महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 271, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंशप्तक योद्धा महान् सरोवरोंके समान थे, बाणोंके समूह ही उनके जल-प्रवाह थे, धनुष ही उनमें उठी हुई बड़ी-बड़ी भँवरोंके समान जान पड़ते थे तथा प्रवाहित होनेवाला रक्त ही उन सरोवरोंका जल था। अर्जुन संशप्तकोंका वध करके उन महान् सरोवरोंके पार होकर वहाँ आते दिखायी दिये थे ॥ ४३ १/२ ॥ तस्य कीर्तिमतो लक्ष्म सूर्यप्रतिमतेजसः ॥ ४४ ॥ दीप्यमानमपश्याम तेजसा वानरध्वजम् । सूर्यके समान तेजस्वी एवं यशस्वी अर्जुनके चिह्नस्वरूप वानरध्वजको हमने दूरसे ही देखा, जो अपने दिव्य तेजसे उद्भासित हो रहा था ॥ ४४ १/२ ॥ संशप्तकसमुद्रं तमुच्छोष्यास्त्रगभस्तिभिः ॥ ४५ ॥ स पाण्डवयुगान्तार्कः कुरूनप्यभ्यतीपतत् । वे पाण्डुवंशके प्रलयकालीन सूर्य अपनी अस्त्रमयी किरणोंसे उस संशप्तकरूपी समुद्रको सोखकर कौरव-सैनिकोंको भी संतप्त करने लगे ॥ ४५ १/२ ॥ प्रददाह कुरून् सर्वानर्जुनः शस्त्रतेजसा ॥ ४६ ॥ युगान्ते सर्वभूतानि धूमकेतुरिवोत्थितः । जैसे प्रलयकालमें प्रकट हुई अग्नि सम्पूर्ण भूतोंको दग्ध कर देती है, उसी प्रकार अर्जुनने अपने अस्त्र-शस्त्रोंके तेजसे समस्त कौरव-सैनिकोंको जलाना आरम्भ किया ॥ ४६ १/२ ॥ तेन बाणसहस्रौघैर्गजाश्वरथयोधिनः ॥ ४७ ॥ ताड्यमानाः क्षितिं जग्मुर्मुक्तकेशाः शरार्दिताः । हाथी, घोड़े तथा रथपर आरूढ़ होकर युद्ध करनेवाले बहुत-से योद्धा अर्जुनके सहस्रों बाणसमूहोंसे आहत एवं पीड़ित हो बाल खोले हुए पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ केचिदार्तस्वरं चक्रुर्विनेशुरपरे पुनः ॥ ४८ ॥ पार्थबाणहताः केचिन्निपेतुर्विगतासवः । कोई आर्तनाद करने लगे, कोई नष्ट हो गये, कोई अर्जुनके बाणोंसे मारे जाकर प्राणशून्य हो पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४८ १/२ ॥ तेषामुत्पतितान् कांश्चित् पतितांश्च पराङ्मुखान् ॥ ४९ ॥ न जघानार्जुनो योधान् योधव्रतमनुस्मरन् । उन योद्धाओंमेंसे जो लोग रथसे कूद पड़े थे या धरतीपर गिर गये थे अथवा युद्धसे विमुख होकर भाग चले थे, उन सबको एक वीर सैनिकके लिये निश्चित नियमका निरन्तर स्मरण रखते हुए अर्जुनने नहीं मारा ॥ ते विकीर्णरथाश्चित्राः प्रायशश्च पराङ्मुखाः ॥ ५० ॥ कुरवः कर्ण कर्णेति हाहेति च विचुक्रुशुः ।