भारतकोश
महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

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पृष्ठ 2741

स एवमभिनिश्चित्य तस्मिन् कूपे महातपाः । ददर्श वीरुधं तत्र लम्बमानां यदृच्छया ॥ ३२ ॥ इस प्रकार विचार करते-करते महातपस्वी त्रितने उस कुएँमें एक लता देखी, जो दैवयोगसे वहाँ फैली हुई थी ॥ ३२ ॥ पांसुग्रस्ते ततः कूपे विचिन्त्य सलिलं मुनिः । अग्नीन् संकल्पयामास होतॄनात्मानमेव च ॥ ३३ ॥ मुनिने उस बालूभरे कूपमें जलकी भावना करके उसीमें संकल्पद्वारा अग्निकी स्थापना की और होता आदिके स्थानपर अपने-आपको ही प्रतिष्ठित किया ॥ ३३ ॥ ततस्तां वीरुधं सोमं संकल्प्य सुमहातपाः । ऋचो यजूंषि सामानि मनसा चिन्तयन् मुनिः ॥ ३४ ॥ ग्रावाणः शर्कराः कृत्वा प्रचक्रेऽभिषवं नृप । आज्यं च सलिलं चक्रे भागांश्च त्रिदिवौकसाम् ॥ ३५ ॥ सोमस्याभिषवं कृत्वा चकार विपुलं ध्वनिम् । तत्पश्चात् उन महातपस्वी त्रितने उस फैली हुई लतामें सोमकी भावना करके मन-ही-मन ऋग्, यजु और सामका चिन्तन किया। नरेश्वर! इसके बाद कंकड़ या बालू-कणोंमें सिल और लोढ़ेकी भावना करके उसपर पीसकर लतासे सोमरस निकाला। फिर जलमें घीका संकल्प करके उन्होंने देवताओंके भाग नियत किये और सोमरस तैयार करके उसकी आहुति देते हुए वेद-मन्त्रोंकी गम्भीर ध्वनि की ॥ ३४-३५ १/२ ॥ स चाविशद् दिवं राजन् पुनः शब्दस्त्रितस्य वै ॥ ३६ ॥ समवाप्य च तं यज्ञं यथोक्तं ब्रह्मवादिभिः । राजन्! ब्रह्मवादियोंने जैसा बताया है, उसके अनुसार ही उस यज्ञका सम्पादन करके की हुई त्रितकी वह वेदध्वनि स्वर्गलोकतक गूँज उठी ॥ ३६ १/२ ॥ वर्तमाने महायज्ञे त्रितस्य सुमहात्मनः ॥ ३७ ॥ आविग्नं त्रिदिवं सर्वं कारणं च न बुद्ध्यते । महात्मा त्रितका वह महान् यज्ञ जब चालू हुआ, उस समय सारा स्वर्गलोक उद्विग्न हो उठा, परंतु किसीको इसका कोई कारण नहीं जान पड़ा ॥ ३७ १/२ ॥ ततः सुतुमुलं शब्दं शुश्रावाथ बृहस्पतिः ॥ ३८ ॥ श्रुत्वा चैवाब्रवीत् सर्वान् देवान् देवपुरोहितः । त्रितस्य वर्तते यज्ञस्तत्र गच्छामहे सुराः ॥ ३९ ॥ तब देवपुरोहित बृहस्पतिजीने वेदमन्त्रोंके उस तुमुलनादको सुनकर देवताओंसे कहा—‘देवगण! त्रित मुनिका यज्ञ हो रहा है, वहाँ हमलोगोंको चलना चाहिये ॥ स हि क्रुद्धः सृजेदन्यान् देवानपि महातपाः ।