महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2670, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै' ॥ ३७ ॥ धृष्टद्युम्नवचः श्रुत्वा शिनेर्नप्ता महारथः । उद्यम्य निशितं खड्गं हन्तुं मामुद्यतस्तदा ॥ ३८ ॥ धृष्टद्युम्नकी बात सुनकर शिनिपौत्र महारथी सात्यकि तीखी तलवार उठाकर उसी क्षण मुझे मार डालनेके लिये उद्यत हो गये ॥ ३८ ॥ तमागम्य महाप्राज्ञः कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् । मुच्यतां संजयो जीवन्न हन्तव्यः कथंचन ॥ ३९ ॥ उस समय महाज्ञानी श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजी सहसा आकर बोले—'संजयको जीवित छोड़ दो। यह किसी प्रकार वधके योग्य नहीं है' ॥ ३९ ॥ द्वैपायनवचः श्रुत्वा शिनेर्नप्ता कृताञ्जलिः । ततो मामब्रवीन्मुक्त्वा स्वस्ति संजय साधय ॥ ४० ॥ हाथ जोड़े हुए शिनिपौत्र सात्यकिने व्यासजीकी वह बात सुनकर मुझे कैदसे मुक्त करके कहा—'संजय! तुम्हारा कल्याण हो। जाओ, अपना अभीष्ट साधन करो' ॥ ४० ॥ अनुज्ञातस्त्वहं तेन न्यस्तवर्मा निरायुधः । प्रातिष्ठं येन नगरं सायाह्ने रुधिरोक्षितः ॥ ४१ ॥ उनके इस प्रकार आज्ञा देनेपर मैंने कवच उतार दिया और अस्त्र-शस्त्रोंसे रहित हो सायंकालके समय नगरकी ओर प्रस्थित हुआ। उस समय मेरा सारा शरीर रक्तसे भीगा हुआ था ॥ ४१ ॥ क्रोशमात्रमपक्रान्तं गदापाणिमवस्थितम् । एकं दुर्योधनं राजन्नपश्यं भृशविक्षतम् ॥ ४२ ॥ राजन्! एक कोस आनेपर मैंने भागे हुए दुर्योधनको गदा हाथमें लिये अकेला खड़ा देखा। उसके शरीरपर बहुत-से घाव हो गये थे ॥ ४२ ॥ स तु मामश्रुपूर्णाक्षो नाशक्नोदभिवीक्षितुम् । उपप्रैक्षत मां दृष्ट्वा तथा दीनमवस्थितम् ॥ ४३ ॥ मुझपर दृष्टि पड़ते ही उसके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वह अच्छी तरह मेरी ओर देख न सका। मैं उस समय दीनभावसे खड़ा था। वह मेरी उस अवस्थापर दृष्टिपात करता रहा ॥ ४३ ॥ तं चाहमपि शोचन्तं दृष्ट्वैकाकिनमाहवे । मुहूर्तं नाशकं वक्तुमतिदुःखपरिप्लुतः ॥ ४४ ॥ मैं भी युद्धक्षेत्रमें अकेले शोकमग्न हुए दुर्योधनको देखकर अत्यन्त दुःखशोकमें डूब गया और दो घड़ीतक कोई बात मुँहसे न निकाल सका ॥ ४४ ॥ (यस्य मूर्धाभिषिक्तानां सहस्रं मणिमौलिनाम् । आहृत्य च करं सर्वं स्वस्य वै वशमागतम् ॥