भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2740

त्रितोऽपि गच्छतां काममावाभ्यां वै विना कृतः । ‘त्रित यज्ञ करानेमें कुशल हैं, त्रित वेदोंके परिनिष्ठित विद्वान् हैं, अतः वे और बहुत-सी गौएँ प्राप्त कर लेंगे। इस समय हम दोनों एक साथ होकर इन गौओंको हाँक ले चलें और त्रित हमसे अलग होकर जहाँ इच्छा हो वहाँ चले जायँ’ ॥ २२-२३ १/२ ॥

तेषामागच्छतां रात्रौ पथिस्थानां वृकोऽभवत् ॥ २४ ॥ तत्र कूपोऽविदूरेऽभूत् सरस्वत्यास्तटे महान् । रात्रिका समय था और वे तीनों भाई रास्ता पकड़े चले आ रहे थे। उनके मार्गमें एक भेड़िया खड़ा था। वहाँ पास ही सरस्वतीके तटपर एक बहुत बड़ा कुआँ था ॥

अथ त्रितो वृकं दृष्ट्वा पथि तिष्ठन्तमग्रतः ॥ २५ ॥ तद्भयादपसर्पन् वै तस्मिन् कूपे पपात ह । अगाधे सुमहाघोरे सर्वभूतभयंकरे ॥ २६ ॥ त्रित अपने आगे रास्तेमें खड़े हुए भेड़ियेको देखकर उसके भयसे भागने लगे। भागते-भागते वे समस्त प्राणियोंके लिये भयंकर उस महाघोर अगाध कूपमें गिर पड़े ॥ २५-२६ ॥

त्रितस्ततो महाराज कूपस्थो मुनिसत्तमः । आर्तनादं ततश्चक्रे तौ तु शुश्रुवतुर्मुनी ॥ २७ ॥ महाराज! कुएँमें पहुँचनेपर मुनिश्रेष्ठ त्रितने बड़े जोरसे आर्तनाद किया, जिसे उन दोनों मुनियोंने सुना ॥ २७ ॥

तं ज्ञात्वा पतितं कूपे भ्रातरावेकतद्वितौ । वृकत्रासाच्च लोभाच्च समुत्सृज्य प्रजग्मतुः ॥ २८ ॥ अपने भाईको कुएँमें गिरा हुआ जानकर भी दोनों भाई एकत और द्वित भेड़ियेके भय और लोभसे उन्हें वहीं छोड़कर चल दिये ॥ २८ ॥

भ्रातृभ्यां पशुलुब्धाभ्यामुत्सृष्टः स महातपाः । उदपाने तदा राजन् निर्जले पांसुसंवृते ॥ २९ ॥ राजन्! पशुओंके लोभमें आकर उन दोनों भाइयोंने उस समय उन महातपस्वी त्रितको धूलिसे भरे हुए उस निर्जल कूपमें ही छोड़ दिया ॥ २९ ॥

त्रित आत्मानमालक्ष्य कूपे वीरुत्तृणावृते । निमग्नं भरतश्रेष्ठ नरके दुष्कृती यथा ॥ ३० ॥ स बुद्ध्यागणयत् प्राज्ञो मृत्योर्भीतो ह्यसोमपः । सोमः कथं तु पातव्य इहस्थेन मया भवेत् ॥ ३१ ॥ भरतश्रेष्ठ! जैसे पापी मनुष्य अपने-आपको नरकमें डूबा हुआ देखता है, उसी प्रकार तृण, वीरुध और लताओंसे व्याप्त हुए उस कुएँमें अपने-आपको गिरा देख मृत्युसे डरे और सोमपानसे वंचित हुए विद्वान् त्रित अपनी बुद्धिसे सोचने लगे कि ‘मैं इस कुएँमें रहकर कैसे सोमरसका पान कर सकता हूँ?’ ॥ ३०-३१ ॥