महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2671, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुःसागरपर्यन्ता पृथिवी रत्नभूषिता । कर्णेनैकेन यस्यार्थे करमाहारिता पुरा ॥ यस्याज्ञा परराष्ट्रेषु कर्णेनैव प्रसारिता । नाभवद् यस्य शस्त्रेषु खेदो राज्ञः प्रशासतः ॥ आसीनो हास्तिनपुरे क्षेमं राज्यमकण्टकम् । अन्वपालयदैश्वर्यात् कुबेरमपि नास्मरत् ॥ भवनाद् भवनं राजन् प्रयातुः पृथिवीपते । देवालयप्रवेशे च पन्था यस्य हिरण्मयः ॥ आरुह्यैरावतप्रख्यं नागमिन्द्रसमो बली । विभूत्या सुमहत्या यः प्रयाति पृथिवीपतिः ॥ तं भृशक्षतमिन्द्राभं पद्भ्यामेव धरातले । तिष्ठन्तमेकं दृष्ट्वा तु ममाभूत् क्लेश उत्तमः ॥ तस्य चैवंविधस्यास्य जगन्नाथस्य भूपतेः । विपदप्रतिमाभूद् या बलीयान् विधिरेव हि ॥)
मस्तकपर मुकुट धारण करनेवाले सहस्रों मूर्धाभिषिक्त नरेश जिसके लिये भेंट लाकर देते थे और वे सब-के-सब जिसकी अधीनता स्वीकार कर चुके थे, पूर्वकालमें एकमात्र वीर कर्णने जिसके लिये चारों समुद्रोंतक फैली हुई इस रत्नभूषित पृथ्वीसे कर वसूल किया था, कर्णने ही दूसरे राष्ट्रोंमें जिसकी आज्ञाका प्रसार किया था, जिस राजाको राज्य-शासन करते समय कभी हथियार उठानेका कष्ट नहीं सहन करना पड़ा था, जो हस्तिनापुरमें ही रहकर अपने कल्याणमय निष्कण्टक राज्यका निरन्तर पालन करता था, जिसने अपने ऐश्वर्यसे कुबेरको भी भुला दिया था, राजन्! पृथ्विीनाथ! एक घरसे दूसरे घरमें जाने अथवा देवालयमें प्रवेश करनेके हेतु जिसके लिये सुवर्णमय मार्ग बनाया गया था, जो इन्द्रके समान बलवान् भूपाल ऐरावतके समान कान्तिमान् गजराजपर आरूढ़ हो महान् ऐश्वर्यके साथ यात्रा करता था, उसी इन्द्र-तुल्य तेजस्वी राजा दुर्योधनको अत्यन्त घायल हो पाँव-पयादे ही पृथ्वीपर अकेला खड़ा देख मुझे महान् क्लेश हुआ। ऐसे प्रतापी और सम्पूर्ण जगत्के स्वामी इस भूपालको जो अनुपम विपत्ति प्राप्त हुई, उसे देखकर कहना पड़ता है कि ‘विधाता ही सबसे बड़ा बलवान् है’।
ततोऽस्मै तदहं सर्वमुक्तवान् ग्रहणं तदा । द्वैपायनप्रसादाच्च जीवतो मोक्षमाहवे ॥ ४५ ॥
तत्पश्चात् मैंने युद्धमें अपने पकड़े जाने और व्यासजीकी कृपासे जीवित छूटनेका सारा समाचार उससे कह सुनाया ॥ ४५ ॥
स मुहूर्तंमिव ध्यात्वा प्रतिलभ्य च चेतनाम् । भ्रातॄंश्च सर्वसैन्यानि पर्यपृच्छत मां ततः ॥ ४६ ॥