महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2669, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंवह मन-ही-मन सोचने लगा कि हमारा और इन क्षत्रियोंका जो महान् संहार हुआ है, इसे महाज्ञानी विदुरजीने अवश्य पहले ही देख और समझ लिया था॥ एवं विचिन्तयानस्तु प्रविविक्षुर्ह्रदं नृपः। दुःखसंतप्तहृदयो दृष्ट्वा राजन् बलक्षयम् ॥ ३० ॥ राजन्! अपनी सेनाका संहार देखकर इस प्रकार चिन्ता करते हुए राजा दुर्योधनका हृदय दुःख और शोकसे संतप्त हो उठा था। उसने सरोवरमें प्रवेश करनेका विचार किया ॥ ३० ॥ पाण्डवास्तु महाराज धृष्टद्युम्नपुरोगमाः। अभ्यद्रवन्त संक्रुद्धास्तव राजन् बलं प्रति ॥ ३१ ॥ शक्त्यृष्टिप्रासहस्तानां बलानामभिगर्जताम्। संकल्पमकरोन्मोघं गाण्डीवेन धनंजयः ॥ ३२ ॥ महाराज! धृष्टद्युम्न आदि पाण्डवोंने अत्यन्त कुपित होकर आपकी सेनापर धावा किया था तथा शक्ति, ऋष्टि और प्रास हाथमें लेकर गर्जना करनेवाले आपके योद्धाओंका सारा संकल्प अर्जुनने अपने गाण्डीव धनुषसे व्यर्थ कर दिया था॥ ३१-३२॥ तान् हत्वा निशितैर्बाणैः सामात्यान् सह बन्धुभिः। रथे श्वेतहये तिष्ठन्नर्जुनो बह्वशोभत ॥ ३३ ॥ अपने पैने बाणोंसे बन्धुओं और मन्त्रियोंसहित उन योद्धाओंका संहार करके श्वेत घोड़ोंवाले रथपर स्थित हुए अर्जुनकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ३३ ॥ सुबलस्य हते पुत्रे सवाजिरथकुञ्जरे। महावनमिव च्छिन्नमभवत् तावकं बलम् ॥ ३४ ॥ घोड़े, रथ और हाथियोंसहित सुबलपुत्रके मारे जानेपर आपकी सेना कटे हुए विशाल वनके समान प्रतीत होती थी ॥ ३४ ॥ अनेकशतसाहस्रे बले दुर्योधनस्य ह। नान्यो महारथो राजन् जीवमानो व्यदृश्यत ॥ ३५ ॥ द्रोणपुत्रादृते वीरात् तथैव कृतवर्मणः। कृपाच्च गौतमाद् राजन् पार्थिवाच्च तवात्मजात् ॥ ३६ ॥ राजन्! दुर्योधनकी कई लाख सेनामेंसे द्रोणपुत्र वीर अश्वत्थामा, कृतवर्मा, गौतमवंशी कृपाचार्य तथा आपके पुत्र राजा दुर्योधनके अतिरिक्त दूसरा कोई महारथी जीवित नहीं दिखायी देता था ॥ ३५-३६ ॥ धृष्टद्युम्नस्तु मां दृष्ट्वा हसन् सात्यकिमब्रवीत्। किमनेन गृहीतेन नानेनार्थोऽस्ति जीवता ॥ ३७ ॥ उस समय मुझे कैदमें पड़ा हुआ देखकर हँसते हुए धृष्टद्युम्नने सात्यकिसे कहा—'इसको कैद करके क्या करना है? इसके जीवित रहनेसे अपना कोई लाभ नहीं