महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2678, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंतमब्रवीत् सत्यधृतिः प्रणतं त्वग्रतः स्थितम् ॥ ८९ ॥ दिष्ट्या कुरुक्षये वृत्ते अस्मिंस्त्वं पुत्र जीवसि । विना राज्ञः प्रवेशाद् वै किमसि त्वमिहागतः ॥ ९० ॥ एतद् वै कारणं सर्वं विस्तरेण निवेदय । सत्यपरायण विदुरने प्रणाम करके सामने खड़े हुए युयुत्सुसे कहा—'बेटा! बड़े सौभाग्यकी बात है कि कौरवोंके इस विकट संहारमें भी तुम जीवित बच गये हो; परंतु राजा युधिष्ठिरके हस्तिनापुरमें प्रवेश करनेसे पहले ही तुम यहाँ कैसे चले आये? यह सारा कारण मुझे विस्तारपूर्वक बताओ' ॥ ८९-९०१/२ ॥
युयुत्सुरुवाच
निहते शकुनौ तत्र सजातिसुतबान्धवे ॥ ९१ ॥ हतशेषपरीवारो राजा दुर्योधनस्ततः । स्वकं स हयमुत्सृज्य प्राङ्मुखः प्राद्रवद् भयात् ॥ ९२ ॥ युयुत्सुने कहा—चाचाजी! जाति, भाई और पुत्रसहित शकुनिके मारे जानेपर जिसके शेष परिवार नष्ट हो गये थे, वह राजा दुर्योधन अपने घोड़ेको युद्धभूमिमें ही छोड़कर भयके मारे पूर्व दिशाकी ओर भाग गया ॥ ९१-९२ ॥
अपक्रान्ते तु नृपतौ स्कन्धावारनिवेशनात् । भयव्याकुलितं सर्वं प्राद्रवन्नगरं प्रति ॥ ९३ ॥ राजाके छावनीसे दूर भाग जानेपर सब लोग भयसे व्याकुल हो राजधानीकी ओर भाग चले ॥ ९३ ॥
ततो राज्ञः कलत्राणि भ्रातॄणां चास्य सर्वतः । वाहनेषु समारोप्य अध्यक्षाः प्राद्रवन् भयात् ॥ ९४ ॥ तब राजा तथा उनके भाइयोंकी पत्नियोंको सब ओरसे सवारियोंपर बिठाकर अन्तःपुरके अध्यक्ष भी भयके मारे भाग खड़े हुए ॥ ९४ ॥
ततोऽहं समनुज्ञाप्य राजानं सहकेशवम् । प्रविष्टो हास्तिनपुरं रक्षँल्लोकान् प्रधावितान् ॥ ९५ ॥ तदनन्तर मैं भगवान् श्रीकृष्ण और राजा युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर भागे हुए लोगोंकी रक्षाके लिये हस्तिनापुरमें चला आया हूँ ॥ ९५ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वैश्यापुत्रेण भाषितम् । प्राप्तकालमिति ज्ञात्वा विदुरः सर्वधर्मवित् ॥ ९६ ॥ अपूजयदमेयात्मा युयुत्सुं वाक्यमब्रवीत् । प्राप्तकालमिदं सर्वं ब्रुवता भरतक्षये ॥ ९७ ॥ रक्षितः कुलधर्मश्च सानुक्रोशतया त्वया ।