महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2694, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंअमर्त्य इव सम्मोहात् त्वमात्मानं न बुद्धवान् ।। ३१ ।। तत् पापं सुमहत् कृत्वा प्रतियुध्यस्व भारत । कथं हि त्वद्विधो मोहाद् रोचयेत पलायनम् ।। ३२ ।। 'तुम जो कर्ण और सुबलपुत्र शकुनिका सहारा लेकर मोहवश अपने-आपको अजर-अमर-सा मान बैठे थे, अपनेको मनुष्य समझते ही नहीं थे, वह महान् पाप करके अब युद्ध क्यों नहीं करते? भारत! उठो, हमारे साथ युद्ध करो। तुम्हारे-जैसा वीर पुरुष मोहवश पीठ दिखाकर भागना कैसे पसंद करेगा? ।। ३१-३२ ।।
क्व ते तत् पौरुषं यातं क्व च मानः सुयोधन । क्व च विक्रान्तता याता क्व च विस्फूर्जितं महत् ।। ३३ ।। क्व ते कृतास्त्रता याता किञ्च शेषे जलाशये । स त्वमुत्तिष्ठ युध्यस्व क्षत्रधर्मेण भारत ।। ३४ ।। 'सुयोधन! तुम्हारा वह पौरुष कहाँ चला गया? कहाँ है वह तुम्हारा अभिमान? कहाँ गया पराक्रम? कहाँ है वह महान् गर्जन-तर्जन? और कहाँ गया वह अस्त्रविद्याका ज्ञान? इस समय इस तालाबमें तुम्हें कैसे नींद आ रही है? भारत! उठो और क्षत्रियधर्मके अनुसार युद्ध करो ।। ३३-३४ ।।
अस्मांस्तु वा पराजित्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् । अथवा निहतोऽस्माभिर्भूभौ स्वप्स्यसि भारत ।। ३५ ।। 'भरतनन्दन! हम सब लोगोंको परास्त करके इस पृथ्वीका शासन करो अथवा हमारे हाथों मारे जाकर सदाके लिये रणभूमिमें सो जाओ ।। ३५ ।।
एष ते परमो धर्मः सृष्टो धात्रा महात्मना । तं कुरुष्व यथातथ्यं राजा भव महारथ ।। ३६ ।। 'भगवान् ब्रह्माने तुम्हारे लिये यही उत्तम धर्म बनाया है। उस धर्मका यथार्थरूपसे पालन करो। महारथी वीर! वास्तवमें राजा बनो (राजोचित पराक्रम प्रकट करो)' ।। ३६ ।।
संजय उवाच
एवमुक्तो महाराज धर्मपुत्रेण धीमता । सलिलस्थस्तव सुत इदं वचनमब्रवीत् ।। ३७ ।। संजय कहते हैं— महाराज! बुद्धिमान् धर्मपुत्र युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर जलके भीतर स्थित हुए तुम्हारे पुत्रने यह बात कही ।। ३७ ।।
दुर्योधन उवाच
नैतच्चित्रं महाराज यद्भीः प्राणिनमाविशेत् । न च प्राणभयाद् भीतो व्यपयातोऽस्मि भारत ।। ३८ ।।