महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 268, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकितने ही वीरोंकी भुजाएँ तलवारसहित काट गिरायी गयीं, कितनोंके कुण्डलमण्डित मस्तक धड़से अलग कर दिये गये। कहीं किसी बलवान् हाथीने रथको उठाकर फेंक दिया और वह पृथ्वीपर गिरकर चूर-चूर हो गया ।। २१ १/२ ।। रथिना ताडितो नागो नाराचेनापतत् क्षितौ ।। २२ ।। सारोहश्चापतद् वाजी गजेनाभ्याहतो भृशम् । निर्मर्यादं महद् युद्धमवर्तत सुदारुणम् ।। २३ ।। किसी रथीने नाराचके द्वारा गजराजपर आघात किया और वह धराशायी हो गया। किसी हाथीके वेगपूर्वक आघात करनेपर सवारसहित घोड़ा धरतीपर ढेर हो गया। इस प्रकार वहाँ मर्यादाशून्य अत्यन्त भयंकर एवं महान् युद्ध होने लगा ।। २२-२३ ।। हा तात हा पुत्र सखे क्वासि तिष्ठ क्व धावसि । प्रहराहर जह्येनं स्मितक्ष्वेडितगर्जितैः ।। २४ ।। इत्येवमुच्चरन्ति स्म श्रूयन्ते विविधा गिरः । उस समय सभी सैनिक 'हा तात! हा पुत्र! सखे! तुम कहाँ हो? ठहरो, कहाँ भागे जा रहे हो? मारो, लाओ, इसका वध कर डालो'—इस प्रकारकी बातें कह रहे थे। हास्य, उछल-कूद और गर्जनाके साथ उनके मुखसे नाना प्रकारकी बातें सुनायी देती थीं ।। २४ १/२ ।। नरस्याश्वस्य नागस्य समसज्जत शोणितम् ।। २५ ।। उपाशाम्यद् रजो भौमं भीरून् कश्मलमाविशत् । मनुष्य, घोड़े और हाथीके रक्त एक-दूसरेसे मिल रहे थे। उस रक्तप्रवाहसे वहाँकी उड़ती हुई भयंकर धूल शान्त हो गयी। उस रक्तराशिको देखकर भीरु पुरुषोंपर मोह छा जाता था ।। २५ १/२ ।। चक्रेण चक्रमसाद्य वीरो वीरस्य संयुगे ।। २६ ।। अतीतेषुपथे काले जहार गदया शिरः । किसी वीरने अपने चक्रके द्वारा शत्रुपक्षीय वीरके चक्रका निवारण करके युद्धमें बाणप्रहारके योग्य अवसर न होनेके कारण गदासे ही उसका सिर उड़ा दिया ।। २६ १/२ ।। आसीत् केशपरामर्शो मुष्टियुद्धं च दारुणम् ।। २७ ।। नखैर्दन्तैश्च शूराणामद्वीपे द्वीपमिच्छताम् । कुछ लोगोंमें एक-दूसरेके केश पकड़कर युद्ध होने लगा। कितने ही योद्धाओंमें अत्यन्त भयंकर मुक्कोंकी मार होने लगी। कितने ही शूरवीर उस निराश्रय स्थानमें आश्रय ढूँढ़ रहे थे और नखों तथा दाँतोंसे एक-दूसरेको चोट पहुँचा रहे थे ।। २७ १/२ ।। तत्राच्छिद्यत शूरस्य सखड्गो बाहुरुद्यतः ।। २८ ।। सधनुश्चापरस्यापि सशरः साङ्कुशस्तथा ।