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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

स विसृष्टो महाराज जगामाथ स्वमालयम् । प्रजाश्च मुदिता भूत्वा पुनस्तस्थुर्यथा पुरा ॥ ८३ ॥ महाराज! ऐसा कहकर प्रजापतिने उन्हें विदा कर दिया। चन्द्रमा अपने स्थानको चले गये और सारी प्रजा पूर्ववत् प्रसन्न रहने लगी ॥ ८३ ॥ एवं ते सर्वमाख्यातं यथा शप्तो निशाकरः । प्रभासं च यथा तीर्थं तीर्थानां प्रवरं महत् ॥ ८४ ॥ इस प्रकार चन्द्रमाको जैसे शाप प्राप्त हुआ था और महान् प्रभासतीर्थ जिस प्रकार सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ माना गया, वह सारा प्रसंग मैंने तुमसे कह सुनाया ॥ ८४ ॥ अमावास्यां महाराज नित्यशः शशलक्षणः । स्नात्वा ह्याप्यायते श्रीमान् प्रभासे तीर्थ उत्तमे ॥ ८५ ॥ महाराज! चन्द्रमा उत्तम प्रभासतीर्थमें प्रत्येक अमावास्याको स्नान करके कान्तिमान् एवं पुष्ट होते हैं ॥ अतश्चैतत् प्रजानन्ति प्रभासमिति भूमिप । प्रभां हि परमां लेभे तस्मिन्निमज्ज्य चन्द्रमाः ॥ ८६ ॥ भूमिपाल! इसीलिये सब लोग इसे प्रभासतीर्थके नामसे जानते हैं; क्योंकि उसमें गोता लगाकर चन्द्रमाने उत्कृष्ट प्रभा प्राप्त की थी ॥ ८६ ॥ ततस्तु चमसोद्भेदमच्युतस्त्वगमद् बली । चमसोद्भेद इत्येवं यं जनाः कथयन्त्युत ॥ ८७ ॥ तदनन्तर भगवान् बलराम चमसोद्भेद नामक तीर्थमें गये। उस तीर्थको सब लोग चमसोद्भेदके नामसे ही पुकारते हैं ॥ ८७ ॥ तत्र दत्त्वा च दानानि विशिष्टानि हलायुधः । उषित्वा रजनीमेकां स्नात्वा च विधिवत्तदा ॥ ८८ ॥ उदपानमथागच्छत्त्वरावान् केशवाग्रजः । आद्यं स्वस्त्ययनं चैव यत्रावाप्य महत् फलम् ॥ ८९ ॥ स्निग्धत्वादोषधीनां च भूमेश्च जनमेजय । जानन्ति सिद्धा राजेन्द्र नष्टामपि सरस्वतीम् ॥ ९० ॥ श्रीकृष्णके बड़े भाई हलधारी बलरामने वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके उत्तम दान दे एक रात रहकर बड़ी उतावलीके साथ वहाँसे उदपानतीर्थको प्रस्थान किया, जो मंगलकारी आदि तीर्थ है। राजेन्द्र जनमेजय! उदपान वह तीर्थ है, जहाँ उपस्थित होनेमात्रसे महान् फलकी प्राप्ति होती है। सिद्ध पुरुष वहाँ ओषधियों (वृक्षों और लताओं)-की स्निग्धता और भूमिकी आर्द्रता देखकर अदृश्य हुई सरस्वतीको भी जान लेते हैं ॥ ८८—९० ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां प्रभासोत्पत्तिकथने पञ्चत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें प्रभासतीर्थका वर्णनविषयक पैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३५ ॥

उदपानतीर्थकी उत्पत्तिका तथा त्रित मुनिके कूपमें गिरने, वहाँ यज्ञ करने और अपने भाइयोंको शाप देनेकी कथा

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षट्त्रिंशोऽध्यायः

उदपानतीर्थकी उत्पत्तिका तथा त्रित मुनिके कूपमें गिरने, वहाँ यज्ञ करने और अपने भाइयोंको शाप देनेकी कथा

वैशम्पायन उवाच

तस्मान्नदीगतं चापि ह्युदपानं यशस्विनः ।
त्रितस्य च महाराज जगामाथ हलायुधः ॥ १ ॥
**वैशम्पायनजी कहते हैं—**महाराज! उस चमसोद्भेद-तीर्थसे चलकर बलरामजी यशस्वी त्रितमुनिके उदपान तीर्थमें गये, जो सरस्वती नदीके जलमें स्थित है ॥ १ ॥

तत्र दत्त्वा बहु द्रव्यं पूजयित्वा तथा द्विजान् ।
उपस्पृश्य च तत्रैव प्रहृष्टो मुसलायुधः ॥ २ ॥
मुसलधारी बलरामजीने वहाँ जलका स्पर्श, आचमन एवं स्नान करके बहुत-सा द्रव्य दान करनेके पश्चात् ब्राह्मणोंका पूजन किया। फिर वे बहुत प्रसन्न हुए ॥ २ ॥

तत्र धर्मपरो भूत्वा त्रितः स सुमहातपाः ।
कूपे च वसता तेन सोमः पीतो महात्मना ॥ ३ ॥
वहाँ महातपस्वी त्रितमुनि धर्मपरायण होकर रहते थे। उन महात्माने कुएँमें रहकर ही सोमपान किया था ॥

तत्र चैनं समुत्सृज्य भ्रातरौ जग्मतुर्गृहान् ।
ततस्तौ वै शशापाथ त्रितो ब्राह्मणसत्तमः ॥ ४ ॥
उनके दो भाई उस कुएँमें ही उन्हें छोड़कर घरको चले गये थे। इससे ब्राह्मणश्रेष्ठ त्रितने दोनोंको शाप दे दिया था ॥ ४ ॥

जनमेजय उवाच

उदपानं कथं ब्रह्मन् कथं च सुमहातपाः ।
पतितः किं च संत्यक्तो भ्रातृभ्यां द्विजसत्तम ॥ ५ ॥
कूपे कथं च हित्वाैनं भ्रातरौ जग्मतुर्गृहान् ।
कथं च याजयामास पपौ सोमं च वै कथम् ॥ ६ ॥
एतदाचक्ष्व मे ब्रह्मन् श्रोतव्यं यदि मन्यसे ।
**जनमेजयने पूछा—**ब्रह्मन्! उदपान तीर्थ कैसे हुआ? वे महातपस्वी त्रितमुनि उसमें कैसे गिर पड़े और द्विजश्रेष्ठ! उनके दोनों भाइयोंने उन्हें क्यों वहीं छोड़ दिया था? क्या कारण था, जिससे वे दोनों भाई उन्हें कुएँमें ही त्यागकर घर चले गये थे? वहाँ रहकर

उन्होंने यज्ञ और सोमपान कैसे किया? ब्रह्मन्! यदि यह प्रसंग मेरे सुननेयोग्य समझें तो अवश्य मुझे बतावें।। ५-६ १/२ ।।

वैशम्पायन उवाच

आसन् पूर्वयुगे राजन् मुनयो भ्रातरस्त्रयः ।। ७ ।।
एकतश्च द्वितश्चैव त्रितश्चादित्यसंनिभाः ।
सर्वे प्रजापतिसमाः प्रजावन्तस्तथैव च ।। ८ ।।
ब्रह्मलोकजितः सर्वे तपसा ब्रह्मवादिनः ।
वैशम्पायनजीने कहा— राजन्! पहले युगमें तीन सहोदर भाई रहते थे। वे तीनों ही मुनि थे। उनके नाम थे एकत, द्वित और त्रित। वे सभी महर्षि सूर्यके समान तेजस्वी, प्रजापतिके समान संतानवान् और ब्रह्मवादी थे। उन्होंने तपस्याद्वारा ब्रह्मलोकपर विजय प्राप्त की थी।। ७-८ १/२ ।।

तेषां तु तपसा प्रीतो नियमेन दमेन च ।। ९ ।।
अभवद् गौतमो नित्यं पिता धर्मरतः सदा ।
उनकी तपस्या, नियम और इन्द्रियनिग्रहसे उनके धर्म-परायण पिता गौतम सदा ही प्रसन्न रहा करते थे।। ९ १/२ ।।

स तु दीर्घेण कालेन तेषां प्रीतिमवाप्य च ।। १० ।।
जगाम भगवान् स्थानमनुरूपमिवात्मनः ।
उन पुत्रोंकी त्याग-तपस्यासे संतुष्ट रहते हुए वे पूजनीय महात्मा गौतम दीर्घकालके पश्चात् अपने अनुरूप स्थान (स्वर्गलोक)-में चले गये।। १० १/२ ।।

राजानस्तस्य ये ह्यासन् याज्या राजन् महात्मनः ।। ११ ।।
ते सर्वे स्वर्गते तस्मिंस्तस्य पुत्रानपूजयन् ।
राजन्! उन महात्मा गौतमके यजमान जो राजा लोग थे, वे सब उनके स्वर्गवासी हो जानेपर उनके पुत्रोंका ही आदर-सत्कार करने लगे।। ११ १/२ ।।

तेषां तु कर्मणा राजंस्तथा चाध्ययनेन च ।। १२ ।।
त्रितः स श्रेष्ठतां प्राप यथैवास्य पिता तथा ।
नरेश्वर! उन तीनोंमें भी अपने शुभ कर्म और स्वाध्यायके द्वारा महर्षि त्रितने सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया! जैसे उनके पिता सम्मानित थे, वैसे ही वे भी हो गये।। १२ १/२ ।।

तथा सर्वे महाभागा मुनयः पुण्यलक्षणाः ।। १३ ।।
अपूजयन् महाभागं यथास्य पितरं तथा ।
महान् सौभाग्यशाली और पुण्यात्मा सभी महर्षि भी महाभाग त्रितका उनके पिताके तुल्य ही सम्मान करते थे।।

कदाचिद्धि ततो राजन् भ्रातरावैकतद्वितौ ।। १४ ।।

यज्ञार्थं चक्रतुश्चिन्तां तथा वित्तार्थमेव च ।
तयोर्बुद्धिः समभवत् त्रितं गृह्य परंतप ॥ १५ ॥
याज्यान् सर्वानुपादाय प्रतिगृह्य पशूंस्ततः ।
सोमं पास्यामहे हृष्टाः प्राप्य यज्ञं महाफलम् ॥ १६ ॥
राजन्! एक दिनकी बात है, उनके दोनों भाई एकत और द्वित यज्ञ और धनके लिये चिन्ता करने लगे। शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि हमलोग त्रितको साथ लेकर यजमानोंका यज्ञ करावें और दक्षिणाके रूपमें बहुत-से पशु प्राप्त करके महान् फलदायक यज्ञका अनुष्ठान करें और उसीमें प्रसन्नतापूर्वक सोमरसका पान करें ॥ १४—१६ ॥

चक्रुश्चैवं तथा राजन् भ्रातरस्त्रय एव च ।
तथा ते तु परिक्रम्य याज्यान् सर्वान् पशून् प्रति ॥ १७ ॥
याजयित्वा ततो याज्याँल्लब्ध्वा तु सुबहून् पशून् ।
याज्येन कर्मणा तेन प्रतिगृह्य विधानतः ॥ १८ ॥
प्राचीं दिशं महात्मान आजग्मुस्ते महर्षयः ।
राजन्! ऐसा विचार करके उन तीनों भाइयोंने वही किया। वे सभी यजमानोंके यहाँ पशुओंकी प्राप्तिके उद्देश्यसे गये और उनसे विधिपूर्वक यज्ञ करवाकर उस याज्यकर्मके द्वारा उन्होंने बहुतेरे पशु प्राप्त कर लिये। तत्पश्चात् वे महात्मा महर्षि पूर्वदिशाकी ओर चल दिये ॥ १७-१८ १/२ ॥

त्रितस्तेषां महाराज पुरस्ताद् याति हृष्टवत् ॥ १९ ॥
एकतश्च द्वितश्चैव पृष्ठतः कालयन् पशून् ।
महाराज! उनमें त्रित मुनि तो प्रसन्नतापूर्वक आगे-आगे चलते थे और एकत तथा द्वित पीछे रहकर पशुओंको हाँकते जाते थे ॥ १९ १/२ ॥

तयोश्चिन्ता समभवद् दृष्ट्वा पशुगणं महत् ॥ २० ॥
कथं च स्युरिमा गाव आवाभ्यां हि विना त्रितम् ।
पशुओंके उस महान् समुदायको देखकर एकत और द्वितके मनमें यह चिन्ता समायी कि किस उपायसे ये गौएँ त्रितको न मिलकर हम दोनोंके ही पास रह जायँ ॥ २० १/२ ॥

तावन्योन्यं समाभाष्य एकतश्च द्वितश्च ह ॥ २१ ॥
यदूचतुर्मिथः पापौ तन्निबोध जनेश्वर ।
जनेश्वर! उन एकत और द्वित—दोनों पापियोंने एक-दूसरेसे सलाह करके परस्पर जो कुछ कहा, वह बताता हूँ, सुनो ॥ २१ १/२ ॥

त्रितो यज्ञेषु कुशलस्त्रितो वेदेषु निष्ठितः ॥ २२ ॥
अन्यास्तु बहुला गावस्त्रितः समुपलप्स्यते ।
तदावां सहितौ भूत्वा गाः प्रकाल्य व्रजावहे ॥ २३ ॥

त्रितोऽपि गच्छतां काममावाभ्यां वै विना कृतः । ‘त्रित यज्ञ करानेमें कुशल हैं, त्रित वेदोंके परिनिष्ठित विद्वान् हैं, अतः वे और बहुत-सी गौएँ प्राप्त कर लेंगे। इस समय हम दोनों एक साथ होकर इन गौओंको हाँक ले चलें और त्रित हमसे अलग होकर जहाँ इच्छा हो वहाँ चले जायँ’ ॥ २२-२३ १/२ ॥

तेषामागच्छतां रात्रौ पथिस्थानां वृकोऽभवत् ॥ २४ ॥ तत्र कूपोऽविदूरेऽभूत् सरस्वत्यास्तटे महान् । रात्रिका समय था और वे तीनों भाई रास्ता पकड़े चले आ रहे थे। उनके मार्गमें एक भेड़िया खड़ा था। वहाँ पास ही सरस्वतीके तटपर एक बहुत बड़ा कुआँ था ॥

अथ त्रितो वृकं दृष्ट्वा पथि तिष्ठन्तमग्रतः ॥ २५ ॥ तद्भयादपसर्पन् वै तस्मिन् कूपे पपात ह । अगाधे सुमहाघोरे सर्वभूतभयंकरे ॥ २६ ॥ त्रित अपने आगे रास्तेमें खड़े हुए भेड़ियेको देखकर उसके भयसे भागने लगे। भागते-भागते वे समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर उस महाघोर अगाध कूपमें गिर पड़े ॥ २५-२६ ॥

त्रितस्ततो महाराज कूपस्थो मुनिसत्तमः । आर्तनादं ततश्चक्रे तौ तु शुश्रुवतुर्मुनी ॥ २७ ॥ महाराज! कुएँमें पहुँचनेपर मुनिश्रेष्ठ त्रितने बड़े जोरसे आर्तनाद किया, जिसे उन दोनों मुनियोंने सुना ॥ २७ ॥

तं ज्ञात्वा पतितं कूपे भ्रातरावेकतद्वितौ । वृकत्रासाच्च लोभाच्च समुत्सृज्य प्रजग्मतुः ॥ २८ ॥ अपने भाईको कुएँमें गिरा हुआ जानकर भी दोनों भाई एकत और द्वित भेड़ियेके भय और लोभसे उन्हें वहीं छोड़कर चल दिये ॥ २८ ॥

भ्रातृभ्यां पशुलुब्धाभ्यामुत्सृष्टः स महातपाः । उदपाने तदा राजन् निर्जले पांसुसंवृते ॥ २९ ॥ राजन्! पशुओंके लोभमें आकर उन दोनों भाइयोंने उस समय उन महातपस्वी त्रितको धूलिसे भरे हुए उस निर्जल कूपमें ही छोड़ दिया ॥ २९ ॥

त्रित आत्मानमालक्ष्य कूपे वीरुत्तृणावृते । निमग्नं भरतश्रेष्ठ नरके दुष्कृती यथा ॥ ३० ॥ स बुद्ध्यागणयत् प्राज्ञो मृत्योर्भीतो ह्यसोमपः । सोमः कथं तु पातव्य इहस्थेन मया भवेत् ॥ ३१ ॥ भरतश्रेष्ठ! जैसे पापी मनुष्य अपने-आपको नरकमें डूबा हुआ देखता है, उसी प्रकार तृण, वीरुध और लताओंसे व्याप्त हुए उस कुएँमें अपने-आपको गिरा देख मृत्युसे डरे और सोमपानसे वंचित हुए विद्वान् त्रित अपनी बुद्धिसे सोचने लगे कि ‘मैं इस कुएँमें रहकर कैसे सोमरसका पान कर सकता हूँ?’ ॥ ३०-३१ ॥

स एवमभिनिश्चित्य तस्मिन् कूपे महातपाः । ददर्श वीरुधं तत्र लम्बमानां यदृच्छया ॥ ३२ ॥ इस प्रकार विचार करते-करते महातपस्वी त्रितने उस कुएँमें एक लता देखी, जो दैवयोगसे वहाँ फैली हुई थी ॥ ३२ ॥ पांसुग्रस्ते ततः कूपे विचिन्त्य सलिलं मुनिः । अग्नीन् संकल्पयामास होतॄनात्मानमेव च ॥ ३३ ॥ मुनिने उस बालूभरे कूपमें जलकी भावना करके उसीमें संकल्पद्वारा अग्निकी स्थापना की और होता आदिके स्थानपर अपने-आपको ही प्रतिष्ठित किया ॥ ३३ ॥ ततस्तां वीरुधं सोमं संकल्प्य सुमहातपाः । ऋचो यजूंषि सामानि मनसा चिन्तयन् मुनिः ॥ ३४ ॥ ग्रावाणः शर्कराः कृत्वा प्रचक्रेऽभिषवं नृप । आज्यं च सलिलं चक्रे भागांश्च त्रिदिवौकसाम् ॥ ३५ ॥ सोमस्याभिषवं कृत्वा चकार विपुलं ध्वनिम् । तत्पश्चात् उन महातपस्वी त्रितने उस फैली हुई लतामें सोमकी भावना करके मन-ही-मन ऋग्, यजु और सामका चिन्तन किया। नरेश्वर! इसके बाद कंकड़ या बालू-कणोंमें सिल और लोढ़ेकी भावना करके उसपर पीसकर लतासे सोमरस निकाला। फिर जलमें घीका संकल्प करके उन्होंने देवताओंके भाग नियत किये और सोमरस तैयार करके उसकी आहुति देते हुए वेद-मन्त्रोंकी गम्भीर ध्वनि की ॥ ३४-३५ १/२ ॥ स चाविशद् दिवं राजन् पुनः शब्दस्त्रितस्य वै ॥ ३६ ॥ समवाप्य च तं यज्ञं यथोक्तं ब्रह्मवादिभिः । राजन्! ब्रह्मवादियोंने जैसा बताया है, उसके अनुसार ही उस यज्ञका सम्पादन करके की हुई त्रितकी वह वेदध्वनि स्वर्गलोकतक गूँज उठी ॥ ३६ १/२ ॥ वर्तमाने महायज्ञे त्रितस्य सुमहात्मनः ॥ ३७ ॥ आविग्नं त्रिदिवं सर्वं कारणं च न बुद्ध्यते । महात्मा त्रितका वह महान् यज्ञ जब चालू हुआ, उस समय सारा स्वर्गलोक उद्विग्न हो उठा, परंतु किसीको इसका कोई कारण नहीं जान पड़ा ॥ ३७ १/२ ॥ ततः सुतुमुलं शब्दं शुश्रावाथ बृहस्पतिः ॥ ३८ ॥ श्रुत्वा चैवाब्रवीत् सर्वान् देवान् देवपुरोहितः । त्रितस्य वर्तते यज्ञस्तत्र गच्छामहे सुराः ॥ ३९ ॥ तब देवपुरोहित बृहस्पतिजीने वेदमन्त्रोंके उस तुमुलनादको सुनकर देवताओंसे कहा—‘देवगण! त्रित मुनिका यज्ञ हो रहा है, वहाँ हमलोगोंको चलना चाहिये ॥ स हि क्रुद्धः सृजेदन्यान् देवानपि महातपाः ।

‘वे महान् तपस्वी हैं। यदि हम नहीं चलेंगे तो वे कुपित होकर दूसरे देवताओंकी सृष्टि कर लेंगे’ ।। तच्छ्रुत्वा वचनं तस्य सहिताः सर्वदेवताः ।। ४० ।। प्रययुस्तत्र यत्रासौ त्रितयज्ञः प्रवर्तते । बृहस्पतिजीका यह वचन सुनकर सब देवता एक साथ हो उस स्थानपर गये, जहाँ त्रितमुनिका यज्ञ हो रहा था ।। ते तत्र गत्वा विबुधास्तं कूपं यत्र स त्रितः ।। ४१ ।। ददृशुस्तं महात्मानं दीक्षितं यज्ञकर्मसु । दृष्ट्वा चैनं महात्मानं श्रिया परमया युतम् ।। ४२ ।। ऊचुश्चैनं महाभागं प्राप्ता भागार्थिनो वयम् । वहाँ पहुँचकर देवताओंने उस कूपको देखा, जिसमें त्रित मौजूद थे। साथ ही उन्होंने यज्ञमें दीक्षित हुए महात्मा त्रितमुनिका भी दर्शन किया। वे बड़े तेजस्वी दिखायी दे रहे थे। उन महाभाग मुनिका दर्शन करके देवताओंने उनसे कहा—‘हमलोग यज्ञमें अपना भाग लेनेके लिये आये हैं’ ।। ४१-४२ १/२ ।। अथाब्रवीदृषिर्देवान् पश्यध्वं मा दिवौकसः ।। ४३ ।। अस्मिन् प्रतिभये कूपे निमग्नं नष्टचेतसम् । उस समय महर्षिने उनसे कहा—‘देवताओ! देखो, मैं किस दशामें पड़ा हूँ। इस भयानक कूपमें गिरकर अपनी सुध-बुध खो बैठा हूँ’ ।। ४३ १/२ ।। ततस्त्रितो महाराज भागांस्तेषां यथाविधि ।। ४४ ।। मन्त्रयुक्तान् समददत् ते च प्रीतास्तदाभवन् । महाराज! तदनन्तर त्रितने देवताओंको विधिपूर्वक मन्त्रोच्चारण करते हुए उनके भाग समर्पित किये। इससे वे उस समय बड़े प्रसन्न हुए ।। ४४ १/२ ।। ततो यथाविधि प्राप्तान् भागान् प्राप्य दिवौकसः ।। ४५ ।। प्रीतात्मानो ददुस्तस्मै वरान् यान् मनसेच्छति । विधिपूर्वक प्राप्त हुए उन भागोंको ग्रहण करके प्रसन्नचित्त हुए देवताओंने उन्हें मनोवांछित वर प्रदान किया ।। ४५ १/२ ।। स तु वव्रे वरं देवांस्त्रातुमर्हथ मामितः ।। ४६ ।। यश्चैहोपस्पृशेत् कूपे स सोमपगतिं लभेत् । मुनिने देवताओंसे वर माँगते हुए कहा—‘मुझे इस कूपसे आपलोग बचावें तथा जो मनुष्य इसमें आचमन करे, उसे यज्ञमें सोमपान करनेवालोंकी गति प्राप्त हो’ ।। ४६ १/२ ।। तत्र चोर्मिमती राजन्नुत्पपात सरस्वती ।। ४७ ।। तयोत्क्षिप्तः समुत्तस्थौ पूजयंस्त्रिदिवौकसः ।

राजन्! मुनिके इतना कहते ही कुएँमें तरंगमालाओंसे सुशोभित सरस्वती लहरा उठी। उसने अपने जलके वेगसे मुनिको ऊपर उठा दिया और वे बाहर निकल आये। फिर उन्होंने देवताओंका पूजन किया ।। ४७ १/२ ।।

तथेति चोक्त्वा विबुधा जग्मू राजन् यथागताः ।। ४८ ।।
त्रितश्चाभ्यागमत् प्रीतः स्वमेव निलयं तदा ।
नरेश्वर! मुनिके माँगे हुए वरके विषयमें ‘तथास्तु’ कहकर सब देवता जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। फिर त्रित भी प्रसन्नतापूर्वक अपने घरको ही लौट गये ।। ४८ १/२ ।।

क्रुद्धस्तु स समासाद्य तावृषी भ्रातरौ तदा ।। ४९ ।।
उवाच परुषं वाक्यं शशाप च महातपाः ।
पशुलुब्धौ युवां यस्मान्मामुत्सृज्य प्रधावितौ ।। ५० ।।
तस्माद् वृकाकृती रौद्रौ दंष्ट्रिणावभितश्चरौ ।
भवितारौ मया शप्तौ पापेनानेन कर्मणा ।। ५१ ।।
प्रसवश्चैव युवयोर्गोलाङ्गूलर्क्षवानराः ।
उन महातपस्वीने कुपित हो अपने उन दोनों ऋषि भाइयोंके पास पहुँचकर कठोर वाणीमें शाप देते हुए कहा—‘तुम दोनों पशुओंके लोभमें फँसकर मुझे छोड़कर भाग आये। इसलिये इसी पापकर्मके कारण मेरे शापसे तुम दोनों भाई महाभयंकर भेड़ियेका शरीर धारण करके दाँढ़ोंसे युक्त हो इधर-उधर भटकते फिरोगे। तुम दोनोंकी संतानके रूपमें गोलांगूल, रीछ और वानर आदि पशुओंकी उत्पत्ति होगी’ ।। ४९—५१ १/२ ।।

इत्युक्तेन तदा तेन क्षणादेव विशाम्पते ।। ५२ ।।
तथाभूतावदृश्येतां वचनात् सत्यवादिनः ।
प्रजानाथ! उनके इतना कहते ही वे दोनों भाई उस सत्यवादीके वचनसे उसी क्षण भेड़ियेकी शक्लमें दिखायी देने लगे ।। ५२ १/२ ।।

तत्राप्यमितविक्रान्तः स्पृष्ट्वा तोयं हलायुधः ।। ५३ ।।
दत्त्वा च विविधान् दायान् पूजयित्वा च वै द्विजान् ।
अमित पराक्रमी बलरामजीने उस तीर्थमें भी जलका स्पर्श किया और ब्राह्मणोंकी पूजा करके उन्हें नाना प्रकारके धन प्रदान किये ।। ५३ १/२ ।।

उदपानं च तं वीक्ष्य प्रशस्य च पुनः पुनः ।। ५४ ।।
नदीगतमदीनात्मा प्राप्तो विनशनं तदा ।। ५५ ।।
उदार चित्तवाले बलरामजी सरस्वती नदीके अन्तर्गत उदपानतीर्थका दर्शन करके उसकी बारंबार स्तुति-प्रशंसा करते हुए वहाँसे विनशनतीर्थमें चले गये ।।

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां त्रिताख्याने षट्त्रिंशोऽध्यायः ।। ३६ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें त्रितका उपाख्यानविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ३६ ।।

अध्याय (पृष्ठ 2745)

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सप्तत्रिंशोऽध्यायः

विनशन, सुभूमिक, गन्धर्व, गर्गस्रोत, शंख, द्वैतवन तथा नैमिषेय आदि तीर्थोंमें होते हुए बलभद्रजीका सप्त सारस्वततीर्थमें प्रवेश

वैशम्पायन उवाच

ततो विनशनं राजन् जगामाथ हलायुधः ।
शूद्राभीरान् प्रति द्वेषाद् यत्र नष्टा सरस्वती ॥ १ ॥
तस्मात् तु ऋषयो नित्यं प्राहुर्विनशनेति च ।
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उदपानतीर्थसे चलकर हलधारी बलराम विनशनतीर्थमें आये, जहाँ (दुष्कर्मपरायण) शूद्रों और आभीरोंके प्रति द्वेष होनेसे सरस्वती नदी विनष्ट (अदृश्य) हो गयी है। इसीलिये ऋषिगण उसे सदा विनशनतीर्थ कहते हैं ॥ १ १/२ ॥

तत्राप्युपस्पृश्य बलः सरस्वत्यां महाबलः ॥ २ ॥
सुभूमिकं ततोऽगच्छत् सरस्वत्यास्तटे वरे ।
महाबली बलराम वहाँ भी सरस्वतीमें आचमन और स्नान करके उसके सुन्दर तटपर स्थित हुए 'सुभूमिक' तीर्थमें गये ॥ २ १/२ ॥

तत्र चाप्सरसः शुभ्रा नित्यकालमतन्द्रिताः ॥ ३ ॥
क्रीडाभिर्विमलाभिश्च क्रीडन्ति विमलाननाः ।
उस तीर्थमें गौरवर्ण तथा निर्मल मुखवाली सुन्दरी अप्सराएँ आलस्य त्यागकर सदा नाना प्रकारकी विमल क्रीडाओंद्वारा मनोरंजन करती हैं ॥ ३ १/२ ॥

तत्र देवाः सगन्धर्वा मासि मासि जनेश्वर ॥ ४ ॥
अभिगच्छन्ति तत् तीर्थं पुण्यं ब्राह्मणसेवितम् ।
जनेश्वर! वहाँ उस ब्राह्मणसेवित पुण्यतीर्थमें गन्धर्वोंसहित देवता भी प्रतिमास आया करते हैं ॥ ४ १/२ ॥

तत्रादृश्यन्त गन्धर्वास्तथैवाप्सरसां गणाः ॥ ५ ॥
समेत्य सहिता राजन् यथाप्राप्तं यथासुखम् ।
राजन्! गन्धर्वगण और अप्सराएँ एक साथ मिलकर वहाँ आती और सुखपूर्वक विचरण करती दिखायी देती हैं ॥ ५ १/२ ॥

तत्र मोदन्ति देवाश्च पितरश्च सवीरुधः ॥ ६ ॥

पुण्यैः पुष्पैः सदा दिव्यैः कीर्यमाणाः पुनः पुनः । वहाँ देवता और पितर लता-वेलोंके साथ आमोदित होते हैं, उनके ऊपर सदा पवित्र एवं दिव्य पुष्पोंकी वर्षा बारंबार होती रहती है ॥ ६ १/२ ॥ आक्रीडभूमिः सा राजंस्तासामप्सरसां शुभा ॥ ७ ॥ सुभूमिकेति विख्याता सरस्वत्यास्तटे वरे । राजन्! सरस्वतीके सुन्दर तटपर वह उन अप्सराओंकी मंगलमयी क्रीडाभूमि है, इसलिये वह स्थान सुभूमिक नामसे विख्यात है ॥ ७ १/२ ॥ तत्र स्नात्वा च दत्त्वा च वसु विप्राय माधवः ॥ ८ ॥ श्रुत्वा गीतं च तद् दिव्यं वादित्राणां च निःस्वनम् । छायाश्च विपुला दृष्ट्वा देवगन्धर्वरक्षसाम् ॥ ९ ॥ गन्धर्वाणां ततस्तीर्थमागच्छद् रोहिणीसुतः । बलरामजीने वहाँ स्नान करके ब्राह्मणोंको धन दान किया और दिव्य गीत एवं दिव्य वाद्योंकी ध्वनि सुनकर देवताओं, गन्धर्वों तथा राक्षसोंकी बहुत-सी मूर्तियोंका दर्शन किया। तत्पश्चात् रोहिणीनन्दन बलराम गन्धर्वतीर्थमें गये ॥ ८-९ १/२ ॥ विश्वावसुमुखास्तत्र गन्धर्वास्तपसान्विताः ॥ १० ॥ नृत्यवादित्रगीतं च कुर्वन्ति सुमनोरमम् । वहाँ तपस्यामें लगे हुए विश्वावसु आदि गन्धर्व अत्यन्त मनोरम नृत्य, वाद्य और गीतका आयोजन करते रहते हैं ॥ १० १/२ ॥ तत्र दत्त्वा हलधरो विप्रेभ्यो विविधं वसु ॥ ११ ॥ अजाविकं गोखरोष्ट्रं सुवर्णं रजतं तथा । भोजयित्वा द्विजान् कामैः संतर्प्य च महाधनैः ॥ १२ ॥ प्रययौ सहितो विप्रैः स्तूयमानश्च माधवः । हलधरने वहाँ भी ब्राह्मणोंको भेड़, बकरी, गाय, गदहा, ऊँट और सोना-चाँदी आदि नाना प्रकारके धन देकर उन्हें इच्छानुसार भोजन कराया तथा प्रचुर धनसे संतुष्ट करके ब्राह्मणोंके साथ ही वहाँसे प्रस्थान किया। उस समय ब्राह्मण लोग बलरामजीकी बड़ी स्तुति करते थे ॥ ११-१२ १/२ ॥ तस्माद् गन्धर्वतीर्थाच्च महाबाहुररिंदमः ॥ १३ ॥ गर्गस्रोतो महातीर्थमाजगामैककुण्डली । उस गन्धर्वतीर्थसे चलकर एक कानमें कुण्डल धारण करनेवाले शत्रुदमन महाबाहु बलराम गर्गस्रोत नामक महातीर्थमें आये ॥ १३ १/२ ॥ तत्र गर्गेण वृद्धेन तपसा भावितात्मना ॥ १४ ॥ कालज्ञानगतिश्चैव ज्योतिषां च व्यतिक्रमः ।

उत्पाता दारुणाश्चैव शुभाश्च जनमेजय ।। १५ ।।
सरस्वत्याः शुभे तीर्थे विदिता वै महात्मना।
तस्य नाम्ना च तत् तीर्थं गर्गस्रोत इति स्मृतम् ।। १६ ।।
जनमेजय! वहाँ तपस्यासे पवित्र अन्तःकरणवाले महात्मा वृद्ध गर्गने सरस्वतीके उस शुभ तीर्थमें कालका ज्ञान, कालकी गति, ग्रहों और नक्षत्रोंके उलट-फेर, दारुण उत्पात तथा शुभ लक्षण—इन सभी बातोंकी जानकारी प्राप्त कर ली थी। उन्हींके नामसे वह तीर्थ गर्गस्रोत कहलाता है ।। १४—१६ ।।

तत्र गर्गं महाभागमृषयः सुव्रता नृप ।
उपासांचक्रिरे नित्यं कालज्ञानं प्रति प्रभो ।। १७ ।।
सामर्थ्यशाली नरेश्वर! वहाँ उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ऋषियोंने कालज्ञानके लिये सदा महाभाग गर्गमुनिकी उपासना (सेवा) की थी ।। १७ ।।

तत्र गत्वा महाराज बलः श्वेतानुलेपनः ।
विधिवद्धि धनं दत्त्वा मुनीनां भावितात्मनाम् ।। १८ ।।
उच्चावचांस्तथा भक्ष्यान् विप्रेभ्यो विप्रदाय सः ।
नीलवासास्तदागच्छच्छङ्खतीर्थं महायशाः ।। १९ ।।
महाराज! वहाँ जाकर श्वेतचन्दनचर्चित, नीलाम्बरधारी महायशस्वी बलरामजी विशुद्ध अन्त करणवाले महर्षियोंको विधिपूर्वक धन देकर ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ समर्पित करके वहाँसे शंखतीर्थमें चले गये ।। १८-१९ ।।

तत्रापश्यन्महाशङ्खं महामेरुमिवोच्छ्रितम् ।
श्वेतपर्वतसंकाशमृषिसंघैर्निषेवितम् ।। २० ।।
सरस्वत्यास्तटे जातं नगं तालध्वजो बली ।
वहाँ तालचिह्नित ध्वजावाले बलवान् बलरामने महाशंख नामक एक वृक्ष देखा, जो महान् मेरुपर्वतके समान ऊँचा और श्वेताचलके समान उज्ज्वल था। उसके नीचे ऋषियोंके समूह निवास करते थे। वह वृक्ष सरस्वतीके तटपर ही उत्पन्न हुआ था ।। २० १/२ ।।

यक्षा विद्याधराश्चैव राक्षसाश्चामितौजसः ।। २१ ।।
पिशाचाश्चामितबला यत्र सिद्धाः सहस्रशः ।
उस वृक्षके आस-पास यक्ष, विद्याधर, अमित तेजस्वी राक्षस, अनन्त बलशाली पिशाच तथा सिद्धगण सहस्रोंकी संख्यामें निवास करते थे ।। २१ १/२ ।।

ते सर्वे ह्यशनं त्यक्त्वा फलं तस्य वनस्पतेः ।। २२ ।।
व्रतैश्च नियमैश्चैव काले काले स्म भुञ्जते ।
वे सब-के-सब अन्न छोड़कर व्रत और नियमोंका पालन करते हुए समय-समयपर उस वृक्षका ही फल खाया करते थे ।। २२ १/२ ।।

प्राप्तैश्च नियमैस्तैस्तैर्विचरन्तः पृथक् पृथक् ।। २३ ।।

अदृश्यमाना मनुजैर्व्यचरन् पुरुषर्षभ । एवं ख्यातो नरव्याघ्र लोकेऽस्मिन् स वनस्पतिः ॥ २४ ॥ पुरुषश्रेष्ठ! वे उन स्वीकृत नियमोंके अनुसार पृथक्-पृथक् विचरते हुए मनुष्योंसे अदृश्य रहकर घूमते थे। नरव्याघ्र! इस प्रकार वह वनस्पति इस विश्वमें विख्यात था ॥ २३-२४ ॥ ततस्तीर्थं सरस्वत्याः पावनं लोकविश्रुतम् । तस्मिंश्च यदुशार्दूलो दत्त्वा तीर्थे पयस्विनीः ॥ २५ ॥ ताम्रायसानि भाण्डानि वस्त्राणि विविधानि च । पूजयित्वा द्विजांश्चैव पूजितश्च तपोधनैः ॥ २६ ॥ वह वृक्ष सरस्वतीका लोकविख्यात पावन तीर्थ है। यदुश्रेष्ठ बलराम उस तीर्थमें दूध देनेवाली गौओंका दान करके ताँबे और लोहेके बर्तन तथा नाना प्रकारके वस्त्र भी ब्राह्मणोंको दिये। ब्राह्मणोंका पूजन करके वे स्वयं भी तपस्वी मुनियोंद्वारा पूजित हुए ॥ २५-२६ ॥ पुण्यं द्वैतवनं राजन्नाजगाम हलायुधः । तत्र गत्वा मुनीन् दृष्ट्वा नानावेषधरान् बलः ॥ २७ ॥ आप्लुत्य सलिले चापि पूजयामास वै द्विजान् । राजन्! वहाँसे हलधर बलभद्रजी पवित्र द्वैतवनमें आये और वहाँके नाना वेशधारी मुनियोंका दर्शन करके जलमें गोता लगाकर उन्होंने ब्राह्मणोंका पूजन किया ॥ तथैव दत्त्वा विप्रेभ्यः परिभोगान् सुपुष्कलान् ॥ २८ ॥ ततः प्रायाद् बलो राजन् दक्षिणेन सरस्वतीम् । राजन्! इसी प्रकार विप्रवृन्दको प्रचुर भोगसामग्री अर्पित करके फिर बलरामजी सरस्वतीके दक्षिण तटपर होकर यात्रा करने लगे ॥ २८ ½ ॥ गत्वा चैवं महाबाहुर्नातिदूरे महायशाः ॥ २९ ॥ धर्मात्मा नागधन्वानं तीर्थमागमदच्युतः । यत्र पन्नगराजस्य वासुकेः संनिवेशनम् ॥ ३० ॥ महाद्युतेर्महाराज बहुभिः पन्नगैर्वृतम् । ऋषीणां हि सहस्राणि तत्र नित्यं चतुर्दश ॥ ३१ ॥ महाराज! इस प्रकार थोड़ी ही दूर जाकर महाबाहु, महायशस्वी धर्मात्मा भगवान् बलराम नागधन्वा नामक तीर्थमें पहुँच गये, जहाँ महातेजस्वी नागराज वासुकिका बहुसंख्यक सर्पोंसे घिरा हुआ निवासस्थान है। वहाँ सदा चौदह हजार ऋषि निवास करते हैं ॥ २९—३१ ॥ यत्र देवाः समागम्य वासुकिं पन्नगोत्तमम् । सर्वपन्नगराजनमभ्यषिञ्चन् यथाविधि ॥ ३२ ॥

वहीं देवताओंने आकर सर्पोंमें श्रेष्ठ वासुकिको समस्त सर्पोंके राजाके पदपर विधिपूर्वक अभिषिक्त किया था ॥ ३२ ॥ पन्नगेभ्यो भयं तत्र विद्यते न स्म पौरव ।
तत्रापि विधिवद् दत्त्वा विप्रेभ्यो रत्नसंचयान् ॥ ३३ ॥
प्रायात् प्राचीं दिशं तत्र तत्र तीर्थान्यनेकGeneric: । -> प्रायात् प्राचीं दिशं तत्र तत्र तीर्थान्यनेकशः ।
सहस्रशतसंख्यानि प्रथितानि पदे पदे ॥ ३४ ॥
पौरव! वहाँ किसीको सर्पोंसे भय नहीं होता। उस तीर्थमें भी बलरामजी ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक ढेर-के-ढेर रत्न देकर पूर्वदिशाकी ओर चल दिये, जहाँ पग-पगपर अनेक प्रकारके प्रसिद्ध तीर्थ प्रकट हुए हैं। उनकी संख्या लगभग एक लाख है ॥ ३३-३४ ॥
आप्लुत्य तत्र तीर्थेषु यथोक्तं तत्र चर्षिभिः ।
कृत्वोपवासनियमं दत्त्वा दानानि सर्वशः ॥ ३५ ॥
अभिवाद्य मुनींस्तान् वै तत्र तीर्थनिवासिनः ।
उद्दिष्टमार्गः प्रययौ यत्र भूयः सरस्वती ॥ ३६ ॥
प्राङ्मुखं वै निवृते वृष्टिर्वातहता यथा ।
उन तीर्थोंमें स्नान करके उन्होंने ऋषियोंके बताये अनुसार व्रत-उपवास आदि नियमोंका पालन किया। फिर सब प्रकारके दान करके तीर्थनिवासी मुनियोंको मस्तक नवाकर उनके बताये हुए मार्गसे वे पुनः उस स्थानकी ओर चल दिये, जहाँ सरस्वती हवाकी मारी हुई वर्षाके समान पुनः पूर्वदिशाकी ओर लौट पड़ी हैं ॥
ऋषीणां नैमिषेयाणामवेक्षार्थं महात्मनाम् ॥ ३७ ॥
निवृत्तां तां सरिच्छ्रेष्ठां तत्र दृष्ट्वा तु लाङ्गली ।
बभूव विस्मितो राजन् बलः श्वेतानुलेपनः ॥ ३८ ॥
राजन्! नैमिषारण्यनिवासी महात्मा मुनियोंके दर्शनके लिये पूर्वदिशाकी ओर लौटी हुई सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीका दर्शन करके श्वेत-चन्दनचर्चित हलधारी बलराम आश्चर्यचकित हो उठे ॥ ३७-३८ ॥

जनमेजय उवाच

कस्मात् सरस्वती ब्रह्मन् निवृत्ता प्राङ्मुखीभवत् ।
व्याख्यातमेतदिच्छामि सर्वमध्वर्युसत्तम ॥ ३९ ॥
कस्मिंश्चित् कारणे तत्र विस्मितो यदुनन्दनः ।
निवृत्ता हेतुना केन कथमेव सरिद्वरा ॥ ४० ॥
जनमेजयने पूछा—यजुर्वेदके ज्ञाताओंमें श्रेष्ठ विप्रवर! मैं आपके मुँहसे यह सुनना चाहता हूँ कि सरस्वती नदी किस कारणसे पीछे लौटकर पूर्वाभिमुख बहने लगी? क्या

कारण था कि वहाँ यदुनन्दन बलरामजीको भी आश्चर्य हुआ? सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती किस कारणसे और किस प्रकार पूर्वदिशाकी ओर लौटी थीं? ।।

वैशम्पायन उवाच

पूर्वं कृतयुगे राजन् नैमिषेयास्तपस्विनः ।
वर्तमाने सुविपुले सत्रे द्वादशवार्षिके ॥ ४१ ॥
ऋषयो बहवो राजंस्तत् सत्रमभिप्रेदिरे ।
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! पूर्वकालके सत्ययुगकी बात है वहाँ बारह वर्षोंमें पूर्ण होनेवाले एक महान् यज्ञका अनुष्ठान आरम्भ किया गया था। उस सत्रमें नैमिषारण्यनिवासी तपस्वी मुनि तथा अन्य बहुतसे ऋषि पधारे थे ॥ ४१ १/२ ॥

उषित्वा च महाभागास्तस्मिन् सत्रे यथाविधि ॥ ४२ ॥
निवृत्ते नैमिषेये वै सत्रे द्वादशवार्षिके ।
आजग्मुर्ऋषयस्तत्र बहवस्तीर्थकारणात् ॥ ४३ ॥
नैमिषारण्यवासियोंके उस द्वादशवर्षीय यज्ञमें वे महाभाग ऋषि दीर्घकालतक रहे। जब वह यज्ञ समाप्त हो गया तब बहुत-से महर्षि तीर्थसेवनके लिये वहाँ आये ॥

ऋषीणां बहुलत्वात्तु सरस्वत्या विशाम्पते ।
तीर्थानि नगरायन्ते कूले वै दक्षिणे तदा ॥ ४४ ॥
प्रजानाथ! ऋषियोंकी संख्या अधिक होनेके कारण सरस्वतीके दक्षिण तटपर जितने तीर्थ थे, वे सभी नगरोंके समान प्रतीत होने लगे ॥ ४४ ॥

समन्तपञ्चकं यावत्तावत्ते द्विजसत्तमाः ।
तीर्थलोभान्ररव्याघ्र नद्यास्तीरं समाश्रिताः ॥ ४५ ॥
पुरुषसिंह! तीर्थसेवनके लोभसे वे ब्रह्मर्षिगण समन्तपंचक तीर्थतक सरस्वती नदीके तटपर ठहर गये ॥

जुह्वतां तत्र तेषां तु मुनीनां भावितात्मनाम् ।
स्वाध्यायेनातिमहता बभूवुः पूरिता दिशः ॥ ४६ ॥
वहाँ होम करते हुए पवित्रात्मा मुनियोंके अत्यन्त गम्भीर स्वरसे किये जानेवाले स्वाध्यायके शब्दसे सम्पूर्ण दिशाएँ गूँज उठी थीं ॥ ४६ ॥

अग्निहोत्रैस्ततस्तेषां क्रियमाणैर्महात्मनाम् ।
अशोभत सरिच्छ्रेष्ठा दीप्यमानैः समन्ततः ॥ ४७ ॥
चारों ओर प्रकाशित हुए उन महात्माओंद्वारा किये जानेवाले यज्ञसे सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीकी बड़ी शोभा हो रही थी ॥ ४७ ॥

वालखिल्या महाराज अश्मकुट्टाश्च तापसाः ।
दन्तोलूखलिनश्चान्ये प्रसंख्यानास्तथा परे ॥ ४८ ॥

वायुभक्षा जलाहाराः पर्णभक्षाश्च तापसाः । नानानियमयुक्ताश्च तथा स्थण्डिलशायिनः ॥ ४९ ॥ आसन् वै मुनयस्तत्र सरस्वत्याः समीपतः । शोभयन्तः सरिच्छ्रेष्ठां गङ्गामिव दिवौकसः ॥ ५० ॥ महाराज! सरस्वतीके उस निकटवर्ती तटपर सुप्रसिद्ध तपस्वी वालखिल्य, अश्मकुट्ट³, दन्तोलूखली³, प्रसंख्यान³, हवा पीकर रहनेवाले, जलपानपर ही निर्वाह करनेवाले, पत्तोंका ही आहार करनेवाले, भाँति-भाँतिके नियमोंमें संलग्न तथा वेदीपर शयन करनेवाले तपस्वीमुनि विराजमान थे। वे सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वतीकी उसी प्रकार शोभा बढ़ा रहे थे, जैसे देवतालोग गंगाजीकी ॥ ४८—५० ॥

शतशश्च समापेतुर्ऋषयः सत्रयाजिनः । तेऽवकाशं न ददृशुः सरस्वत्या महाव्रताः ॥ ५१ ॥ सत्रयागमें सम्मिलित हुए सैकड़ों महान् व्रतधारी ऋषि वहाँ आये थे; परंतु उन्होंने सरस्वतीके तटपर अपने रहनेके लिये स्थान नहीं देखा ॥ ५१ ॥

ततो यज्ञोपवीतैस्ते तत्तीर्थं निर्मिमाय वै । जुहुवुश्चाग्निहोत्रांश्च चक्रुश्च विविधाः क्रियाः ॥ ५२ ॥ तब उन्होंने यज्ञोपवीतसे उस तीर्थका निर्माण करके वहाँ अग्निहोत्रसम्बन्धी आहुतियाँ दीं और नाना प्रकारके कर्मोंका अनुष्ठान किया ॥ ५२ ॥

ततस्तमृषिसंघातं निराशं चिन्तयान्वितम् । दर्शयामास राजेन्द्र तेषामर्थे सरस्वती ॥ ५३ ॥ राजेन्द्र! उस समय उस ऋषिसमूहको निराश और चिन्तित जान सरस्वतीने उनकी अभीष्ट-सिद्धिके लिये उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया ॥ ५३ ॥

ततः कुञ्जान् बहून् कृत्वा संनिवृत्ता सरस्वती । ऋषीणां पुण्यतपसां कारुण्याज्जनमेजय ॥ ५४ ॥ जनमेजय! तत्पश्चात् बहुत-से कुंजोंका निर्माण करती हुई सरस्वती पीछे लौट पड़ीं; क्योंकि उन पुण्यतपस्वी ऋषियोंपर उनके हृदयमें करुणाका संचार हो आया था ॥ ५४ ॥

ततो निवृत्य राजेन्द्र तेषामर्थे सरस्वती । भूयः प्रतीच्याभिमुखी प्रसुस्राव सरिद्वरा ॥ ५५ ॥ राजेन्द्र! उनके लिये लौटकर सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती पुनः पश्चिमकी ओर मुड़कर बहने लगीं ॥ ५५ ॥

अमोघागमनं कृत्वा तेषां भूयो व्रजाम्यहम् । इत्यद्भुतं महच्चक्रे तदा राजन् महानदी ॥ ५६ ॥

राजन्! उस महानदीने यह सोच लिया था कि मैं इन ऋषियोंके आगमनको सफल बनाकर पुनः पश्चिम मार्गसे ही लौट जाऊँगी। यह सोचकर ही उसने वह महान् अद्भुत कर्म किया ।। ५६ ।। एवं स कुञ्जो राजन् वै नैमिषीय इति स्मृतः । कुरुश्रेष्ठ कुरुक्षेत्रे कुरुष्व महतीं क्रियाम् ।। ५७ ।। नरेश्वर! इस प्रकार वह कुंज नैमिषीय नामसे प्रसिद्ध हुआ। कुरुश्रेष्ठ! तुम भी कुरुक्षेत्रमें महान् कर्म करो ।। ५७ ।। तत्र कुञ्जान् बहून् दृष्ट्वा निवृत्तां च सरस्वतीम् । बभूव विस्मयस्तत्र रामस्याथ महात्मनः ।। ५८ ।। वहाँ बहुत-से कुंजों तथा लौटी हुई सरस्वतीका दर्शन करके महात्मा बलरामजीको बड़ा विस्मय हुआ ।। ५८ ।। उपस्पृश्य तु तत्रापि विधिवद् यदुनन्दनः । दत्त्वा दायान् द्विजातिभ्यो भाण्डानि विविधानि च ।। ५९ ।। भक्ष्यं भोज्यं च विविधं ब्राह्मणेभ्यः प्रदाय च । ततः प्रायाद् बलो राजन् पूज्यमानो द्विजातिभिः ।। ६० ।। यदुनन्दन बलरामने वहाँ विधिपूर्वक स्नान और आचमन करके ब्राह्मणोंको धन और भाँति-भाँतिके बर्तन दान किये। राजन्! फिर उन्हें नाना प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ देकर द्विजातियोंद्वारा पूजित होते हुए बलरामजी वहाँसे चल दिये ।। ५९-६० ।। सरस्वतीतीर्थवरं नानाद्विजगणायुतम् । बदरेङ्गुदकाश्मर्यप्लक्षाम्रत्थविभीतकैः ।। ६१ ।। कङ्कोलैश्च पलाशैश्च करीरैः पीलुभिस्तथा । सरस्वतीतीररुहैस्तरुभिर्विविधैस्तथा ।। ६२ ।। करूषकवरैश्चैव बिल्वैराम्रातकैस्तथा । अतिमुक्तकषण्डैश्च पारिजातैश्च शोभितम् ।। ६३ ।। कदलीवनभूयिष्ठं दृष्टिकान्तं मनोहरम् । वाय्वम्बुनफलपर्णादैर्दन्तोलूखलिकैरपि ।। ६४ ।। तथाश्मकुट्टैर्वान्यैर्मुनिभिर्बहुभिर्वृतम् । स्वाध्यायघोषसंघुष्टं मृगयूथशताकुलम् ।। ६५ ।। अहिंस्रैर्धर्मपरमैर्नृभिरत्यर्थसेवितम् । सप्तसारस्वतं तीर्थमाजगाम हलायुधः ।। ६६ ।। यत्र मङ्कणकः सिद्धस्तपस्तेपे महामुनिः ।। ६७ ।। तदनन्तर हलायुध बलदेवजी सप्तसारस्वत नामक तीर्थमें आये जो सरस्वतीके तीर्थोंमें सबसे श्रेष्ठ हैं। वहाँ अनेकानेक ब्राह्मणोंके समुदाय निवास करते थे। वेर, इंगुद, काश्मर्य

(गम्भारी), पाकर, पीपल, बहेड़े, कंकोल, पलाश, करीर, पीलु, करूष, बिल्व, अमड़ा, अतिमुक्त, पारिजात तथा सरस्वतीके तटपर उगे हुए अन्य नाना प्रकारके वृक्षोंसे सुशोभित वह तीर्थ देखनेमें कमनीय और मनको मोह लेनेवाला है। वहाँ केलेके बहुत-से बगीचे हैं। उस तीर्थमें वायु, जल, फल और पत्ते चबाकर रहनेवाले, दाँतोंसे ही ओखलीका काम लेनेवाले और पत्थरसे फोड़े हुए फल खानेवाले बहुतेरे वानप्रस्थ मुनि भरे हुए थे। वहाँ वेदोंके स्वाध्यायकी गम्भीर ध्वनि गूँज रही थी। मृगोंके सैकड़ों यूथ सब ओर फैले हुए थे। हिंसारहित धर्मपरायण मनुष्य उस तीर्थका अधिक सेवन करते थे। वहीं सिद्ध महामुनि मंकणकने बड़ी भारी तपस्या की थी ॥ ६१—६७ ॥

इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि बलदेवतीर्थयात्रायां सारस्वतोपाख्याने सप्तत्रिंशोऽध्यायः ॥ ३७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें बलदेवजीकी तीर्थयात्राके प्रसंगमें सारस्वतोपाख्यानविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७ ॥


१. पत्थरसे फोड़े हुए फलका भोजन करनेवाले। २. दाँतसे ही ओखलीका काम लेनेवाले अर्थात् ओखलीमें कूटकर नहीं, दाँतोंसे ही चबाकर खानेवाले। ३. गिने हुए फल खानेवाले।

अध्याय (पृष्ठ 2754)

⬅ विषय-सूची (TOC)

अष्टात्रिंशोऽध्यायः

सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति, महिमा और मंकणक मुनिका चरित्र

जनमेजय उवाच

सप्तसारस्वतं कस्मात् कश्च मङ्कणको मुनिः ।
कथंसिद्धः स भगवान् कश्चास्य नियमोऽभवत् ॥ १ ॥
**जनमेजयने पूछा—**विप्रवर! सप्तसारस्वततीर्थकी उत्पत्ति किस हेतुसे हुई? पूजनीय मंकणक मुनि कौन थे? कैसे उन्हें सिद्धि प्राप्त हुई और उनका नियम क्या था? ॥ १ ॥

कस्य वंशे समुत्पन्नः किं चाधीतं द्विजोत्तम ।
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विधिवद् द्विजसत्तम ॥ २ ॥
द्विजश्रेष्ठ! वे किसके वंशमें उत्पन्न हुए थे और उन्होंने किस शास्त्रका अध्ययन किया था? यह सब मैं विधिपूर्वक सुनना चाहता हूँ ॥ २ ॥

वैशम्पायन उवाच

राजन् सप्त सरस्वत्यो याभिर्व्याप्तमिदं जगत् ।
आहूता बलवद्भिर्हि तत्र तत्र सरस्वती ॥ ३ ॥
**वैशम्पायनजीने कहा—**राजन्! सरस्वती नामकी सात नदियाँ और हैं, जो इस सारे जगत्में फैली हुई हैं। तपोबलसम्पन्न महात्माओंने जहाँ-जहाँ सरस्वतीका आवाहन किया है, वहाँ-वहाँ वे गयी हैं ॥ ३ ॥

सुप्रभा काञ्चनाक्षी च विशाला च मनोरमा ।
सरस्वती चौघवती सुरेणुर्विमलोदका ॥ ४ ॥
उन सबके नाम इस प्रकार हैं—सुप्रभा, कांचनाक्षी, विशाला, मनोरमा, सरस्वती, ओघवती, सुरेणु और विमलोदका ॥ ४ ॥

पितामहस्य महतो वर्तमाने महामखे ।
वितते यज्ञवाटे च संसिद्धेषु द्विजातिषु ॥ ५ ॥
पुण्याहघोषैर्विमलैर्वेदानां निनदैस्तथा ।
देवेषु चैव व्यग्रेषु तस्मिन् यज्ञविधौ तदा ॥ ६ ॥
एक समयकी बात है, पुष्करतीर्थमें महात्मा ब्रह्माजीका एक महान् यज्ञ हो रहा था। उनकी विस्तृत यज्ञशालामें सिद्ध ब्राह्मण विराजमान थे। पुण्याहवाचनके निर्दोष घोष तथा वेदमन्त्रोंकी ध्वनिसे सारा यज्ञमण्डप गूँज रहा था और सम्पूर्ण देवता उस यज्ञ-कर्मके सम्पादनमें व्यस्त थे ॥ ५-६ ॥