भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

पृष्ठ 2696, कुल 3237 में से

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पृष्ठ 2696

यहाँके सभी रत्न नष्ट हो गये हैं; अतः विधवा स्त्रीके समान श्रीहीन हुई इस पृथ्वीका उपभोग करनेके लिये मेरे मनमें तनिक भी उत्साह नहीं है ॥ ४४-४५ ॥ अद्यापि त्वहमाशंसे त्वां विजेतुं युधिष्ठिर । भङ्क्त्वा पाञ्चालपाण्डूनामुत्साहं भरतर्षभ ॥ ४६ ॥ भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! मैं आज भी पांचालों और पाण्डवोंका उत्साह भंग करके तुम्हें जीतनेका हौसला रखता हूँ ॥ ४६ ॥ न त्विदानीमहं मन्ये कार्यं युद्धेन कर्हिचित् । द्रोणे कर्णे च संशान्ते निहते च पितामहे ॥ ४७ ॥ किंतु जब द्रोण और कर्ण शान्त हो गये तथा पितामह भीष्म मार डाले गये तो अब मेरी रायमें कभी भी इस युद्धकी कोई आवश्यकता नहीं रही ॥ ४७ ॥ अस्त्विदानीमियं राजन् केवला पृथिवी तव । असहायो हि को राजा राज्यमिच्छेत् प्रशासितुम् ॥ ४८ ॥ राजन्! अब यह सूनी पृथ्वी तुम्हारी ही रहे। कौन राजा सहायकोंसे रहित होकर राज्य-शासनकी इच्छा करेगा? ॥ ४८ ॥ सुहृदस्तादृशान् हित्वा पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄनपि । भवद्भिश्च हृते राज्ये को नु जीवेन्मादृशः ॥ ४९ ॥ वैसे हितैषी सुहृदों, पुत्रों, भाइयों और पिताओंको छोड़कर तुमलोगोंके द्वारा राज्यका अपहरण हो जानेपर कौन मेरे-जैसा पुरुष जीवित रहेगा? ॥ ४९ ॥ अहं वनं गमिष्यामि ह्यजिनैः प्रतिवासितः । रतिर्हि नास्ति मे राज्ये हतपक्षस्य भारत ॥ ५० ॥ भरतनन्दन! मैं मृगचर्म धारण करके वनमें चला जाऊँगा। अपने पक्षके लोगोंके मारे जानेसे अब इस राज्यमें मेरा तनिक भी अनुराग नहीं है ॥ ५० ॥ हतबान्धवभूयिष्ठा हताश्वा हतकुञ्जरा । एषा ते पृथिवी राजन् भुङ्क्ष्वैनां विगतज्वरः ॥ ५१ ॥ राजन्! यह पृथ्वी, जहाँ मेरे अधिक-से-अधिक भाई-बन्धु, घोड़े और हाथी मारे गये हैं, अब तुम्हारे ही अधिकारमें रहे। तुम निश्चिन्त होकर इसका उपभोग करो ॥ ५१ ॥ वनमेव गमिष्यामि वसानो मृगचर्मणी । न हि मे निर्जनस्यास्ति जीवितेऽद्य स्पृहा विभो ॥ ५२ ॥ प्रभो! मैं तो दो मृगछाला धारण करके वनमें ही चला जाऊँगा, जब मेरे स्वजन ही नहीं रहे, तब मुझे भी इस जीवनको सुरक्षित रखनेकी इच्छा नहीं है ॥ ५२ ॥ गच्छ त्वं भुङ्क्ष्व राजेन्द्र पृथिवीं निहतेश्वराम् । हतयोधां नष्टरत्नां क्षीणवृत्तैर्यथासुखम् ॥ ५३ ॥

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