भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2693

स कथं कौरवे वंशे प्रशंसन् जन्म चात्मनः ।
युद्धाद् भीतस्ततस्तोयं प्रविश्य प्रतितिष्ठसि ॥ २३ ॥
‘तुम तो कौरववंशमें उत्पन्न होनेके कारण अपने जन्मकी प्रशंसा करते थे। फिर आज युद्धसे डरकर पानीके भीतर कैसे घुसे बैठे हो? ॥ २३ ॥
अयुद्धमव्यवस्थानं नैष धर्मः सनातनः ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यं रणे राजन् पलायनम् ॥ २४ ॥
‘नरेश्वर! युद्ध न करना अथवा युद्धमें स्थिर न रहकर वहाँसे पीठ दिखाकर भागना यह सनातन धर्म नहीं है। नीच पुरुष ही ऐसे कुमार्गका आश्रय लेते हैं। इससे स्वर्गकी प्राप्ति नहीं होती ॥ २४ ॥
कथं पारमगत्वा हि युद्धे त्वं वै जिजीविषुः ।
इमान् निपतितान् दृष्ट्वा पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄंस्तथा ॥ २५ ॥
सम्बन्धिनो वयस्यांश्च मातुलान् बान्धवांस्तथा ।
घातयित्वा कथं तात ह्रदे तिष्ठसि साम्प्रतम् ॥ २६ ॥
‘युद्धसे पार पाये बिना ही तुम्हें जीवित रहनेकी इच्छा कैसे हो गयी? तात! रणभूमिमें गिरे हुए इन पुत्रों, भाइयों और चाचे-ताउओंको देखकर सम्बन्धियों, मित्रों, मामाओं और बन्धु-बान्धवोंका वध कराकर इस समय तालाबमें क्यों छिपे बैठे हो? ॥ २५-२६ ॥
शूरमानी न शूरस्त्वं मृषा वदसि भारत ।
शूरोऽहमिति दुर्बुद्धे सर्वलोकस्य शृण्वतः ॥ २७ ॥
‘तुम अपनेको शूर तो मानते हो, परंतु शूर हो नहीं। भरतवंशके खोटी बुद्धिवाले नरेश! तुम सब लोगोंके सुनते हुए व्यर्थ ही कहा करते हो कि ‘मैं शूरवीर हूँ’ ॥ २७ ॥
न हि शूराः पलायन्ते शत्रून् दृष्ट्वा कथञ्चन ।
ब्रूहि वा त्वं यया वृत्त्या शूर त्यजसि संगरम् ॥ २८ ॥
‘जो वास्तवमें शूरवीर हैं, वे शत्रुओंको देखकर किसी तरह भागते नहीं हैं। अपनेको शूर कहनेवाले सुयोधन! बताओ तो सही, तुम किस वृत्तिका आश्रय लेकर युद्ध छोड़ रहे हो ॥ २८ ॥
स त्वमुत्तिष्ठ युध्यस्व विनीय भयमात्मनः ।
घातयित्वा सर्वसैन्यं भ्रातॄंश्चैव सुयोधन ॥ २९ ॥
नेदानीं जीविते बुद्धिः कार्या धर्मचिकीर्षया ।
क्षत्रधर्ममुपाश्रित्य त्वद्विधेन सुयोधन ॥ ३० ॥
‘अतः तुम अपना भय दूर करके उठो और युद्ध करो। सुयोधन! भाइयों तथा सम्पूर्ण सेनाको मरवाकर क्षत्रियधर्मका आश्रय लिये हुए तुम्हारे-जैसे पुरुषको धर्मसम्पादनकी इच्छासे इस समय केवल अपनी जान बचानेका विचार नहीं करना चाहिये ॥ २९-३० ॥
यत् तु कर्णमुपाश्रित्य शकुनिं चापि सौबलम् ।