भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 270

कुर्वन्तः शासनं तस्य पाण्डवा बाहुशालिनः ॥ ३६ ॥ सरो हंसा इवापेतुर्घ्नन्तो द्रोणरथं प्रति । तदनन्तर अपनी भुजाओंसे सुशोभित होनेवाले पाण्डव सेनापतिकी आज्ञाका पालन करनेके लिये वहाँ द्रोणाचार्यके रथपर प्रहार करते हुए उसी प्रकार टूट पड़े, जैसे बहुत-से हंस किसी सरोवरपर सब ओरसे उड़कर आते हैं ॥ ३६ १/२ ॥

गृह्णीताद्रवतान्योन्यं विभीता विनिकृन्तत ॥ ३७ ॥ इत्यासीत् तुमुलः शब्दो दुर्धर्षस्य रथं प्रति । उस समय दुर्धर्ष वीर द्रोणाचार्यके रथके समीप सब ओरसे यही भयानक आवाज आने लगी कि ‘दौड़ो, पकड़ो और निर्भय होकर शत्रुओंको काट डालो’ ॥ ३७ १/२ ॥

ततो द्रोणः कृपः कर्णो द्रौणी राजा जयद्रथः ॥ ३८ ॥ विन्दानुविन्दावावन्त्यौ शल्यश्चैतान् न्यवारयन् । तब द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, राजा जयद्रथ, अवन्तीके राजकुमार विन्द और अनुविन्द तथा राजा शल्यने मिलकर इन आक्रमणकारियोंको रोका ॥ ३८ १/२ ॥

ते त्वार्यधर्मसंरब्धा दुर्निवारा दुरासदाः ॥ ३९ ॥ शरार्ता न जहुर्द्रोणं पञ्चालाः पाण्डवैः सह । वे पाण्डवोंसहित पाञ्चालवीर आर्यधर्मके अनुसार विजयके लिये प्रयत्नशील थे। उन्हें रोकना या पराजित करना बहुत कठिन था। वे बाणोंसे पीड़ित होनेपर भी द्रोणाचार्यको छोड़ न सके ॥ ३९ १/२ ॥

ततो द्रोणोऽतिसंक्रुद्धो विसृजञ्छतशः शरान् ॥ ४० ॥ चेदिपञ्चालपाण्डूनामकरोत् कदनं महत् । यह देख अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्यने सैकड़ों बाणोंकी वर्षा करके चेदि, पांचाल तथा पाण्डव-योद्धाओंका महान् संहार आरम्भ किया ॥ ४० १/२ ॥

तस्य ज्यातलनिर्घोषः शुश्रुवे दिक्षु मारिष ॥ ४१ ॥ वज्रसंहादसंकाशस्त्रासयन् मानवान् बहून् । आर्य! उनके धनुषकी प्रत्यंचाका गम्भीर घोष सम्पूर्ण दिशाओंमें सुनायी देता था। वह वज्रकी गर्जनाके समान घोर शब्द बहुसंख्यक मनुष्योंको भयभीत कर रहा था ॥ ४१ १/२ ॥

एतस्मिन्नन्तरे जिष्णुर्जित्वा संशप्तकान् बहून् ॥ ४२ ॥ अभ्ययात् तत्र यत्रासौ द्रोणः पाण्डून् प्रमर्दति । इसी समय अर्जुन बहुत-से संशप्तकोंपर विजय प्राप्त करके उस स्थानपर आये, जहाँ आचार्य द्रोण पाण्डव-सैनिकोंका मर्दन कर रहे थे ॥ ४२ १/२ ॥

ताञ्छरौघान् महावर्तान् शोणितोदान् महाह्रदान् ॥ ४३ ॥ तीर्णः संशप्तकान् हत्वा प्रत्यदृश्यत फाल्गुनः ।