महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 2735, कुल 3237 में से
संदर्भ में पढ़ेंस विसृष्टो महाराज जगामाथ स्वमालयम् । प्रजाश्च मुदिता भूत्वा पुनस्तस्थुर्यथा पुरा ॥ ८३ ॥ महाराज! ऐसा कहकर प्रजापतिने उन्हें विदा कर दिया। चन्द्रमा अपने स्थानको चले गये और सारी प्रजा पूर्ववत् प्रसन्न रहने लगी ॥ ८३ ॥ एवं ते सर्वमाख्यातं यथा शप्तो निशाकरः । प्रभासं च यथा तीर्थं तीर्थानां प्रवरं महत् ॥ ८४ ॥ इस प्रकार चन्द्रमाको जैसे शाप प्राप्त हुआ था और महान् प्रभासतीर्थ जिस प्रकार सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ माना गया, वह सारा प्रसंग मैंने तुमसे कह सुनाया ॥ ८४ ॥ अमावास्यां महाराज नित्यशः शशलक्षणः । स्नात्वा ह्याप्यायते श्रीमान् प्रभासे तीर्थ उत्तमे ॥ ८५ ॥ महाराज! चन्द्रमा उत्तम प्रभासतीर्थमें प्रत्येक अमावास्याको स्नान करके कान्तिमान् एवं पुष्ट होते हैं ॥ अतश्चैतत् प्रजानन्ति प्रभासमिति भूमिप । प्रभां हि परमां लेभे तस्मिन्निमज्ज्य चन्द्रमाः ॥ ८६ ॥ भूमिपाल! इसीलिये सब लोग इसे प्रभासतीर्थके नामसे जानते हैं; क्योंकि उसमें गोता लगाकर चन्द्रमाने उत्कृष्ट प्रभा प्राप्त की थी ॥ ८६ ॥ ततस्तु चमसोद्भेदमच्युतस्त्वगमद् बली । चमसोद्भेद इत्येवं यं जनाः कथयन्त्युत ॥ ८७ ॥ तदनन्तर भगवान् बलराम चमसोद्भेद नामक तीर्थमें गये। उस तीर्थको सब लोग चमसोद्भेदके नामसे ही पुकारते हैं ॥ ८७ ॥ तत्र दत्त्वा च दानानि विशिष्टानि हलायुधः । उषित्वा रजनीमेकां स्नात्वा च विधिवत्तदा ॥ ८८ ॥ उदपानमथागच्छत्त्वरावान् केशवाग्रजः । आद्यं स्वस्त्ययनं चैव यत्रावाप्य महत् फलम् ॥ ८९ ॥ स्निग्धत्वादोषधीनां च भूमेश्च जनमेजय । जानन्ति सिद्धा राजेन्द्र नष्टामपि सरस्वतीम् ॥ ९० ॥ श्रीकृष्णके बड़े भाई हलधारी बलरामने वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके उत्तम दान दे एक रात रहकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँसे उदपानतीर्थको प्रस्थान किया, जो मंगलकारी आदि तीर्थ है। राजेन्द्र जनमेजय! उदपान वह तीर्थ है, जहाँ उपस्थित होनेमात्रसे महान् फलकी प्राप्ति होती है। सिद्ध पुरुष वहाँ ओषधियों (वृक्षों और लताओं)-की स्निग्धता और भूमिकी आर्द्रता देखकर अदृश्य हुई सरस्वतीको भी जान लेते हैं ॥ ८८—९० ॥