भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2714

‘किंतु पार्थ! तुम्हें दुर्योधनके साथ सदा प्रयत्नपूर्वक युद्ध करना चाहिये; क्योंकि वह अभ्यासकुशल, बलवान् और युद्धकी कलामें निरन्तर चतुर है’॥ २८ १/२ ॥ ततस्तु सात्यकी राजन् पूजयामास पाण्डवम् ॥ २९ ॥ पञ्चालाः पाण्डवेयाश्च धर्मराजपुरोगमाः । तद् वचो भीमसेनस्य सर्व एवाभ्यपूजयन् ॥ ३० ॥ राजन्! तदनन्तर सात्यकिने पाण्डुपुत्र भीमसेनकी भूरि-भूरि प्रशंसा की। धर्मराज आदि पाण्डव तथा पांचाल सभीने भीमसेनके उस वचनका बड़ा आदर किया॥ २९-३०॥ ततो भीमबलो भीमो युधिष्ठिरमथाब्रवीत् । सृञ्जयैः सह तिष्ठन्तं तपन्तमिव भास्करम् ॥ ३१ ॥ तदनन्तर भयंकर बलशाली भीमसेनने सृञ्जयोंके साथ खड़े हुए तपते सूर्यके समान तेजस्वी युधिष्ठिरसे कहा— ॥ ३१ ॥ अहमेतेन संगम्य संयुगे योद्धुमुत्सहे । न हि शक्तो रणे जेतुं मामेष पुरुषाधमः ॥ ३२ ॥ ‘भैया! मैं रणभूमिमें इस दुर्योधनके साथ भिड़कर लड़नेका उत्साह रखता हूँ। यह नराधम मुझे युद्धमें परास्त नहीं कर सकता॥ ३२॥ अद्य क्रोधं विमोक्ष्यामि निहितं हृदये भृशम् । सुयोधने धार्तराष्ट्रे खाण्डवेऽग्निमिवार्जुनः ॥ ३३ ॥ ‘मेरे हृदयमें दीर्घकालसे जो अत्यन्त क्रोध संचित है, उसे आज मैं धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनपर उसी प्रकार छोड़ूँगा, जैसे अर्जुनने खाण्डव वनमें अग्निदेवको छोड़ा था॥ ३३॥ शल्यमद्योद्धरिष्यामि तव पाण्डव हृच्छयम् । निहत्य गदया पापमद्य राजन् सुखी भव ॥ ३४ ॥ ‘पाण्डुनन्दन! नरेश! आज मैं गदाद्वारा पापी दुर्योधनका वध करके आपके हृदयका काँटा निकाल दूँगा; अतः आप सुखी होइये॥ ३४॥ अद्य कीर्तिमयीं मालां प्रतिमोक्ष्ये तवानघ । प्राणाम् श्रियं च राज्यं च मोक्ष्यतेऽद्य सुयोधनः ॥ ३५ ॥ ‘अनघ! आज आपके गलेमें मैं कीर्तिमयी माला पहनाऊँगा तथा आज यह दुर्योधन अपने राज्यलक्ष्मी और प्राणोंका परित्याग करेगा॥ ३५॥ राजा च धृतराष्ट्रोऽद्य श्रुत्वा पुत्रं मया हतम् । स्मरिष्यत्यशुभं कर्म यत् तच्छकुनिबुद्धिजम् ॥ ३६ ॥ ‘आज मेरे हाथसे पुत्रको मारा गया सुनकर राजा धृतराष्ट्र शकुनिकी सलाहसे किये हुए अपने अशुभ कर्मोंको याद करेंगे’॥ ३६॥