उस समय महायशस्वी पाण्डुनन्दन अर्जुनने क्षुरप्रद्वारा सत्यकर्मापर प्रहार करके उसके रथकी ईषा (हरसा) काट डाली। तत्पश्चात् उन महायशस्वी वीरने शिलापर तेज किये हुए क्षुरप्रद्वारा उसके तपाये हुए सुवर्णके कुण्डलोंसे विभूषित मस्तकको सहसा काट लिया ॥ ३८-३९ १/२ ॥
सत्येषुमथ चादत्त योधानां मिषतां ततः ॥ ४० ॥ यथा सिंहो वने राजन् मृगं परिबुभुक्षितः । राजन्! जैसे वनमें भूखा सिंह किसी मृगको दबोच लेता है, उसी प्रकार अर्जुनने समस्त योद्धाओंके देखते-देखते सत्येषुके भी प्राण हर लिये ॥ ४० १/२ ॥
तं निहत्य ततः पार्थः सुशर्माणं त्रिभिः शरैः ॥ ४१ ॥ विद्ध्वा तानहनत् सर्वान् रथान् रुक्मविभूषितान् । सत्येषुका वध करके अर्जुनने सुशर्माको तीन बाणोंसे घायल कर दिया और उन समस्त स्वर्णभूषित रथोंका विध्वंस कर डाला ॥ ४१ १/२ ॥