भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 2677

इतस्ततः पलायन्ते हतनाथा हतौजसः ॥ ८१ ॥ ‘सारे शिविरके लोग सब ओर भाग गये। स्वामीके मारे जानेसे हतोत्साह होकर सभी सेवक इधर-उधर पलायन कर रहे हैं॥ ८१॥

अदृष्टपूर्वा दुःखार्ता भयव्याकुललोचनाः । हरिणा इव वित्रस्ता वीक्षमाणा दिशो दश ॥ ८२ ॥ दुर्योधनस्य सचिवा ये केचिदवशेषिताः । राजदारानुपादाय प्रययुर्नगरं प्रति ॥ ८३ ॥ ‘उन सबकी ऐसी अवस्था हो गयी है, जैसी पहले कभी नहीं देखी गयी। सभी दुःखसे आतुर हैं और सबके नेत्र भयसे व्याकुल हो उठे हैं। सभी लोग भयभीत मृगोंके समान दसों दिशाओंकी ओर देख रहे हैं। दुर्योधनके मन्त्रियोंमेंसे जो कोई बच गये हैं, वे राजमहिलाओंको साथ लेकर नगरकी ओर जा रहे हैं॥

प्राप्तकालमहं मन्ये प्रवेशं तैः सह प्रभुम् । युधिष्ठिरमनुज्ञाय वासुदेवं तथैव च ॥ ८४ ॥ ‘मैं राजा युधिष्ठिर और वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी आज्ञा लेकर उन मन्त्रियोंके साथ ही नगरमें प्रवेश करूँ, यही मुझे समयोचित कर्तव्य जान पड़ता है'॥ ८४॥

एतमर्थं महाबाहुरुभयोः स न्यवेदयत् । तस्य प्रीतोऽभवद् राजा नित्यं करुणवेदिता ॥ ८५ ॥ परिष्वज्य महाबाहुर्वैश्यापुत्रं व्यसर्जयत् । ऐसा सोचकर महाबाहु युयुत्सुने उन दोनोंके सामने अपना विचार प्रकट किया। उसकी बात सुनकर निरन्तर करुणाका अनुभव करनेवाले महाबाहु राजा युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने वैश्यकुमारीके पुत्र युयुत्सुको छातीसे लगाकर बिदा कर दिया॥ ८५ १/२॥

ततः स रथमास्थाय द्रुतमश्वानचोदयत् ॥ ८६ ॥ संवाहयितवांश्चापि राजदारान् पुरं प्रति । तत्पश्चात् उसने रथपर बैठाकर तुरंत ही अपने घोड़े बढ़ाये और राजकुलकी स्त्रियोंको राजधानीमें पहुँचा दिया॥ ८६ १/२॥

तैश्चैव सहितः क्षिप्रमस्तं गच्छति भास्करे ॥ ८७ ॥ प्रविष्टो हास्तिनपुरं बाष्पकण्ठोऽश्रुलोचनः । सूर्यके अस्त होते-होते नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए उसने उन सबके साथ हस्तिनापुरमें प्रवेश किया। उस समय उसका गला भर आया था॥ ८७ १/२॥

अपश्यत महाप्राज्ञं विदुरं साश्रुलोचनम् ॥ ८८ ॥ राज्ञः समीपान्निष्क्रान्तं शोकोपहतचेतसम् । राजन्! वहाँ उसने आपके पाससे निकले हुए महाज्ञानी विदुरजीका दर्शन किया, जिनके नेत्रोंमें आँसू भरे हुए थे और मन शोकमें डूबा हुआ था॥ ८८ १/२॥