भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2713

जनार्दन! आप सब लोग दर्शक बनकर मेरा युद्ध देखते रहें। श्रीकृष्ण! मैं रणक्षेत्रमें नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र धारण करनेवाले देवताओंसहित तीनों लोकोंके साथ युद्ध कर सकता हूँ; फिर इस सुयोधनकी तो बात ही क्या है? ।।

संजय उवाच

तथा सम्भाषमाणं तु वासुदेवो वृकोदरम् ।। २२ ।। हृष्टः सम्पूजयामास वचनं चेदमब्रवीत् । संजय कहते हैं—महाराज! भीमसेनने जब ऐसी बात कही, तब भगवान् श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न होकर उनकी प्रशंसा करने लगे और इस प्रकार बोले— ।। २२ १/२ ।। त्वामाश्रित्य महाबाहो धर्मराजो युधिष्ठिरः ।। २३ ।। निहतारिः स्वकां दीप्तां श्रियं प्राप्तो न संशयः । त्वया विनिहताः सर्वे धृतराष्ट्रसुता रणे ।। २४ ।। ‘महाबाहो! इसमें संदेह नहीं कि धर्मराज युधिष्ठिरने तुम्हारा आश्रय लेकर ही शत्रुओंका संहार करके पुनः अपनी उज्ज्वल राज्यलक्ष्मीको प्राप्त कर लिया है। धृतराष्ट्रके सभी पुत्र तुम्हारे ही हाथसे युद्धमें मारे गये हैं ।। राजानो राजपुत्राश्च नागाश्च विनिपातिताः । कलिङ्गा मागधाः प्राच्या गान्धाराः कुरवस्तथा ।। २५ ।। त्वामासाद्य महायुद्धे निहताः पाण्डुनन्दन । ‘तुमने कितने ही राजाओं, राजकुमारों और गजराजोंको मार गिराया है। पाण्डुनन्दन! कलिंग, मगध, प्राच्य, गान्धार और कुरुदेशके योद्धा भी इस महायुद्धमें तुम्हारे सामने आकर कालके गालमें चले गये हैं ।। २५ १/२ ।। हत्वा दुर्योधनं चापि प्रयच्छोर्वीं ससागराम् ।। २६ ।। धर्मराजाय कौन्तेय यथा विष्णुः शचीपतेः । ‘कुन्तीकुमार! जैसे भगवान् विष्णुने शचीपति इन्द्रको त्रिलोकीका राज्य प्रदान किया था, उसी प्रकार तुम भी दुर्योधनका वध करके समुद्रोंसहित यह सारी पृथ्वी धर्मराज युधिष्ठिरको समर्पित कर दो ।। २६ १/२ ।। त्वां च प्राप्य रणे पापो धार्तराष्ट्रो विनङ्क्ष्यति ।। २७ ।। त्वमस्य सक्थिनी भङ्क्त्वा प्रतिज्ञां पालयिष्यसि । ‘अवश्य ही रणभूमिमें तुमसे टक्कर लेकर पापी दुर्योधन नष्ट हो जायगा और तुम उसकी दोनों जाँघें तोड़कर अपनी प्रतिज्ञाका पालन करोगे ।। २७ १/२ ।। यत्नेन तु सदा पार्थ योद्धव्यो धृतराष्ट्रजः ।। २८ ।। कृती च बलवांश्चैव युद्धशौण्डश्च नित्यदा ।