महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2697, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंराजेन्द्र! जाओ, जिसके स्वामीका नाश हो गया है, योद्धा मारे गये हैं और सारे रत्न नष्ट हो गये हैं, उस पृथ्वीका आनन्दपूर्वक उपभोग करो; क्योंकि तुम्हारी जीविका क्षीण हो गयी थी ॥ ५३ ॥
संजय उवाच
दुर्योधनं तव सुतं सलिलस्थं महायशाः । श्रुत्वा तु करुणं वाक्यमभाषत युधिष्ठिरः ॥ ५४ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! महायशस्वी युधिष्ठिरने वह करुणायुक्त वचन सुनकर पानीमें स्थित हुए आपके पुत्र दुर्योधनसे इस प्रकार कहा ॥ ५४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
आर्तप्रलापान्मा तात सलिलस्थः प्रभाषिथाः । नैतन्मनसि मे राजन् वाशितं शकुनेरिव ॥ ५५ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**नरेश्वर! तुम जलमें स्थित होकर आर्त पुरुषोंके समान प्रलाप न करो। तात! चिड़ियोंके चहचहानेके समान तुम्हारी यह बात मेरे मनमें कोई अर्थ नहीं रखती है ॥ ५५ ॥
यदि वापि समर्थः स्यास्त्वं दानाय सुयोधन । नाहमिच्छेयमवनिं त्वया दत्तां प्रशासितुम् ॥ ५६ ॥ सुयोधन! यदि तुम इसे देनेमें समर्थ होते तो भी मैं तुम्हारी दी हुई इस पृथ्वीपर शासन करनेकी इच्छा नहीं रखता ॥
अधर्मेण न गृह्णीयां त्वया दत्तां महीमिमाम् । न हि धर्मः स्मृतो राजन् क्षत्रियस्य प्रतिग्रहः ॥ ५७ ॥ राजन्! तुम्हारी दी हुई इस भूमिको मैं अधर्मपूर्वक नहीं ले सकता; क्षत्रियके लिये दान लेना धर्म नहीं बताया गया है ॥ ५७ ॥
त्वया दत्तां न चेच्छेयं पृथिवीमखिलामहम् । त्वां तु युद्धे विनिर्जित्य भोक्तास्मि वसुधामिमाम् ॥ ५८ ॥ तुम्हारे देनेपर इस सम्पूर्ण पृथ्वीको भी मैं नहीं लेना चाहता। तुम्हें युद्धमें परास्त करके ही इस वसुधाका उपभोग करूँगा ॥ ५८ ॥
अनीश्वरश्च पृथिवीं कथं त्वं दातुमिच्छसि । त्वयेयं पृथिवी राजन् किन्न दत्ता तदैव हि ॥ ५९ ॥ धर्मतो याचमानानां प्रशमार्थं कुलस्य नः । अब तो तुम स्वयं ही इस पृथ्वीके स्वामी नहीं रहे; फिर इसका दान कैसे करना चाहते हो? राजन्! जब हम लोग कुलमें शान्ति बनाये रखनेके लिये पहले धर्मके अनुसार अपना ही राज्य माँग रहे थे, उसी समय तुमने हमें यह पृथ्वी क्यों नहीं दे दी ॥ ५९१/२ ॥