महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
दुर्योधन बोला—महाराज! किसी भी प्राणीके मनमें भय समा जाय, यह आश्चर्यकी बात नहीं है; परंतु भरत-नन्दन! मैं प्राणोंके भयसे भागकर यहाँ नहीं आया हूँ ॥ ३८ ॥ अरथश्चानिषङ्गी च निहतः पाष्णिसारथिः । एकश्चाप्यगणः संख्ये प्रत्याश्वासमरोचयम् ॥ ३९ ॥ मेरे पास न तो रथ है और न तरकस। मेरे पार्श्वरक्षक भी मारे जा चुके हैं। मेरी सेना नष्ट हो गयी और मैं युद्धस्थलमें अकेला रह गया था; इस दशामें मुझे कुछ देरतक विश्राम करनेकी इच्छा हुई ॥ ३९ ॥ न प्राणहेतोर्न भयान्न विषादाद् विशाम्पते । इदमम्भः प्रविष्टोऽस्मि श्रमात् त्विदमनुष्ठितम् ॥ ४० ॥ प्रजानाथ! मैं न तो प्राणोंकी रक्षाके लिये, न किसी भयसे और न विषादके ही कारण इस जलमें आ घुसा हूँ। केवल थक जानेके कारण मैंने ऐसा किया है ॥ ४० ॥ त्वं चाश्वसिहि कौन्तेय ये चाप्यनुगतास्तव । अहमुत्थाय वः सर्वान् प्रतियोत्स्यामि संयुगे ॥ ४१ ॥ कुन्तीकुमार! तुम भी कुछ देरतक विश्राम कर लो। तुम्हारे अनुगामी सेवक भी सुस्ता लें। फिर मैं उठकर समरांगणमें तुम सब लोगोंके साथ युद्ध करूँगा ॥ ४१ ॥
युधिष्ठिर उवाच
आश्वस्ता एव सर्वे स्म चिरं त्वां मृगयामहे । तदिदानीं समुत्तिष्ठ युध्यस्वेह सुयोधन ॥ ४२ ॥ युधिष्ठिरने कहा—सुयोधन! हम सब लोग तो सुस्ता ही चुके हैं और बहुत देरसे तुम्हें खोज रहे हैं; इसलिये अब तुम उठो और यहीं युद्ध करो ॥ ४२ ॥ हत्वा वा समरे पार्थान् स्फीतं राज्यमवाप्नुहि । निहतो वा रणेऽस्माभिर्वीरलोकमवाप्स्यसि ॥ ४३ ॥ संग्राममें समस्त पाण्डवोंको मारकर समृद्धिशाली राज्य प्राप्त करो अथवा रणभूमिमें हमारे हाथों मारे जाकर वीरोंको मिलनेयोग्य पुण्यलोकोंमें चले जाओ ॥ ४३ ॥
दुर्योधन उवाच
यदर्थं राज्यमिच्छामि कुरूणां कुरुनन्दन । त इमे निहताः सर्वे भ्रातरो मे जनेश्वर ॥ ४४ ॥ क्षीणरत्नां च पृथिवीं हतक्षत्रियपुङ्गवाम् । न ह्युत्सहाम्यहं भोक्तुं विधवामिव योषितम् ॥ ४५ ॥ दुर्योधन बोला—कुरुनन्दन नरेश्वर! मैं जिनके लिये कौरवोंका राज्य चाहता था, वे मेरे सभी भाई मारे जा चुके हैं। भूमण्डलके सभी क्षत्रियशिरोमणियोंका संहार हो गया है।
यहाँके सभी रत्न नष्ट हो गये हैं; अतः विधवा स्त्रीके समान श्रीहीन हुई इस पृथ्वीका उपभोग करनेके लिये मेरे मनमें तनिक भी उत्साह नहीं है ॥ ४४-४५ ॥ अद्यापि त्वहमाशंसे त्वां विजेतुं युधिष्ठिर । भङ्क्त्वा पाञ्चालपाण्डूनामुत्साहं भरतर्षभ ॥ ४६ ॥ भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर! मैं आज भी पांचालों और पाण्डवोंका उत्साह भंग करके तुम्हें जीतनेका हौसला रखता हूँ ॥ ४६ ॥ न त्विदानीमहं मन्ये कार्यं युद्धेन कर्हिचित् । द्रोणे कर्णे च संशान्ते निहते च पितामहे ॥ ४७ ॥ किंतु जब द्रोण और कर्ण शान्त हो गये तथा पितामह भीष्म मार डाले गये तो अब मेरी रायमें कभी भी इस युद्धकी कोई आवश्यकता नहीं रही ॥ ४७ ॥ अस्त्विदानीमियं राजन् केवला पृथिवी तव । असहायो हि को राजा राज्यमिच्छेत् प्रशासितुम् ॥ ४८ ॥ राजन्! अब यह सूनी पृथ्वी तुम्हारी ही रहे। कौन राजा सहायकोंसे रहित होकर राज्य-शासनकी इच्छा करेगा? ॥ ४८ ॥ सुहृदस्तादृशान् हित्वा पुत्रान् भ्रातॄन् पितॄनपि । भवद्भिश्च हृते राज्ये को नु जीवेन्मादृशः ॥ ४९ ॥ वैसे हितैषी सुहृदों, पुत्रों, भाइयों और पिताओंको छोड़कर तुमलोगोंके द्वारा राज्यका अपहरण हो जानेपर कौन मेरे-जैसा पुरुष जीवित रहेगा? ॥ ४९ ॥ अहं वनं गमिष्यामि ह्यजिनैः प्रतिवासितः । रतिर्हि नास्ति मे राज्ये हतपक्षस्य भारत ॥ ५० ॥ भरतनन्दन! मैं मृगचर्म धारण करके वनमें चला जाऊँगा। अपने पक्षके लोगोंके मारे जानेसे अब इस राज्यमें मेरा तनिक भी अनुराग नहीं है ॥ ५० ॥ हतबान्धवभूयिष्ठा हताश्वा हतकुञ्जरा । एषा ते पृथिवी राजन् भुङ्क्ष्वैनां विगतज्वरः ॥ ५१ ॥ राजन्! यह पृथ्वी, जहाँ मेरे अधिक-से-अधिक भाई-बन्धु, घोड़े और हाथी मारे गये हैं, अब तुम्हारे ही अधिकारमें रहे। तुम निश्चिन्त होकर इसका उपभोग करो ॥ ५१ ॥ वनमेव गमिष्यामि वसानो मृगचर्मणी । न हि मे निर्जनस्यास्ति जीवितेऽद्य स्पृहा विभो ॥ ५२ ॥ प्रभो! मैं तो दो मृगछाला धारण करके वनमें ही चला जाऊँगा, जब मेरे स्वजन ही नहीं रहे, तब मुझे भी इस जीवनको सुरक्षित रखनेकी इच्छा नहीं है ॥ ५२ ॥ गच्छ त्वं भुङ्क्ष्व राजेन्द्र पृथिवीं निहतेश्वराम् । हतयोधां नष्टरत्नां क्षीणवृत्तैर्यथासुखम् ॥ ५३ ॥
राजेन्द्र! जाओ, जिसके स्वामीका नाश हो गया है, योद्धा मारे गये हैं और सारे रत्न नष्ट हो गये हैं, उस पृथ्वीका आनन्दपूर्वक उपभोग करो; क्योंकि तुम्हारी जीविका क्षीण हो गयी थी ॥ ५३ ॥
संजय उवाच
दुर्योधनं तव सुतं सलिलस्थं महायशाः । श्रुत्वा तु करुणं वाक्यमभाषत युधिष्ठिरः ॥ ५४ ॥ **संजय कहते हैं—**राजन्! महायशस्वी युधिष्ठिरने वह करुणायुक्त वचन सुनकर पानीमें स्थित हुए आपके पुत्र दुर्योधनसे इस प्रकार कहा ॥ ५४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
आर्तप्रलापान्मा तात सलिलस्थः प्रभाषिथाः । नैतन्मनसि मे राजन् वाशितं शकुनेरिव ॥ ५५ ॥ **युधिष्ठिर बोले—**नरेश्वर! तुम जलमें स्थित होकर आर्त पुरुषोंके समान प्रलाप न करो। तात! चिड़ियोंके चहचहानेके समान तुम्हारी यह बात मेरे मनमें कोई अर्थ नहीं रखती है ॥ ५५ ॥
यदि वापि समर्थः स्यास्त्वं दानाय सुयोधन । नाहमिच्छेयमवनिं त्वया दत्तां प्रशासितुम् ॥ ५६ ॥ सुयोधन! यदि तुम इसे देनेमें समर्थ होते तो भी मैं तुम्हारी दी हुई इस पृथ्वीपर शासन करनेकी इच्छा नहीं रखता ॥
अधर्मेण न गृह्णीयां त्वया दत्तां महीमिमाम् । न हि धर्मः स्मृतो राजन् क्षत्रियस्य प्रतिग्रहः ॥ ५७ ॥ राजन्! तुम्हारी दी हुई इस भूमिको मैं अधर्मपूर्वक नहीं ले सकता; क्षत्रियके लिये दान लेना धर्म नहीं बताया गया है ॥ ५७ ॥
त्वया दत्तां न चेच्छेयं पृथिवीमखिलामहम् । त्वां तु युद्धे विनिर्जित्य भोक्तास्मि वसुधामिमाम् ॥ ५८ ॥ तुम्हारे देनेपर इस सम्पूर्ण पृथ्वीको भी मैं नहीं लेना चाहता। तुम्हें युद्धमें परास्त करके ही इस वसुधाका उपभोग करूँगा ॥ ५८ ॥
अनीश्वरश्च पृथिवीं कथं त्वं दातुमिच्छसि । त्वयेयं पृथिवी राजन् किन्न दत्ता तदैव हि ॥ ५९ ॥ धर्मतो याचमानानां प्रशमार्थं कुलस्य नः । अब तो तुम स्वयं ही इस पृथ्वीके स्वामी नहीं रहे; फिर इसका दान कैसे करना चाहते हो? राजन्! जब हम लोग कुलमें शान्ति बनाये रखनेके लिये पहले धर्मके अनुसार अपना ही राज्य माँग रहे थे, उसी समय तुमने हमें यह पृथ्वी क्यों नहीं दे दी ॥ ५९१/२ ॥
वार्ष्णेयं प्रथमं राजन् प्रत्याख्याय महाबलम् ॥ ६० ॥
किमिदानीं ददासि त्वं को हि ते चित्तविभ्रमः ।
नरेश्वर! पहले महाबली भगवान् श्रीकृष्णको हमारे लिये राज्य देनेसे इनकार करके इस समय क्यों दे रहे हो? तुम्हारे चित्तमें यह कैसा भ्रम छा रहा है? ॥ ६० १/२ ॥
अभियुक्तस्तु को राजा दातुमिच्छेद्वि मेदिनीम् ॥ ६१ ॥
न त्वमद्य महीं दातुमीशः कौरवनन्दन ।
आच्छेत्तुं वा बलाद् राजन् स कथं दातुमिच्छसि ॥ ६२ ॥
जो शत्रुओंसे आक्रान्त हो, ऐसा कौन राजा किसीको भूमि देनेकी इच्छा करेगा? कौरवनन्दन नरेश! अब न तो तुम किसीको पृथ्वी दे सकते हो और न बलपूर्वक उसे छीन ही सकते हो। ऐसी दशामें तुम्हें भूमि देनेकी इच्छा कैसे हो गयी? ॥ ६१-६२ ॥
मां तु निर्जित्य संग्रामे पालयेमां वसुन्धराम् ।
सूच्यग्रेणापि यद् भूमेरपि भिद्येत भारत ॥ ६३ ॥
तन्मात्रमपि तन्मह्यं न ददाति पुरा भवान् ।
स कथं पृथिवीमेतां प्रददासि विशाम्पते ॥ ६४ ॥
मुझे संग्राममें जीतकर इस पृथ्वीका पालन करो। भारत! पहले तो तुम सूईकी नोकसे जितना छिद सके, भूमिका उतना-सा भाग भी मुझे नहीं दे रहे थे। प्रजानाथ! फिर आज यह सारी पृथ्वी कैसे दे रहे हो? ॥ ६३-६४ ॥
सूच्यग्रं नात्यजः पूर्वं स कथं त्यजसि क्षितिम् ।
एवमैश्वर्यमासाद्य प्रशास्य पृथिवीमिमाम् ॥ ६५ ॥
को हि मूढो व्यवस्येत शत्रोर्दातुं वसुन्धराम् ।
पहले तो तुम सूईकी नोक बराबर भी भूमि नहीं छोड़ रहे थे, अब सारी पृथ्वी कैसे त्याग रहे हो? इस प्रकार ऐश्वर्य पाकर इस वसुधाका शासन करके कौन मूर्ख शत्रुके हाथमें अपनी भूमि देना चाहेगा? ॥ ६५ १/२ ॥
त्वं तु केवलमौर्ख्येण विमूढो नावबुद्ध्यसे ॥ ६६ ॥
पृथिवीं दातुकामोऽपि जीवितेन विमोक्ष्यसे ।
तुम तो केवल मूर्खतावश विवेक खो बैठे हो; इसीलिये यह नहीं समझते कि आज भूमि देनेकी इच्छा करनेपर भी तुम्हें अपने जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा ॥ ६६ १/२ ॥
अस्मान् वा त्वं पराजित्य प्रशाधि पृथिवीमिमाम् ॥ ६७ ॥
अथवा निहतोऽस्माभिर्व्रज लोकाननुत्तमान् ।
या तो हमलोगोंको परास्त करके तुम्हीं इस पृथ्वीका शासन करो या हमारे हाथों मारे जाकर परम उत्तम लोकोंमें चले जाओ ॥ ६७ १/२ ॥
आवयोर्जीवतो राजन् मयि च त्वयि च ध्रुवम् ॥ ६८ ॥
संशयः सर्वभूतानां विजये नौ भविष्यति ।
राजन्! मेरे और तुम्हारे दोनोंके जीते-जी हमारी विजयके विषयमें समस्त प्राणियोंको संदेह बना रहेगा।।
जीवितं तव दुष्प्रज्ञ मयि सम्प्रति वर्तते ।। ६९ ।।
जीवयेयमहं कामं न तु त्वं जीवितुं क्षमः ।
दुर्मते! इस समय तुम्हारा जीवन मेरे हाथमें है। मैं इच्छानुसार तुम्हें जीवनदान दे सकता हूँ; परंतु तुम स्वेच्छापूर्वक जीवित रहनेमें समर्थ नहीं हो ।। ६९½ ।।
दहने हि कृतो यत्नस्त्वयास्मासु विशेषतः ।। ७० ।।
आशीविषैर्विषैश्चापि जले चापि प्रवेशनैः ।
त्वया विनिकृता राजन् राज्यस्य हरणेन च ।। ७१ ।।
अप्रियाणां च वचनैर्द्रौपद्याः कर्षणेन च ।
एतस्मात् कारणात् पाप जीवितं ते न विद्यते ।। ७२ ।।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ युध्यस्व युद्धे श्रेयो भविष्यति ।
याद है न, तुमने हमलोगोंको जला डालनेके लिये विशेष प्रयत्न किया था। भीमको विषधर सर्पोंसे डसवाया, विष खिलाकर उन्हें पानीमें डुबाया, हमलोगोंका राज्य छीनकर हमें अपने कपटजालका शिकार बनाया, द्रौपदीको कटु वचन सुनाये और उसके केश खींचे। पापी! इन सब कारणोंसे तुम्हारा जीवन नष्ट-सा हो चुका है। उठो-उठो, युद्ध करो; इसीसे तुम्हारा कल्याण होगा ।। ७०—७२½ ।।
एवं तु विविधा वाचो जययुक्ताः पुनः पुनः ।
कीर्तयन्ति स्म ते वीरास्तत्र तत्र जनाधिप ।। ७३ ।।
नरेश्वर! वे विजयी वीर पाण्डव इस प्रकार वहाँ बारंबार नाना प्रकारकी बातें कहने लगे ।। ७३ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वान्तर्गतगदापर्वणि सुयोधनयुधिष्ठिरसंवादे
एकत्रिंशोऽध्यायः ।। ३१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें दुर्योधन-युधिष्ठिरसंवादविषयक इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३१ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2700)
द्वात्रिंशोऽध्यायः
युधिष्ठिरके कहनेसे दुर्योधनका तालाबसे बाहर होकर किसी एक पाण्डवके साथ गदायुद्धके लिये तैयार होना
धृतराष्ट्र उवाच
एवं संतर्ज्यमानस्तु मम पुत्रो महीपतिः ।
प्रकृत्या मन्युमान् वीरः कथमासीत् परंतपः ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! शत्रुओंको संताप देनेवाला मेरा वीर पुत्र राजा दुर्योधन स्वभावसे ही क्रोधी था। जब युधिष्ठिरने उसे इस प्रकार फटकारा, तब उसकी कैसी दशा हुई? ॥ १ ॥
न हि संतर्जना तेन श्रुतपूर्वा कथञ्चन ।
राजभावेन मान्यश्च सर्वलोकस्य सोऽभवत् ॥ २ ॥
उसने पहले कभी किसी तरह ऐसी फटकार नहीं सुनी थी; क्योंकि राजा होनेके कारण वह सब लोगोंके सम्मानका पात्र था ॥ २ ॥
यस्यातपत्रच्छायापि स्वका भानोस्तथा प्रभा ।
खेदायैवाभिमानित्वात् सहेत् सैवं कथं गिरः ॥ ३ ॥
अभिमानी होनेके कारण जिसके मनमें अपने छत्रकी छाया और सूर्यकी प्रभा भी खेद ही उत्पन्न करती थी, वह ऐसी कठोर बातें कैसे सह सकता था? ॥
इयं च पृथिवी सर्वा सम्लेच्छाटविका भृशम् ।
प्रसादाद् ध्रियते यस्य प्रत्यक्षं तव संजय ॥ ४ ॥
संजय! तुमने तो प्रत्यक्ष ही देखा था कि म्लेच्छों तथा जंगली जातियोंसहित यह सारी पृथ्वी दुर्योधनकी कृपासे ही जीवन धारण करती थी ॥ ४ ॥
स तथा तर्ज्यमानस्तु पाण्डुपुत्रैर्विशेषतः ।
विहीनश्च स्वकैर्भृत्यैर्निर्जने चावृतो भृशम् ॥ ५ ॥
स श्रुत्वा कटुका वाचो जययुक्ताः पुनः पुनः ।
किमब्रवीत् पाण्डवेयांस्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ६ ॥
इस समय वह अपने सेवकोंसे हीन हो चुका था और एकान्त स्थानमें घिर गया था। उस दशामें विशेषतः पाण्डवोंने जब उसे वैसी कड़ी फटकार सुनायी, तब शत्रुओंके विजयसे युक्त उन कटुवचनोंको बारंबार सुनकर दुर्योधनने पाण्डवोंसे क्या कहा? यह मुझे बताओ ॥
संजय उवाच
तर्ज्यमानस्तदा राजन्नुदकस्थस्तवात्मजः ।
युधिष्ठिरेण राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितेन ह ॥ ७ ॥
श्रुत्वा स कटुका वाचो विषमस्थो नराधिपः ।
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य सलिलस्थः पुनः पुनः ॥ ८ ॥
सलिलान्तर्गतो राजा धुन्वन् हस्तौ पुनः पुनः ।
मनश्चकार युद्धाय राजानं चाभ्यभाषत ॥ ९ ॥
**संजयने कहा—**राजाधिराज! राजन्! उस समय भाइयोंसहित युधिष्ठिरने जब इस प्रकार फटकारा, तब जलमें खड़े हुए आपके पुत्रने उन कठोर वचनोंको सुनकर गरम-गरम लंबी साँस छोड़ी। राजा दुर्योधन विषम परिस्थितिमें पड़ गया था और पानीमें स्थित था; इसलिये बारंबार उच्छ्वास लेता रहा। उसने जलके भीतर ही अनेक बार दोनों हाथ हिलाकर मन-ही-मन युद्धका निश्चय किया और राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा— ॥ ७—९ ॥
यूयं ससुहृदः पार्थाः सर्वे सरथवाहनाः ।
अहमेकः परिद्यूनो विरथो हतवाहनः ॥ १० ॥
'तुम सभी पाण्डव अपने हितैषी मित्रोंको साथ लेकर आये हो। तुम्हारे रथ और वाहन भी मौजूद हैं। मैं अकेला थका-माँदा, रथहीन और वाहनशून्य हूँ ॥ १० ॥
आत्तशस्त्रै रथोपेत्तैर्बहुभिः परिवारितः ।
कथमेकः पदातिः सन्नशस्त्रो योद्धुमुत्सहे ॥ ११ ॥
'तुम्हारी संख्या अधिक है। तुमने रथपर बैठकर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र लेकर मुझे घेर रखा है। फिर तुम्हारे साथ मैं अकेला पैदल और अस्त्र-शस्त्रोंसे रहित होकर कैसे युद्ध कर सकता हूँ? ॥ ११ ॥
एकैकेन तु मां यूयं योधयध्वं युधिष्ठिर ।
न ह्येको बहुभिर्वीरैर्न्याय्यो योधयितुं युधि ॥ १२ ॥
'युधिष्ठिर! तुमलोग एक-एक करके मुझसे युद्ध करो। युद्धमें बहुत-से वीरोंके साथ किसी एकको लड़नेके लिये विवश करना न्यायोचित नहीं है ॥ १२ ॥
विशेषतो विकवचः श्रान्तश्चापत्समाश्रितः ।
भृशं विक्षतगात्रश्च श्रान्तवाहनसैनिकः ॥ १३ ॥
'विशेषतः उस दशामें जिसके शरीरपर कवच नहीं हो, जो थका-माँदा, आपत्तिमें पड़ा और अत्यन्त घायल हो तथा जिसके वाहन और सैनिक भी थक गये हों, उसे युद्धके लिये विवश करना न्यायसंगत नहीं है ॥ १३ ॥
न मे त्वत्तो भयं राजन् न च पार्थाद् वृकोदरात् ।
फाल्गुनाद् वासुदेवाद् वा पञ्चालेभ्योऽथवा पुनः ॥ १४ ॥
यमाभ्यां युयुधानाद् वा ये चान्ये तव सैनिकाः ।
एकः सर्वानहं क्रुद्धो वारयिष्ये युधि स्थितः ॥ १५ ॥
'राजन्! मुझे न तो तुमसे, न कुन्तीके बेटे भीमसेनसे, न अर्जुनसे, न श्रीकृष्णसे अथवा पांचालोंसे ही कोई भय है। नकुल-सहदेव, सात्यकि तथा अन्य जो-जो तुम्हारे सैनिक हैं, उनसे भी मैं नहीं डरता। युद्धमें क्रोधपूर्वक स्थित होनेपर मैं अकेला ही तुम सब लोगोंको आगे बढ़नेसे रोक दूँगा।। १४-१५।। धर्ममूला सतां कीर्तिर्मनुष्याणां जनाधिप। धर्मं चैवेह कीर्तिं च पालयन् प्रब्रवीम्यहम्।। १६।। 'नरेश्वर! साधु पुरुषोंकी कीर्तिका मूल कारण धर्म ही है। मैं यहाँ उस धर्म और कीर्तिका पालन करता हुआ ही यह बात कह रहा हूँ।। १६।। अहमुत्थाय सर्वान् वै प्रतियोत्स्यामि संयुगे। अनुगम्यागतान् सर्वानृतून् संवत्सरो यथा।। १७।। 'मैं उठकर रणभूमिमें एक-एक करके आये हुए तुम सब लोगोंके साथ युद्ध करूँगा, ठीक उसी तरह, जैसे संवत्सर बारी-बारीसे आये हुए सम्पूर्ण ऋतुओंको ग्रहण करता है।। १७।। अद्य वः सरथान् साश्वानशस्त्रो विरथोऽपि सन्। नक्षत्राणीव सर्वाणि सविता रात्रिसंक्षये।। १८।। तेजसा नाशयिष्यामि स्थिरीभवत पाण्डवाः। 'पाण्डवो! स्थिर होकर खड़े रहो। आज मैं अस्त्र-शस्त्र एवं रथसे हीन होकर भी घोड़ों और रथोंपर चढ़कर आये हुए तुम सब लोगोंको उसी तरह अपने तेजसे नष्ट कर दूँगा, जैसे रात्रिके अन्तमें सूर्यदेव सम्पूर्ण नक्षत्रोंको अपने तेजसे अदृश्य कर देते हैं।। १८ १/२।। अद्यानृण्यं गमिष्यामि क्षत्रियाणां यशस्विनाम्।। १९।। बाह्लीकद्रोणभीष्माणां कर्णस्य च महात्मनः। जयद्रथस्य शूरस्य भगदत्तस्य चोभयोः।। २०।। मद्रराजस्य शल्यस्य भूरिश्रवस एव च। पुत्राणां भरतश्रेष्ठ शकुनेः सौबलस्य च।। २१।। मित्राणां सुहृदां चैव बान्धवानां तथैव च। आनृण्यमद्य गच्छामि हत्वा त्वां भ्रातृभिः सह।। २२।। एतावदुक्त्वा वचनं विरराम जनाधिपः। 'भरतश्रेष्ठ! आज मैं भाइयोंसहित तुम्हारा वध करके उन यशस्वी क्षत्रियोंके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा। बाह्लीक, द्रोण, भीष्म, महामना कर्ण, शूरवीर जयद्रथ, भगदत्त, मद्रराजशल्य, भूरिश्रवा, सुबलकुमार शकुनि तथा पुत्रों, मित्रों, सुहृदों एवं बन्धु-बान्धवोंके ऋणसे भी उऋण हो जाऊँगा।' राजा दुर्योधन इतना कहकर चुप हो गया।। १९—२२ १/२।।
युधिष्ठिर उवाच
दिष्ट्या त्वमपि जानीषे क्षत्रधर्मं सुयोधन ॥ २३ ॥ दिष्ट्या ते वर्तते बुद्धिर्युद्धायैव महाभुज । दिष्ट्या शूरोऽसि कौरव्य दिष्ट्या जानासि संगरम् ॥ २४ ॥ युधिष्ठिर बोले— सुयोधन! सौभाग्यकी बात है कि तुम भी क्षत्रिय-धर्मको जानते हो। महाबाहो! यह जानकर प्रसन्नता हुई कि अभी तुम्हारा विचार युद्ध करनेका ही है। कुरुनन्दन! तुम शूरवीर हो और युद्ध करना जानते हो—यह हर्ष और सौभाग्यकी बात है ॥ यस्त्वमेको हि नः सर्वान् संगरे योद्धुमिच्छसि । एक एकेन संगम्य यत् ते सम्मतमायुधम् ॥ २५ ॥ तत् त्वमादाय युध्यस्व प्रेक्षकास्ते वयं स्थिताः । तुम रणभूमिमें अकेले ही एक-एकके साथ भिड़कर हम सब लोगोंसे युद्ध करना चाहते हो तो ऐसा ही सही। जो हथियार तुम्हें पसंद हो, उसीको लेकर हमलोगोंमेंसे एक-एकके साथ युद्ध करो। हम सब लोग दर्शक बनकर खड़े रहेंगे ॥ २५ १/२ ॥ स्वयमिष्टं च ते कामं वीर भूयो ददाम्यहम् ॥ २६ ॥ हत्वैकं भवतो राज्यं हतो वा स्वर्गमाप्नुहि । वीर! मैं स्वयं ही पुनः तुम्हें यह अभीष्ट वर देता हूँ कि ‘हममेंसे एकका भी वध कर देनेपर सारा राज्य तुम्हारा हो जायगा अथवा यदि तुम्हीं मारे गये तो स्वर्गलोक प्राप्त करोगे' ॥ २६ १/२ ॥
दुर्योधन उवाच
एकश्चेद् योद्धुमाक्रन्दे शूरोऽद्य मम दीयताम् ॥ २७ ॥ आयुधानामियं चापि वृता त्वत्सम्मते गदा । दुर्योधन बोला— राजन्! यदि ऐसी बात है तो इस महासमरमें मेरे साथ लड़नेके लिये आज किसी भी एक शूरवीरको दे दो और तुम्हारी सम्मतिके अनुसार हथियारोंमें मैंने एकमात्र इस गदाका ही वरण किया है ॥ २७ १/२ ॥ हन्तैकं भवतामेकः शक्यं मां योऽभिमन्यते ॥ २८ ॥ पदातिर्गदया संख्ये स युध्यतु मया सह । मैं हर्षके साथ कह रहा हूँ कि 'तुममेंसे कोई भी एक वीर जो मुझ अकेलेको जीत सकनेका अभिमान रखता हो, वह रणभूमिमें पैदल ही गदाद्वारा मेरे साथ युद्ध करे' ॥ वृत्तानि रथयुद्धानि विचित्राणि पदे पदे ॥ २९ ॥ इदमीकं गदायुद्धं भवत्वद्याद्भुतं महत् । रथके विचित्र युद्ध तो पग-पगपर हुए हैं। आज यह एक अत्यन्त अद्भुत गदायुद्ध भी हो जाय ॥ २९ १/२ ॥ अस्त्राणामपि पर्यायं कर्तुमिच्छन्ति मानवाः ॥ ३० ॥
युद्धानामपि पर्यायो भवत्वनुमते तव ।
मनुष्य बारी-बारीसे एक-एक अस्त्रका प्रयोग करना चाहते हैं; परंतु आज तुम्हारी अनुमतिसे युद्ध भी क्रमशः एक-एक योद्धाके साथ ही हो ।। ३० १/२ ।।
गदया त्वां महाबाहो विजेष्यामि सहानुजम् ।। ३१ ।।
पञ्चालान् सृञ्जयांश्चैव ये चान्ये तव सैनिकाः ।
न हि मे सम्भ्रमो जातु शक्रादपि युधिष्ठिर ।। ३२ ।।
महाबाहो! मैं गदाके द्वारा भाइयोंसहित तुमको, पांचालों और सृंजयोंको तथा जो तुम्हारे दूसरे सैनिक हैं, उनको भी जीत लूँगा। युधिष्ठिर! मुझे इन्द्रसे भी कभी घबराहट नहीं होती ।। ३१-३२ ।।
युधिष्ठिर उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गान्धारे मां योधय सुयोधन ।
एक एकेन संगम्य संयुगे गदया बली ।। ३३ ।।
पुरुषो भव गान्धारे युध्यस्व सुसमाहितः ।
अद्य ते जीवितं नास्ति यदीन्द्रोऽपि तवाश्रयः ।। ३४ ।।
**युधिष्ठिर बोले—**गान्धारीनन्दन! सुयोधन! उठो-उठो और मेरे साथ युद्ध करो। बलवान् तो तुम हो ही। युद्धमें गदाके द्वारा अकेले किसी एक वीरके साथ ही भिड़कर अपने पुरुषत्वका परिचय दो। एकाग्रचित्त होकर युद्ध करो। यदि इन्द्र भी तुम्हारे आश्रयदाता हो जायँ तो भी आज तुम्हारे प्राण नहीं बच सकते ।। ३३-३४ ।।
संजय उवाच
एतत् स नरशार्दूलो नामृष्यत तवात्मजः ।
सलिलान्तर्गतः श्वभ्रे महानाग इव श्वसन् ।। ३५ ।।
**संजय कहते हैं—**राजन्! युधिष्ठिरके इस कथनको जलमें स्थित हुआ आपका पुत्र पुरुषसिंह दुर्योधन नहीं सह सका। वह बिलमें बैठे हुए विशाल सर्पके समान लंबी साँस खींचने लगा ।। ३५ ।।
तथासौ वाक्प्रतोदेन तुद्यमानः पुनः पुनः ।
वचो न ममृषे राजन्नुत्तमाश्वः कशामिव ।। ३६ ।।
राजन्! जैसे अच्छा घोड़ा कोड़ेकी मार नहीं सह सकता है, उसी प्रकार वचनरूपी चाबुकसे बार-बार पीड़ित किया जाता हुआ दुर्योधन युधिष्ठिरकी उस बातको सहन न कर सका ।। ३६ ।।
संक्षोभ्य सलिलं वेगाद् गदामादाय वीर्यवान् ।
अद्रिसारमयीं गुर्वीं काञ्चनाङ्गदभूषणाम् ।। ३७ ।।
अन्तर्जलात् समुत्तस्थौ नागेन्द्र इव निःश्वसन् ।
वह पराक्रमी वीर बड़े वेगसे सोनेके अंगदसे विभूषित एवं लोहेकी बनी हुई भारी गदा हाथमें लेकर पानीको चीरता हुआ उसके भीतरसे उठ खड़ा हुआ और सर्पराजके समान लंबी साँस खींचने लगा ॥ ३७ १/२ ॥
स भित्त्वा स्तम्भितं तोयं स्कन्धे कृत्वाऽऽयसीं गदाम् ॥ ३८ ॥
उदतिष्ठत पुत्रस्ते प्रतपन् रश्मिवानिव ।
कंधेपर लोहेकी गदा रखकर बँधे हुए जलका भेदन करके आपका वह पुत्र प्रतापी सूर्यके समान ऊपर उठा ॥ ३८ १/२ ॥
ततः शौक्यायसीं गुर्वीं जातरूपपरिष्कृताम् ॥ ३९ ॥
गदां परामृशद् धीमान् धार्तराष्ट्रो महाबलः ।
इसके बाद महाबली बुद्धिमान् दुर्योधनने लोहेकी बनी हुई वह सुवर्णभूषित भारी गदा हाथमें ली ॥ ३९ १/२ ॥
गदाहस्तं तु तं दृष्ट्वा सशृङ्गमिव पर्वतम् ॥ ४० ॥
प्रजानामिव संक्रुद्धं शूलपाणिमिव स्थितम् ।
हाथमें गदा लिये हुए दुर्योधनको पाण्डवोंने इस प्रकार देखा, मानो कोई शृंगयुक्त पर्वत हो अथवा प्रजापर कुपित होकर हाथमें त्रिशूल लिये हुए रुद्रदेव खड़े हों ॥
सगदो भारत्तो भाति प्रतपन् भास्करो यथा ॥ ४१ ॥
समुत्तीर्णं महाबाहुं गदाहस्तमरिंदमम् ।
मेनिरे सर्वभूतानि दण्डपाणिमिवान्तकम् ॥ ४२ ॥
वह गदाधारी भरतवंशी वीर तपते हुए सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था। शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबाहु दुर्योधनको हाथमें गदा लिये जलसे निकला हुआ देख समस्त प्राणी ऐसा मानने लगे, मानो दण्डधारी यमराज प्रकट हो गये हों ॥ ४१-४२ ॥
वज्रहस्तं यथा शक्रं शूलहस्तं यथा हरम् ।
ददृशुः सर्वपाञ्चालाः पुत्रं तव जनाधिप ॥ ४३ ॥
नरेश्वर! सम्पूर्ण पांचालोंने आपके पुत्रको वज्रधारी इन्द्र और त्रिशूलधारी रुद्रके समान देखा ॥ ४३ ॥
समुत्तीर्णं तु सम्प्रेक्ष्य समहृष्यन्त सर्वशः ।
पञ्चालाः पाण्डवेयाश्च तेऽन्योन्यस्य तलान् ददुः ॥ ४४ ॥
उसे जलसे बाहर निकला देख समस्त पांचाल और पाण्डव हर्षसे खिल उठे और एक-दूसरेसे हाथ मिलाने लगे ॥ ४४ ॥
अवहासं तु तं मत्वा पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
उद्वृत्य नयने क्रुद्धो दिधक्षुरिव पाण्डवान् ॥ ४५ ॥
महाराज! उनके इस हाथ मिलानेको दुर्योधनने अपना उपहास समझा; अतः क्रोधपूर्वक आँखें घुमाकर पाण्डवोंकी ओर इस प्रकार देखा, मानो उन्हें जलाकर भस्म कर
देना चाहता हो ॥ ४५ ॥ त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा संदष्टदशनच्छदः । प्रत्युवाच ततस्तान् वै पाण्डवान् सह केशवान् ॥ ४६ ॥ उसने अपनी भौंहोंको तीन जगहसे टेढ़ी करके दाँतोंसे ओठको दबाया और श्रीकृष्णसहित पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा ॥ ४६ ॥
दुर्योधन उवाच
अस्यावहासस्य फलं प्रतिभोक्ष्यथ पाण्डवाः । गमिष्यथ हताः सद्यः सपञ्चाला यमक्षयम् ॥ ४७ ॥ दुर्योधन बोला—पांचालो और पाण्डवो! इस उपहासका फल तुम्हें अभी भोगना पड़ेगा; मेरे हाथसे मारे जाकर तुम तत्काल यमलोकमें पहुँच जाओगे ॥ ४७ ॥
संजय उवाच
उत्थितश्च जलात् तस्मात् पुत्रो दुर्योधनस्तव । अतिष्ठत गदापाणी रुधिरेण समुक्षितः ॥ ४८ ॥ संजय कहते हैं—राजन्! आपका पुत्र दुर्योधन उस जलसे निकलकर हाथमें गदा लिये खड़ा हो गया। वह रक्तसे भीगा हुआ था ॥ ४८ ॥ तस्य शोणितदिग्धस्य सलिलेन समुक्षितम् । शरीरं स्म तदा भाति स्रवन्निव महीधरः ॥ ४९ ॥ उस समय खूनसे लथपथ हुए दुर्योधनका शरीर पानीसे भीगकर जलका स्रोत बहानेवाले पर्वतके समान प्रतीत होता था ॥ ४९ ॥ तमुद्यतगदं वीरं मेनिरे तत्र पाण्डवाः । वैवस्वतमिव क्रुद्धं शूलपाणिमिव स्थितम् ॥ ५० ॥ वहाँ हाथमें गदा उठाये हुए वीर दुर्योधनको पाण्डवोंने क्रोधमें भरे हुए यमराज तथा हाथमें त्रिशूल लेकर खड़े हुए रुद्रके समान समझा ॥ ५० ॥ स मेघनिनदो हर्षात्नर्दन्निव च गोवृषः । आजुहाव ततः पार्थान् गदया युधि वीर्यवान् ॥ ५१ ॥ उस पराक्रमी वीरने हँकड़ते हुए साँड़के समान मेघके तुल्य गम्भीर गर्जना करते हुए बड़े हर्षके साथ गदायुद्धके लिये पाण्डवोंको ललकारा ॥ ५१ ॥
दुर्योधन उवाच
एकैकेन च मां यूयामासीदत युधिष्ठिर । न ह्येको बहुभिर्न्याय्यो वीरो योधयितुं युधि ॥ ५२ ॥
**दुर्योधन बोला—**युधिष्ठिर! तुमलोग एक-एक करके मेरे साथ युद्धके लिये आते जाओ। रणभूमिमें किसी एक वीरको बहुसंख्यक वीरोंके साथ युद्धके लिये विवश करना न्यायसंगत नहीं है ॥ ५२ ॥
न्यस्तवर्मा विशेषेण श्रान्तश्चाप्सु परिप्लुतः ।
भृशं विक्षतगात्रश्च हतवाहनसैनिकः ॥ ५३ ॥
विशेषतः उस वीरको जिसने अपना कवच उतार दिया हो, जो थककर जलमें गोता लगाकर विश्राम कर रहा हो, जिसके सारे अंग अत्यन्त घायल हो गये हों तथा जिसके वाहन और सैनिक मार डाले गये हों, किसी समूहके साथ युद्धके लिये बाध्य करना कदापि उचित नहीं है ॥ ५३ ॥
अवश्यमेव योद्धव्यं सर्वैरेव मया सह ।
युक्तं त्वयुक्तमित्येतद् वेत्सि त्वं चैव सर्वदा ॥ ५४ ॥
मुझे तो तुम सब लोगोंके साथ अवश्य युद्ध करना है; परंतु इसमें क्या उचित है और क्या अनुचित; इसे तुम सदा अच्छी तरह जानते हो ॥ ५४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
मा भूदियं तव प्रज्ञा कथमेवं सुयोधन ।
यदाभिमन्युं बहवो जघ्नुर्युधि महारथाः ॥ ५५ ॥
**युधिष्ठिरने कहा—**सुयोधन! जब तुम बहुत-से महारथियोंने मिलकर युद्धमें अभिमन्युको मारा था, उस समय तुम्हारे मनमें ऐसा विचार क्यों नहीं उत्पन्न हुआ? ॥ ५५ ॥
क्षत्रधर्मं भृशं क्रूरं निरपेक्षं सुनिर्घृणम् ।
अन्यथा तु कथं हन्युरभिमन्युं तथा गतम् ॥ ५६ ॥
सर्वे भवन्तो धर्मज्ञाः सर्वे शूरास्तनुत्यजः ।
वास्तवमें क्षत्रियधर्म बड़ा ही क्रूर, किसीकी भी अपेक्षा न रखनेवाला तथा अत्यन्त निर्दय है; अन्यथा तुम सब लोग धर्मज्ञ, शूरवीर तथा युद्धमें शरीरका विसर्जन करनेको उद्यत रहनेवाले होकर भी उस असहाय-अवस्थामें अभिमन्युका वध कैसे कर सकते थे ॥ ५६ १/२ ॥
न्यायेन युध्यतां प्रोक्ता शक्रलोकगतिः परा ॥ ५७ ॥
यद्येकस्तु न हन्तव्यो बहुभिर्धर्म एव तु ।
तदाभिमन्युं बहवो निजघ्नुस्त्वन्मते कथम् ॥ ५८ ॥
न्यायपूर्वक युद्ध करनेवाले वीरोंके लिये परम उत्तम इन्द्रलोककी प्राप्ति बतलायी गयी है। 'बहुत-से योद्धा मिलकर किसी एक वीरको न मारें' यदि यही धर्म है तो तुम्हारी सम्मतिसे अनेक महारथियोंने अभिमन्युका वध कैसे किया? ॥ ५८ ॥
सर्वो विमृशते जन्तुः कृच्छ्रस्थो धर्मदर्शनम् ।
पदस्थः पिहितं द्वारं परलोकस्य पश्यति ॥ ५९ ॥
प्रायः सभी प्राणी जब स्वयं संकटमें पड़ जाते हैं तो अपनी रक्षाके लिये धर्मशास्त्रकी दुहाई देने लगते हैं और जब अपने उच्च पदपर प्रतिष्ठित होते हैं, उस समय उन्हें परलोकका दरवाजा बंद दिखायी देता है ॥ ५९ ॥
आमुञ्च कवचं वीर मूर्धजान् यमयस्व च ।
यच्चान्यदपि ते नास्ति तदप्यादत्स्व भारत ॥ ६० ॥
वीर भरतनन्दन! तुम कवच धारण कर लो, अपने केशोंको अच्छी तरह बाँध लो तथा युद्धकी और कोई आवश्यक सामग्री जो तुम्हारे पास न हो, उसे भी ले लो ॥
इममेकं च ते कामं वीर भूयो ददाम्यहम् ।
पञ्चानां पाण्डवेयानां येन त्वं योद्धुमिच्छसि ॥ ६१ ॥
तं हत्वा वै भवान् राजा हतो वा स्वर्गमाप्नुहि ।
ऋते च जीविताद् वीर युद्धे किं कर्म ते प्रियम् ॥ ६२ ॥
वीर! मैं पुनः तुम्हें एक अभीष्ट वर देता हूँ—'पाँचों पाण्डवोंमेंसे जिसके साथ युद्ध करना चाहो, उस एकका ही वध कर देनेपर तुम राजा हो सकते हो अथवा यदि स्वयं मारे गये तो स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे। शूरवीर! बताओ, युद्धमें जीवनकी रक्षाके सिवा तुम्हारा और कौन-सा प्रिय कार्य हम कर सकते हैं? ॥ ६१-६२ ॥
संजय उवाच
ततस्तव सुतो राजन् वर्म जग्राह काञ्चनम् ।
विचित्रं च शिरस्त्राणं जाम्बूनदपरिष्कृतम् ॥ ६३ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तदनन्तर आपके पुत्रने सुवर्णमय कवच तथा स्वर्णजटित विचित्र शिरस्त्राण धारण किया ॥ ६३ ॥
सोऽवबद्धशिरस्त्राणः शुभकाञ्चनवर्मभृत् ।
रराज राजन् पुत्रस्ते काञ्चनः शैलराडिव ॥ ६४ ॥
महाराज! शिरस्त्राण बाँधकर सुन्दर सुवर्णमय कवच धारण करके आपका पुत्र स्वर्णमय गिरिराज मेरुके समान शोभा पाने लगा ॥ ६४ ॥
संनद्धः सगदो राजन् सज्जः संग्राममूर्धनि ।
अब्रवीत् पाण्डवान् सर्वान् पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥ ६५ ॥
नरेश्वर! युद्धके मुहानेपर सुसज्जित हो कवच बाँधे और गदा हाथमें लिये आपके पुत्र दुर्योधनने समस्त पाण्डवोंसे कहा— ॥ ६५ ॥
भ्रातृणां भवतामेको युध्यतां गदया मया ।
सहदेवेन वा योत्स्ये भीमेन नकुलेन वा ॥ ६६ ॥
अथवा फाल्गुनेनाद्य त्वया वा भरतर्षभ ।
‘भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे भाइयोंमेंसे कोई एक मेरे साथ गदाद्वारा युद्ध करे। मैं सहदेव, नकुल, भीमसेन, अर्जुन अथवा स्वयं तुमसे भी युद्ध कर सकता हूँ ।। ६६ १/२ ।।
योत्स्येऽहं संगरं प्राप्य विजेष्ये च रणाजिरे ।। ६७ ।।
अहमद्य गमिष्यामि वैरस्यान्तं सुदुर्गमम् ।
गदया पुरुषव्याघ्र हेमपट्टनिबद्धया ।। ६८ ।।
‘रणक्षेत्रमें पहुँचकर मैं तुममेंसे किसी एकके साथ युद्ध करूँगा और मेरा विश्वास है कि समरांगणमें विजय पाऊँगा। पुरुषसिंह! आज मैं सुवर्णपत्रजटित गदाके द्वारा वैरके उस पार पहुँच जाऊँगा, जहाँ जाना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है ।। ६७-६८ ।।
गदायुद्धे न मे कश्चित् सदृशोऽस्तीति चिन्तये ।
गदया वो हनिष्यामि सर्वानैव समागतान् ।। ६९ ।।
‘मैं इस बातको सदा याद रखता हूँ कि ‘गदायुद्धमें मेरी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है।’ गदाके द्वारा सामने आनेपर मैं तुम सभी लोगोंको मार डालूँगा ।। ६९ ।।
न मे समर्थाः सर्वे वै योद्धुं न्यायेन केचन ।
न युक्तमात्मना वक्तुमेवं गर्वोद्धतं वचः ।
अथवा सफलं ह्येतत् करिष्ये भवतां पुरः ।। ७० ।।
‘तुम सभी लोग अथवा तुममेंसे कोई भी मेरे साथ न्यायपूर्वक युद्ध करनेमें समर्थ नहीं हो। मुझे स्वयं ही अपने विषयमें इस प्रकार गर्वसे उद्धत वचन नहीं कहना चाहिये, तथापि कहना पड़ा है अथवा कहनेकी क्या आवश्यकता? मैं तुम्हारे सामने ही यह सब सफल कर दिखाऊँगा ।। ७० ।।
अस्मिन् मुहूर्ते सत्यं वा मिथ्या वै तद् भविष्यति ।
गृह्णातु च गदां यो वै योत्स्यतेऽद्य मया सह ।। ७१ ।।
‘मेरा वचन सत्य है या मिथ्या, यह इसी मुहूर्तमें स्पष्ट हो जायगा। आज मेरे साथ जो भी युद्ध करनेको उद्यत हो, वह गदा उठावे’ ।। ७१ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि युधिष्ठिरदुर्योधनसंवादे द्वात्रिंशोऽध्यायः ।। ३२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें युधिष्ठिर और दुर्योधनका संवादविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३२ ।।
अध्याय (पृष्ठ 2710)
त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः
श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको फटकारना, भीमसेनकी प्रशंसा तथा भीम और दुर्योधनमें वाग्युद्ध
संजय उवाच
एवं दुर्योधने राजन् गर्जमाने मुहुर्मुहुः ।
युधिष्ठिरस्य संक्रुद्धो वासुदेवोऽब्रवीदिदम् ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! जब यों कहकर दुर्योधन बारंबार गर्जना करने लगा, उस समय भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त कुपित होकर युधिष्ठिरसे बोले— ॥ १ ॥
यदि नाम ह्ययं युद्धे वरयेत् त्वां युधिष्ठिर ।
अर्जुनं नकुलं चैव सहदेवमथापि वा ॥ २ ॥
‘युधिष्ठिर! यदि यह दुर्योधन युद्धमें तुमको, अर्जुनको अथवा नकुल या सहदेवको ही युद्धके लिये वरण कर ले, तब क्या होगा? ॥ २ ॥
किमिदं साहसं राजंस्त्वया व्याहृतमीदृशम् ।
एकमेव निहत्याजौ भव राजा कुरुष्विति ॥ ३ ॥
‘राजन्! आपने क्यों ऐसी दुःसाहस पूर्ण बात कह डाली कि ‘तुम हममेंसे एकको ही मारकर कौरवोंका राजा हो जाओ' ॥ ३ ॥
न समर्थानिहं मन्ये गदाहस्तस्य संयुगे ।
एतेन हि कृता योग्या वर्षाणीह त्रयोदश ॥ ४ ॥
आयसे पुरुषे राजन् भीमसेनजिघांसया ।
‘मैं नहीं मानता कि आपलोग युद्धमें गदाधारी दुर्योधनका सामना करनेमें समर्थ हैं। राजन्! इसने भीमसेनका वध करनेकी इच्छासे उनकी लोहेकी मूर्तिके साथ तेरह वर्षोंतक गदायुद्धका अभ्यास किया है ॥ ४ ½ ॥
कथं नाम भवेत् कार्यमस्माभिर्भरतर्षभ ॥ ५ ॥
साहसं कृतवांस्त्वं तु ह्यनुक्रोशान्नृपोत्तम ।
‘भरतभूषण! अब हमलोग अपना कार्य कैसे सिद्ध कर सकते हैं? नृपश्रेष्ठ! आपने दयावश यह दुःसाहसपूर्ण कार्य कर डाला है ॥ ५ ½ ॥
नान्यमस्यानुपश्यामि प्रतियोद्धारमाहवे ॥ ६ ॥
ऋते वृकोदरात् पार्थात् स च नातिकृतश्रमः ।
‘मैं कुन्तीपुत्र भीमसेनके सिवा, दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जो गदायुद्धमें दुर्योधनका सामना कर सके, परंतु भीमसेनने भी अधिक परिश्रम नहीं किया है ॥ ६ ½ ॥
तदिदं द्यूतमारब्धं पुनरेव यथा पुरा ।। ७ ।। विषमं शकुनेश्चैव तव चैव विशाम्पते । ‘इस समय आपने पहलेके समान ही पुनः यह जूएका खेल आरम्भ कर दिया है। प्रजानाथ! आपका यह जूआ शकुनिके जूएसे कहीं अधिक भयंकर है ।। ७ १/२ ।।
बली भीमः समर्थश्च कृती राजा सुयोधनः ।। ८ ।। बलवान् वा कृती वेति कृती राजन् विशिष्यते । ‘राजन्! माना कि भीमसेन बलवान् और समर्थ हैं, परंतु राजा दुर्योधनने अभ्यास अधिक किया है। एक ओर बलवान् हो और दूसरी ओर युद्धका अभ्यासी, तो उनमें युद्धका अभ्यास करनेवाला ही बड़ा माना जाता है ।। ८ १/२ ।।
सोऽयं राजंस्त्वया शत्रुः समे पथि निवेशितः ।। ९ ।। न्यस्तश्चात्मा सुविषमे कृच्छ्रमापादिता वयम् । ‘अतः महाराज! आपने अपने शत्रुको समान मार्गपर ला दिया है। अपने-आपको तो भारी संकटमें फँसाया ही है, हमलोगोंको भी भारी कठिनाईमें डाल दिया है ।। ९ १/२ ।।
को नु सर्वान् विनिर्जित्य शत्रूनेकेन वैरिणा ।। १० ।। कृच्छ्रप्राप्तेन च तथा हारयेद् राज्यमागतम् । पणित्वा चैकपाणेन रोचयेदेवमाहवम् ।। ११ ।। ‘भला कौन ऐसा होगा, जो सब शत्रुओंको जीत लेनेके बाद जब एक ही बाकी रह जाय और वह भी संकटमें पड़ा हो तो उसके साथ अपने हाथमें आये हुए राज्यको दाँवपर लगाकर हार जाय और इस प्रकार एकके साथ युद्ध करनेकी शर्त रखकर लड़ना पसंद करे? ।। १०-११ ।।
न हि पश्यामि तं लोके योऽद्य दुर्योधनं रणे । गदाहस्तं विजेतुं वै शक्तः स्यादमरोऽपि हि ।। १२ ।। ‘मैं संसारमें किसी भी शूरवीरको, वह देवता ही क्यों न हो, ऐसा नहीं देखता, जो आज रणभूमिमें गदाधारी दुर्योधनको परास्त करनेमें समर्थ हो ।। १२ ।।
न त्वं भीमो न नकुलः सहदेवोऽथ फाल्गुनः । जेतुं न्यायेन शक्तो वै कृती राजा सुयोधनः ।। १३ ।। ‘आप, भीमसेन, नकुल, सहदेव अथवा अर्जुन—कोई भी न्यायपूर्वक युद्ध करके दुर्योधनपर विजय नहीं पा सकते; क्योंकि राजा सुयोधनने गदायुद्धका अधिक अभ्यास किया है ।। १३ ।।
स कथं वदसे शत्रुं युध्यस्व गदयेति हि । एकं च नो निहत्याजौ भव राजेति भारत ।। १४ ।। ‘भारत! जब ऐसी अवस्था है, तब आपने अपने शत्रुसे कैसे यह कह दिया कि ‘तुम गदाद्वारा युद्ध करो और हममेंसे किसी एकको मारकर राजा हो जाओ’ ।। १४ ।।
वृकोदरं समासाद्य संशयो वै जये हि नः ।
न्यायतो युध्यमानानां कृती ह्येष महाबलः ॥ १५ ॥
‘भीमसेनपर युद्धका भार रखा जाय तो भी हमें विजय मिलनेमें संदेह है; क्योंकि न्यायपूर्वक युद्ध करनेवाले योद्धाओंमें महाबली सुयोधनका अभ्यास सबसे अधिक है ॥ १५ ॥
एकं वास्मान् निहत्य त्वं भव राजेति वै पुनः ।
नूनं न राज्यभागेषा पाण्डोः कुन्त्याश्च संततिः ॥ १६ ॥
अत्यन्तवनवासाय सृष्टा भैक्ष्याय वा पुनः ।
‘फिर भी आपने बारंबार कहा है कि ‘तुम हमलोगोंमेंसे एकको भी मारकर राजा हो जाओ।’ निश्चय ही राजा पाण्डु और कुन्तीदेवीकी संतान राज्य भोगनेकी अधिकारिणी नहीं है। विधाताने इसे अनन्त कालतक वनवास करने अथवा भीख माँगनेके लिये ही पैदा किया है’ ॥ १६ १/२ ॥
भीमसेन उवाच
मधुसूदन मा कार्षीर्विषादं यदुनन्दन ॥ १७ ॥
अद्य पारं गमिष्यामि वैरस्य भृशदुर्गमम् ।
यह सुनकर भीमसेन बोले—मधुसूदन! आप विषाद न करें। यदुनन्दन! मैं आज वैरकी उस अन्तिम सीमापर पहुँच जाऊँगा, जहाँ जाना दूसरोंके लिये अत्यन्त कठिन है ॥ १७ १/२ ॥
अहं सुयोधनं संख्ये हनिष्यामि न संशयः ॥ १८ ॥
विजयो वै ध्रुवः कृष्ण धर्मराजस्य दृश्यते ।
श्रीकृष्ण! इसमें तनिक भी संशय नहीं है कि मैं युद्धमें सुयोधनको मार डालूँगा। मुझे तो धर्मराजकी निश्चय ही विजय दिखायी देती है ॥ १८ १/२ ॥
अध्यर्धेन गुणेनेयं गदा गुरुतरी मम ॥ १९ ॥
न तथा धार्तराष्ट्रस्य मा कार्षीर्माधव व्यथाम् ।
अहमेनं हि गदया संयुगे योद्धुमुत्सहे ॥ २० ॥
मेरी यह गदा दुर्योधनकी गदासे डेढ़गुनी भारी है। ऐसी दुर्योधनकी गदा नहीं है, अतः माधव! आप व्यथित न हों। मैं समरांगणमें इस गदाद्वारा इससे भिड़नेका उत्साह रखता हूँ ॥ १९-२० ॥
भवन्तः प्रेक्षकाः सर्वे मम सन्तु जनार्दन ।
सामरानपि लोकांस्त्रीन् नानाशस्त्रधरान् युधि ॥ २१ ॥
योधयेयं रणे कृष्ण किमुताद्य सुयोधनम् ।
जनार्दन! आप सब लोग दर्शक बनकर मेरा युद्ध देखते रहें। श्रीकृष्ण! मैं रणक्षेत्रमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले देवताओंसहित तीनों लोकोंके साथ युद्ध कर सकता हूँ; फिर इस सुयोधनकी तो बात ही क्या है? ।।
संजय उवाच
तथा सम्भाषमाणं तु वासुदेवो वृकोदरम् ।। २२ ।। हृष्टः सम्पूजयामास वचनं चेदमब्रवीत् । संजय कहते हैं—महाराज! भीमसेनने जब ऐसी बात कही, तब भगवान् श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न होकर उनकी प्रशंसा करने लगे और इस प्रकार बोले— ।। २२ १/२ ।। त्वामाश्रित्य महाबाहो धर्मराजो युधिष्ठिरः ।। २३ ।। निहतारिः स्वकां दीप्तां श्रियं प्राप्तो न संशयः । त्वया विनिहताः सर्वे धृतराष्ट्रसुता रणे ।। २४ ।। ‘महाबाहो! इसमें संदेह नहीं कि धर्मराज युधिष्ठिरने तुम्हारा आश्रय लेकर ही शत्रुओंका संहार करके पुनः अपनी उज्ज्वल राज्यलक्ष्मीको प्राप्त कर लिया है। धृतराष्ट्रके सभी पुत्र तुम्हारे ही हाथसे युद्धमें मारे गये हैं ।। राजानो राजपुत्राश्च नागाश्च विनिपातिताः । कलिङ्गा मागधाः प्राच्या गान्धाराः कुरवस्तथा ।। २५ ।। त्वामासाद्य महायुद्धे निहताः पाण्डुनन्दन । ‘तुमने कितने ही राजाओं, राजकुमारों और गजराजोंको मार गिराया है। पाण्डुनन्दन! कलिंग, मगध, प्राच्य, गान्धार और कुरुदेशके योद्धा भी इस महायुद्धमें तुम्हारे सामने आकर कालके गालमें चले गये हैं ।। २५ १/२ ।। हत्वा दुर्योधनं चापि प्रयच्छोर्वीं ससागराम् ।। २६ ।। धर्मराजाय कौन्तेय यथा विष्णुः शचीपतेः । ‘कुन्तीकुमार! जैसे भगवान् विष्णुने शचीपति इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य प्रदान किया था, उसी प्रकार तुम भी दुर्योधनका वध करके समुद्रोंसहित यह सारी पृथ्वी धर्मराज युधिष्ठिरको समर्पित कर दो ।। २६ १/२ ।। त्वां च प्राप्य रणे पापो धार्तराष्ट्रो विनङ्क्ष्यति ।। २७ ।। त्वमस्य सक्थिनी भङ्क्त्वा प्रतिज्ञां पालयिष्यसि । ‘अवश्य ही रणभूमिमें तुमसे टक्कर लेकर पापी दुर्योधन नष्ट हो जायगा और तुम उसकी दोनों जाँघें तोड़कर अपनी प्रतिज्ञाका पालन करोगे ।। २७ १/२ ।। यत्नेन तु सदा पार्थ योद्धव्यो धृतराष्ट्रजः ।। २८ ।। कृती च बलवांश्चैव युद्धशौण्डश्च नित्यदा ।
‘किंतु पार्थ! तुम्हें दुर्योधनके साथ सदा प्रयत्नपूर्वक युद्ध करना चाहिये; क्योंकि वह अभ्यासकुशल, बलवान् और युद्धकी कलामें निरन्तर चतुर है’॥ २८ १/२ ॥ ततस्तु सात्यकी राजन् पूजयामास पाण्डवम् ॥ २९ ॥ पञ्चालाः पाण्डवेयाश्च धर्मराजपुरोगमाः । तद् वचो भीमसेनस्य सर्व एवाभ्यपूजयन् ॥ ३० ॥ राजन्! तदनन्तर सात्यकिने पाण्डुपुत्र भीमसेनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। धर्मराज आदि पाण्डव तथा पांचाल सभीने भीमसेनके उस वचनका बड़ा आदर किया॥ २९-३०॥ ततो भीमबलो भीमो युधिष्ठिरमथाब्रवीत् । सृञ्जयैः सह तिष्ठन्तं तपन्तमिव भास्करम् ॥ ३१ ॥ तदनन्तर भयंकर बलशाली भीमसेनने सृञ्जयोंके साथ खड़े हुए तपते सूर्यके समान तेजस्वी युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ३१ ॥ अहमेतेन संगम्य संयुगे योद्धुमुत्सहे । न हि शक्तो रणे जेतुं मामेष पुरुषाधमः ॥ ३२ ॥ ‘भैया! मैं रणभूमिमें इस दुर्योधनके साथ भिड़कर लड़नेका उत्साह रखता हूँ। यह नराधम मुझे युद्धमें परास्त नहीं कर सकता॥ ३२॥ अद्य क्रोधं विमोक्ष्यामि निहितं हृदये भृशम् । सुयोधने धार्तराष्ट्रे खाण्डवेऽग्निमिवार्जुनः ॥ ३३ ॥ ‘मेरे हृदयमें दीर्घकालसे जो अत्यन्त क्रोध संचित है, उसे आज मैं धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनपर उसी प्रकार छोड़ूँगा, जैसे अर्जुनने खाण्डव वनमें अग्निदेवको छोड़ा था॥ ३३॥ शल्यमद्योद्धरिष्यामि तव पाण्डव हृच्छयम् । निहत्य गदया पापमद्य राजन् सुखी भव ॥ ३४ ॥ ‘पाण्डुनन्दन! नरेश! आज मैं गदाद्वारा पापी दुर्योधनका वध करके आपके हृदयका काँटा निकाल दूँगा; अतः आप सुखी होइये॥ ३४॥ अद्य कीर्तिमयीं मालां प्रतिमोक्ष्ये तवानघ । प्राणाम् श्रियं च राज्यं च मोक्ष्यतेऽद्य सुयोधनः ॥ ३५ ॥ ‘अनघ! आज आपके गलेमें मैं कीर्तिमयी माला पहनाऊँगा तथा आज यह दुर्योधन अपने राज्यलक्ष्मी और प्राणोंका परित्याग करेगा॥ ३५॥ राजा च धृतराष्ट्रोऽद्य श्रुत्वा पुत्रं मया हतम् । स्मरिष्यत्यशुभं कर्म यत् तच्छकुनिबुद्धिजम् ॥ ३६ ॥ ‘आज मेरे हाथसे पुत्रको मारा गया सुनकर राजा धृतराष्ट्र शकुनिकी सलाहसे किये हुए अपने अशुभ कर्मोंको याद करेंगे’॥ ३६॥