भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 267

तत्रान्यस्य च सम्मर्दे पतितस्य विवर्मणः ।। १४ ।। शिरः प्रध्वंसयामास वक्षस्याक्रम्य कुञ्जरः । आर्य! उस युद्धमें कितने मनुष्य बाणोंसे विदीर्ण होकर रथसे नीचे गिर जाते थे। कितने ही योद्धा कवचशून्य हो धरतीपर गिर पड़ते थे और सहसा कोई हाथी उनकी छातीपर पैर रखकर उनके मस्तकको भी कुचल देता था ।। १४ १/२ ।। अपरांश्चापरेऽमृद्नन् वारणाः पतितान् नरान् ।। १५ ।। विषाणैश्चावनिं गत्वा व्यभिन्दन् रथिनो बहून् । दूसरे हाथियोंने भी दूसरे बहुत-से गिरे हुए मनुष्यों-को अपने पैरोंसे रौंद डाला। अपने दाँतोंसे धरतीपर आघात करके बहुत-से रथियोंको चीर डाला ।। १५ १/२ ।। नरान्त्रैः केचिदपरे विषाणालग्नसंश्रयैः ।। १६ ।। बभ्रमुः समरे नागा मृद्नन्तः शतशो नरान् । कितने ही गजराज अपने दाँतोंमें लगी हुई मनुष्योंकी आँतें लिये समरभूमिमें सैकड़ों योद्धाओंको कुचलते हुए चक्कर लगा रहे थे ।। १६ १/२ ।। कार्ष्णायसतनुत्राणान् नरांश्चरथकुञ्जरान् ।। १७ ।। पतितान् पोथयाञ्चक्रुर्द्विपाः स्थूलनलानिव । काले रंगके लोहमय कवच धारण करके रणभूमिमें गिरे हुए कितने ही मनुष्यों, रथों, घोड़ों और हाथियोंको बड़े-बड़े गजराजोंने मोटे नरकुलोंके समान रौंद डाला ।। १७ १/२ ।। गृध्रपत्राधिवासांसि शयनानि नराधिपाः ।। १८ ।। ह्रीमन्तः कालसम्पर्कात् सुदुःखान्यनुशेरते । बड़े-बड़े राजा कालसंयोगसे अत्यन्त दुःखदायिनी तथा गीधकी पाँखरूपी बिछौनोंसे युक्त शय्याओंपर लज्जापूर्वक सो रहे थे ।। १८ १/२ ।। हन्ति स्मात्र पिता पुत्रं रथेनाभ्येत्य संयुगे ।। १९ ।। पुत्रश्च पितरं मोहान्निर्मर्यादमवर्तत । वहाँ पिता रथके द्वारा युद्धके मैदानमें आकर पुत्रका ही वध कर डालता था और पुत्र भी मोहवश पिताके प्राण ले रहा था। इस प्रकार वहाँ मर्यादाशून्य युद्ध हो रहा था ।। १९ १/२ ।। रथो भग्न‍ो ध्वजश्छिन्नश्छत्रमुर्व्यां निपातितम् ।। २० ।। युगार्धं छिन्नमादाय प्रदुद्राव तथा हयः । कितने ही रथ टूट गये, ध्वज कट गये, छत्र पृथ्वीपर गिरा दिये गये और जूए खण्डित हो गये। उन खण्डित हुए आधे जूओंको ही लेकर घोड़े तेजीसे भाग रहे थे ।। २० १/२ ।। सासिर्बाहुर्निपतितः शिरश्छिन्नं सकुण्डलम् ।। २१ ।। गजेनाक्षिप्य बलिना रथः संचूर्णितः क्षितौ ।