महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2692, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंदैत्याश्च दानवाश्चैव राक्षसाः पार्थिवास्तथा ॥ १५ ॥ क्रियाभ्युपायैर्निहताः क्रियां तस्मात् समाचर । राजन्! कार्यकौशल ही बलवान् है, दूसरी कोई वस्तु नहीं। युधिष्ठिर! दैत्य, दानव, राक्षस तथा बहुत-से भूपाल क्रियात्मक उपायोंसे ही मारे गये हैं; अतः आप भी क्रियात्मक उपायका ही आश्रय लें ॥ १५ १/२ ॥
संजय उवाच
इत्युक्तो वासुदेवेन पाण्डवः संशितव्रतः ॥ १६ ॥ जलस्थं तं महाराज तव पुत्रं महाबलम् । अभ्यभाषत कौन्तेयः प्रहसन्निव भारत ॥ १७ ॥ संजय कहते हैं—महाराज! भरतनन्दन! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर उत्तम एवं कठोर व्रतका पालन करनेवाले पाण्डुकुमार कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने जलमें स्थित हुए आपके महाबली पुत्रसे हँसते हुए-से कहा— ॥ १६-१७ ॥
सुयोधन किमर्थोऽयमारम्भोऽप्सु कृतस्त्वया । सर्वं क्षत्रं घातयित्वा स्वकुलं च विशाम्पते ॥ १८ ॥ जलाशयं प्रविष्टोऽद्य वाञ्छञ्जीवितमात्मनः । उत्तिष्ठ राजन् युध्यस्व सहास्माभिः सुयोधन ॥ १९ ॥ ‘प्रजानाथ सुयोधन! तुमने किसलिये पानीमें यह अनुष्ठान आरम्भ किया है। सम्पूर्ण क्षत्रियों तथा अपने कुलका संहार कराकर आज अपनी जान बचानेकी इच्छासे तुम जलाशयमें घुसे बैठे हो। राजा सुयोधन! उठो और हम लोगोंके साथ युद्ध करो ॥ १८-१९ ॥
स ते दर्पो नरश्रेष्ठ स च मानः क्व ते गतः । यस्त्वं संस्तभ्य सलिलं भीतो राजन् व्यवस्थितः ॥ २० ॥ ‘राजन्! नरश्रेष्ठ! तुम्हारा वह पहलेका दर्प और अभिमान कहाँ चला गया, जो डरके मारे जलका स्तम्भन करके यहाँ छिपे हुए हो? ॥ २० ॥
सर्वे त्वां शूर इत्येवं जना जल्पन्ति संसदि । व्यर्थं तद् भवतो मन्ये शौर्यं सलिलशायिनः ॥ २१ ॥ ‘सभामें सब लोग तुम्हें शूरवीर कहा करते हैं। जब तुम भयभीत होकर पानीमें सो रहे हो, तब तुम्हारे उस तथाकथित शौर्यको मैं व्यर्थ समझता हूँ ॥ २१ ॥
उत्तिष्ठ राजन् युध्यस्व क्षत्रियोऽसि कुलोद्भवः । कौरवेयो विशेषेण कुलं जन्म च संस्मर ॥ २२ ॥ ‘राजन्! उठो, युद्ध करो; क्योंकि तुम कुलीन क्षत्रिय हो, विशेषतः कुरुकुलकी संतान हो। अपने कुल और जन्मका स्मरण तो करो ॥ २२ ॥