भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 266, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 266

अजातशत्रुस्तान् योधान् भीमं त्रातेत्यचोदयत् । ते ययुर्भीमसेनस्य समीपममितौजसः ॥ ७ ॥ तत्पश्चात् भयंकर गर्जना करते हुए भीमने रणक्षेत्रमें उन सबका सामना किया। भीमसेन मृत्युके तुल्य अवस्थामें पहुँच गये थे और अपने प्राणोंका परित्याग करना चाहते थे। उसी समय अजातशत्रु युधिष्ठिरने अपने योद्धाओंको यह कहकर आगे बढ़नेकी आज्ञा दी कि 'तुम सब लोग भीमसेनकी रक्षा करो।' यह सुनकर वे अमित तेजस्वी वीर भीमसेनके समीप चले ॥ ६-७ ॥

युयुधानप्रभृतयो माद्रीपुत्रौ च पाण्डवौ । ते समेत्य सुसंरब्धाः सहिताः पुरुषर्षभाः ॥ ८ ॥ महेष्वासवरैर्गुप्ता द्रोणानीकं बिभित्सवः । समापेतुर्महावीर्या भीमप्रभृतयो रथाः ॥ ९ ॥ सात्यकि आदि महारथी तथा पाण्डुकुमार माद्रीपुत्र नकुल-सहदेव—ये सभी पुरुषश्रेष्ठ वीर परस्पर मिलकर एक साथ अत्यन्त क्रोधमें भरकर बड़े-बड़े धनुर्धरोंसे सुरक्षित हो द्रोणाचार्यकी सेनाको विदीर्ण कर डालनेकी इच्छासे उसपर टूट पड़े। वे भीम आदि सभी महारथी अत्यन्त पराक्रमी थे ॥ ८-९ ॥

तान् प्रत्यगृह्णादव्यग्रो द्रोणोऽपि रथिनां वरः । महारथानतिबलान् वीरान् समरयोधिनः ॥ १० ॥ उस समय रथियोंमें श्रेष्ठ आचार्य द्रोणने घबराहट छोड़कर उन अत्यन्त बलवान् समरभूमिमें युद्ध करनेवाले महारथी वीरोंको रोक दिया ॥ १० ॥

बाह्यं मृत्युभयं कृत्वा तावकान् पाण्डवा ययुः । सादिनः सादिनोऽभ्यघ्नंस्तथैव रथिनो रथान् ॥ ११ ॥ परंतु पाण्डववीर मौतके भयको बाहर छोड़कर आपके सैनिकोंपर चढ़ आये। घुड़सवार घुड़सवारोंको तथा रथारोही योद्धा रथियोंको मारने लगे ॥ ११ ॥

आसीच्छक्त्यासिसम्पातो युद्धमासीत् परश्वधैः । प्रकृष्टमसियुद्धं च बभूव कटुकोदयम् ॥ १२ ॥ उस युद्धमें शक्ति और खड्गोंके घातक प्रहार हो रहे थे। फरसोंसे मार-काट हो रही थी। तलवार खींचकर उसके द्वारा ऐसा भयंकर युद्ध हो रहा था कि उसका कटु परिणाम प्रत्यक्ष सामने आ रहा था ॥ १२ ॥

कुञ्जराणां च सम्पाते युद्धमासीत् सुदारुणम् । अपतत् कुञ्जरादन्यो हयादन्यस्त्ववाक्शिराः ॥ १३ ॥ हाथियोंके संघर्षमें अत्यन्त दारुण संग्राम होने लगा। कोई हाथीसे गिरता था तो कोई घोड़ेसे ही औंधे सिर धराशायी हो रहा था ॥ १३ ॥

नरो बाणविनिर्भिन्नो रथादन्यश्च मारिष ।

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