भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2695

दुर्योधन बोला—महाराज! किसी भी प्राणीके मनमें भय समा जाय, यह आश्चर्यकी बात नहीं है; परंतु भरत-नन्दन! मैं प्राणोंके भयसे भागकर यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३८ ॥ अरथश्चानिषङ्गी च निहतः पाष्णिसारथिः । एकश्चाप्यगणः संख्ये प्रत्याश्वासमरोचयम् ॥ ३९ ॥ मेरे पास न तो रथ है और न तरकस। मेरे पार्श्वरक्षक भी मारे जा चुके हैं। मेरी सेना नष्ट हो गयी और मैं युद्धस्थलमें अकेला रह गया था; इस दशामें मुझे कुछ देरतक विश्राम करनेकी इच्छा हुई ॥ ३९ ॥ न प्राणहेतोर्न भयान्न विषादाद् विशाम्पते । इदमम्भः प्रविष्टोऽस्मि श्रमात् त्विदमनुष्ठितम् ॥ ४० ॥ प्रजानाथ! मैं न तो प्राणोंकी रक्षाके लिये, न किसी भयसे और न विषादके ही कारण इस जलमें आ घुसा हूँ। केवल थक जानेके कारण मैंने ऐसा किया है ॥ ४० ॥ त्वं चाश्वसिहि कौन्तेय ये चाप्यनुगतास्तव । अहमुत्थाय वः सर्वान् प्रतियोत्स्यामि संयुगे ॥ ४१ ॥ कुन्तीकुमार! तुम भी कुछ देरतक विश्राम कर लो। तुम्हारे अनुगामी सेवक भी सुस्ता लें। फिर मैं उठकर समरांगणमें तुम सब लोगोंके साथ युद्ध करूँगा ॥ ४१ ॥

युधिष्ठिर उवाच

आश्वस्ता एव सर्वे स्म चिरं त्वां मृगयामहे । तदिदानीं समुत्तिष्ठ युध्यस्वेह सुयोधन ॥ ४२ ॥ युधिष्ठिरने कहा—सुयोधन! हम सब लोग तो सुस्ता ही चुके हैं और बहुत देरसे तुम्हें खोज रहे हैं; इसलिये अब तुम उठो और यहीं युद्ध करो ॥ ४२ ॥ हत्वा वा समरे पार्थान् स्फीतं राज्यमवाप्नुहि । निहतो वा रणेऽस्माभिर्वीरलोकमवाप्स्यसि ॥ ४३ ॥ संग्राममें समस्त पाण्डवोंको मारकर समृद्धिशाली राज्य प्राप्त करो अथवा रणभूमिमें हमारे हाथों मारे जाकर वीरोंको मिलनेयोग्य पुण्यलोकोंमें चले जाओ ॥ ४३ ॥

दुर्योधन उवाच

यदर्थं राज्यमिच्छामि कुरूणां कुरुनन्दन । त इमे निहताः सर्वे भ्रातरो मे जनेश्वर ॥ ४४ ॥ क्षीणरत्नां च पृथिवीं हतक्षत्रियपुङ्गवाम् । न ह्युत्सहाम्यहं भोक्तुं विधवामिव योषितम् ॥ ४५ ॥ दुर्योधन बोला—कुरुनन्दन नरेश्वर! मैं जिनके लिये कौरवोंका राज्य चाहता था, वे मेरे सभी भाई मारे जा चुके हैं। भूमण्डलके सभी क्षत्रियशिरोमणियोंका संहार हो गया है।