महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 272, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंकौरव-सैनिकोंके रथ टूट-फूटकर बिखर गये। उनकी विचित्र अवस्था हो गयी। वे प्रायः युद्धसे विमुख हो गये और 'हा कर्ण, हा कर्ण' कहकर पुकारने लगे ।। ५० १/२ ।।
तमाधिरथिराक्रन्दं विज्ञाय शरणैषिणाम् ।। ५१ ।।
मा भैष्टेति प्रतिश्रुत्य ययावभिमुखोऽर्जुनम् ।
तब अधिरथपुत्र कर्णने उन शरणार्थी सैनिकोंकी करुण पुकार सुनकर 'डरो मत' इस प्रकार उन्हें आश्वासन देकर अर्जुनका सामना करनेके लिये प्रस्थान किया ।। ५१ १/२ ।।
स भारतरथश्रेष्ठः सर्वभारतहर्षणः ।। ५२ ।।
प्रादुश्चक्रे तदाग्नेयमस्त्रमस्त्रविदां वरः ।
उस समय अस्त्रवेत्ताओंमें श्रेष्ठ, भरतवंशियोंके श्रेष्ठ महारथी तथा सम्पूर्ण भारतीय सेनाका हर्ष बढ़ानेवाले कर्णने आग्नेयास्त्र प्रकट किया ।। ५२ १/२ ।।
तस्य दीप्तशरौघस्य दीप्तचापधरस्य च ।। ५३ ।।
शरौघाञ्छरजालेन विदुधाव धनंजयः ।
प्रज्वलित बाणसमूह तथा देदीप्यमान धनुष धारण करनेवाले कर्णके उन बाणसमूहोंको अर्जुनने अपने बाणोंके समुदायद्वारा छिन्न-भिन्न कर दिया ।। ५३ १/२ ।।
तथैवाधिरथिस्तस्य बाणाञ्ज्वलिततेजसः ।। ५४ ।।
अस्त्रमस्त्रेण संवार्य प्राणदद् विसृजञ्छरान् ।
उसी प्रकार अधिरथकुमार कर्णने भी प्रज्वलित तेजवाले अर्जुनके बाणोंका तथा उनके प्रत्येक अस्त्रका अपने अस्त्रोंद्वारा निवारण करके बाणोंकी वर्षा करते हुए बड़े जोरसे सिंहनाद किया ।। ५४ १/२ ।।
धृष्टद्युम्नश्च भीमश्च सात्यकिश्च महारथः ।। ५५ ।।
विव्यधुः कर्णमासाद्य त्रिभिस्त्रिभिरजिह्मगैः ।
इसी समय धृष्टद्युम्न, भीम तथा महारथी सात्यकिने भी कर्णके पास पहुँचकर उसे तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया ।। ५५ १/२ ।।
अर्जुनास्त्रं तु राधेयः संवार्य शरवृष्टिभिः ।। ५६ ।।
तेषां त्रयाणां चापानि चिच्छेद विशिखैस्त्रिभिः ।
तब राधानन्दन कर्णने अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा अर्जुनके बाणोंका निवारण करके अपने तीन बाणोंद्वारा धृष्टद्युम्न आदि तीनों वीरोंके धनुषोंको भी काट दिया ।। ५६ १/२ ।।
ते निकृत्तायुधाः शूरा निर्विषा भुजगा इव ।। ५७ ।।
रथशक्तीः समुत्क्षिप्य भृशं सिंहा इवानदन् ।
अपने धनुष कट जानेपर विषहीन भुजंगमोंके समान उन शूरवीरोंने रथ-शक्तियोंको ऊपर उठाकर सिंहोंके समान भयंकर गर्जना की ।। ५७ १/२ ।।
ता भुजाग्रैर्महावेगा निसृष्टा भुजगोपमाः ।। ५८ ।।